देश के 1,00,843 स्कूल एक-एक शिक्षक के भरोसे.... शिक्षक दिवस पर विशेष आलेख
शिक्षक दिवस पर विशेष आलेख
एकीकृत जिला सूचना प्रणाली प्लस - यूडीआईएसई+ के ताजा आंकड़े देश की स्कूली शिक्षा में सुधार के साथ गंभीर कमियों को भी उजागर करते हैं। एक लाख से अधिक स्कूल अभी भी केवल एक शिक्षक के भरोसे हैं, जबकि माध्यमिक स्तर पर नामांकन और बच्चों के स्कूल में टिके रहने की दर भी चिंता का विषय है। डिजिटल सुविधाओं, बिजली, दिव्यांग-अनुकूल रैंप और वर्षा जल संचयन में भी बड़ी संख्या में स्कूल पीछे हैं। सरकार को केवल नामांकन और सुविधाओं के आंकड़ों के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता, सीखने, शिक्षक उपलब्धता और जवाबदेही पर ध्यान देना होगा।
देश के 1,00,843 स्कूल एक-एक शिक्षक के भरोसे
एकीकृत जिला सूचना प्रणाली प्लस (यूडीआईएसई) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों से देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की नई तस्वीर सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार 14.67 लाख स्कूलों, 1.03 करोड़ शिक्षकों और 24.72 करोड़ विद्यार्थियों के नामांकन, छात्र-शिक्षक अनुपात, डिजिटल सुविधाओं और बुनियादी अधोसंरचना में सुधार दिखाया गया है वहीं दूसरी ओर एक आंकड़ा विशेष रूप से सरकार की उपलब्धियों पर पलीता लगा रहा है और वह है देश में अभी भी 1,00,843 विद्यालय ऐसे हैं जो केवल एक - एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली प्लस (यूडीआईएसईप्लस) एक डिजिटल प्लेटफार्म है। इसे स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसईएंडएल) ने समूचे देश से स्कूली शिक्षा के विस्तृत आंकड़ों के संग्रहण और प्रबंधन के लिए विकसित किया है। यूडीआईएसई प्लस को 2018-19 में शुरू किया गया था और तब से यह शिक्षा में साक्ष्य आधारित योजना, नीति निर्माण और प्रगति की निगरानी में मददगार रहा है। यह नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के क्रियान्वयन पर नजर रखने के साथ ही आंकड़ों के महत्वपूर्ण संग्रहण के लिए भी काम करता है।
रिपोर्ट में एक - एक शिक्षक वाले विद्यालयों की संख्या तीन प्रतिशत कम होना निश्चित रूप से सुधार प्रदर्शित करता है, लेकिन एक लाख से अधिक स्कूलों का अभी भी एक - एक शिक्षक के सहारे चलना बताता है कि शिक्षक उपलब्धता की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। खासकर ग्रामीण, आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में इसका असर बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।क्योंकि 14.67 लाख स्कूलों, 1.03 करोड़ शिक्षकों और 24.72 करोड़ विद्यार्थियों वाली व्यवस्था में एक प्रतिशत की कमी भी लाखों बच्चों के भविष्य से जुड़ी होती है।
रिपोर्ट के अनुसार देश के स्कूलों में 24.72 करोड़ से अधिक विद्यार्थी नामांकित हैं। मिडिल स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 89.6 प्रतिशत है, जबकि सेकंडरी स्तर पर यह बढ़कर 71.7 प्रतिशत हुआ है। पहली नजर में 71.7 प्रतिशत का आंकड़ा सुधार का संकेत देता है, लेकिन इसका दूसरा अर्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है, सेकंडरी शिक्षा की उम्र वाले लगभग तीन में से एक बच्चे का इस स्तर पर अपेक्षित नामांकन नहीं है।
यही वह बिंदु है जहां शिक्षा नीति को अपनी प्राथमिकता बदलनी होगी। प्राथमिक और मिडिल स्तर पर बच्चों को स्कूल तक पहुंचा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तक बनाए रखना ज्यादा बड़ी चुनौती है।
रिपोर्ट में सेकंडरी स्तर पर प्रतिधारण दर केवल 51.9 प्रतिशत बताई गई है। यानी प्रारंभिक वर्षों में स्कूल से जुड़ने वाले बच्चों का एक बड़ा हिस्सा माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाता है। यह आंकड़ा उस दावे पर गंभीर विचार करने को मजबूर करता है कि स्कूलों में बच्चों की निरंतर भागीदारी सुनिश्चित हो रही है।
ड्रॉपआउट घटा, लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई
कक्षा पांचवी स्तर पर ड्रॉपआउट दर 1.8 प्रतिशत और सेकंडरी स्तर पर 7.0 प्रतिशत रह गई है। मिडिल स्तर पर यह 3.6 प्रतिशत है। निश्चित रूप से पहले की तुलना में कमी सकारात्मक है। लेकिन 7 प्रतिशत का सेकंडरी ड्रॉपआउट भी छोटी समस्या नहीं है।
विशेषकर तब, जब देश की अर्थव्यवस्था तेजी से ज्ञान और कौशल आधारित हो रही है। माध्यमिक शिक्षा बीच में छोड़ने वाला प्रत्येक बच्चा भविष्य के रोजगार, कौशल और सामाजिक अवसरों से वंचित होने के जोखिम में चला जाता है।
इसलिए सरकार को केवल ड्रॉपआउट प्रतिशत कम होने पर संतुष्ट नहीं होना चाहिए। प्रत्येक स्तर पर यह पता लगाने की जरूरत है कि बच्चा स्कूल क्यों छोड़ रहा है, आर्थिक कारणों से, परिवार की परिस्थितियों के कारण, बाल श्रम के कारण, लड़कियों के मामले में सुरक्षा या दूरी के कारण, सीखने में कठिनाई के कारण या स्कूल के वातावरण से असंतोष के कारण।
1,00,843 स्कूल अभी भी एक शिक्षक के भरोसे
रिपोर्ट में एक उपलब्धि के रूप में बताया गया है कि एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या लगभग तीन प्रतिशत घटकर 1,00,843 रह गई है। कमी स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह है कि देश में अभी भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के सहारे क्यों चल रहे हैं?
छात्र-शिक्षक अनुपात का राष्ट्रीय औसत 24:1 होना उत्साहजनक है। फाउंडेशनल स्तर पर 10:1, प्राथमिक में 12:1, मिडिल में 17:1 और सेकंडरी में 21:1 का पीटीआर भी अनुकूल दिखाई देता है। मगर राष्ट्रीय औसत अक्सर जमीनी असमानताओं को छिपा देता है।
एक तरफ बड़े स्कूलों में शिक्षक संख्या अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है, दूसरी ओर दूरदराज के ग्रामीण, आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में एक ही शिक्षक को अनेक कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी निभानी पड़ सकती है।
इसलिए सरकार को केवल राष्ट्रीय पीटीआर नहीं, बल्कि जिला, ब्लॉक, स्कूल और विषयवार शिक्षक उपलब्धता को आधार बनाकर नीति बनानी चाहिए। गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और व्यावसायिक शिक्षा जैसे विषयों में वास्तविक कमी कहां है, इसका स्पष्ट मानचित्र तैयार होना चाहिए।
डिजिटल शिक्षा की राह अभी अधूरी
डिजिटल भारत के दौर में स्कूलों में कंप्यूटर सुविधा का 69.9 प्रतिशत और इंटरनेट कनेक्टिविटी का 67.4 प्रतिशत तक पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन इसके साथ एक सीधा सवाल खड़ा होता है, जब लगभग एक-तिहाई स्कूलों में इंटरनेट नहीं है और करीब 30 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर सुविधा नहीं है, तो डिजिटल शिक्षा का लाभ सार्वभौमिक कैसे होगा?
डिजिटल शिक्षा केवल कंप्यूटर उपलब्ध कराने से नहीं आती। बिजली, इंटरनेट की गति, उपकरणों की संख्या, रखरखाव, प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री, इन सभी का होना आवश्यक है।
यदि किसी ग्रामीण स्कूल में कंप्यूटर तो है लेकिन इंटरनेट नहीं, या इंटरनेट है लेकिन प्रशिक्षित शिक्षक नहीं, तो वह सुविधा आंकड़े में उपलब्धि जरूर बन सकती है, लेकिन कक्षा में उसका उपयोग सीमित रह सकता है।
सरकार को अगली नीति में ‘डिजिटल सुविधा उपलब्ध है’ के बजाय ‘डिजिटल सुविधा का कितना उपयोग हो रहा है’ को सफलता का पैमाना बनाना चाहिए।
95 प्रतिशत स्कूलों में बिजली
रिपोर्ट के अनुसार 95 प्रतिशत स्कूलों में बिजली है। यह अच्छी प्रगति है, लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि लगभग पांच प्रतिशत स्कूल अभी बिजली से वंचित हैं। इसी तरह 99.5 प्रतिशत स्कूलों में साफ पानी उपलब्ध होना बड़ी उपलब्धि है, पर शेष 0.5 प्रतिशत भी महत्वपूर्ण हैं।
शिक्षा में 99 प्रतिशत उपलब्धि भी उन बच्चों के लिए 100 प्रतिशत समस्या है जिन्हें सुविधा नहीं मिली।
लड़कियों के लिए 98.5 प्रतिशत और लड़कों के लिए 97.2 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय होना सकारात्मक है। हाथ धोने की सुविधा 96.9 प्रतिशत स्कूलों तक पहुंच गई है। फिर भी शेष स्कूलों में ये सुविधाएं जल्द से जल्द उपलब्ध कराना जरूरी है, क्योंकि स्वच्छता और स्वास्थ्य सीधे स्कूल में बच्चों की उपस्थिति से जुड़े हैं।
वर्षा जल संचयन
रिपोर्ट का एक आंकड़ा विशेष ध्यान मांगता है। देश के केवल 29.9 प्रतिशत स्कूलों में वर्षा जल संचयन की सुविधा है। जल संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में यह स्थिति चिंता पैदा करती है।
जब स्कूल स्वयं बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और जल बचाने का पाठ पढ़ाते हैं, तब स्कूल परिसरों को वर्षा जल संचयन का आदर्श मॉडल बनाया जा सकता है। प्रत्येक स्कूल की छत से वर्षा जल संग्रहित कर भूजल पुनर्भरण या अन्य उपयोग में लाया जा सकता है।
सरकार को इसे केवल स्कूल अवसंरचना का हिस्सा न मानकर जल संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा के राष्ट्रीय अभियान से जोड़ना चाहिए।
रैंप हैं, लेकिन क्या स्कूल वास्तव में दिव्यांग-अनुकूल हैं?
58.2 प्रतिशत स्कूलों में हैंडरेल वाले रैंप की सुविधा बताई गई है। इसका दूसरा पहलू यह है कि लगभग 42 प्रतिशत स्कूल इस सुविधा से अभी बाहर हैं।
विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा केवल नामांकन तक सीमित नहीं हो सकती। स्कूल भवन, शौचालय, कक्षाओं तक पहुंच, शिक्षण सामग्री और प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।
विशेष जरूरतों वाले बच्चों में 57.16 प्रतिशत लड़के और 42.84 प्रतिशत लड़कियां हैं। इन बच्चों के लिए वास्तविक समावेशन तभी संभव होगा जब ‘स्कूल में प्रवेश’ के साथ ‘स्कूल में सहज भागीदारी और सीखने’ की व्यवस्था भी सुनिश्चित हो।
लाइब्रेरी 90.5 प्रतिशत, लेकिन किताबें और पढ़ने की आदत?
90.5 प्रतिशत स्कूलों में लाइब्रेरी की सुविधा होना भी उल्लेखनीय है। मगर शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल यहां भी बना रहता है। केवल पुस्तकालय कक्ष या पुस्तकों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि कितने बच्चे नियमित रूप से पुस्तकालय का इस्तेमाल करते हैं? वहां उम्र और कक्षा के अनुरूप किताबें हैं या नहीं? पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए शिक्षक क्या कर रहे हैं?
शिक्षा का लक्ष्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि सोचने, पढ़ने, सवाल करने और समस्या का समाधान करने की क्षमता विकसित करना भी है।
लैंगिक और सामाजिक समावेशन
कुल नामांकन में लड़कियों की हिस्सेदारी 48.4 प्रतिशत और शिक्षकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 54.9 प्रतिशत है। यह लैंगिक भागीदारी की दृष्टि से सकारात्मक संकेत है।
सामाजिक वर्गों में ओबीसी विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 44.9 प्रतिशत, सामान्य वर्ग की 27.5 प्रतिशत, अनुसूचित जाति की 17.7 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की 10 प्रतिशत है। एससी और एसटी विद्यार्थियों की संयुक्त हिस्सेदारी 27.7 प्रतिशत है।
ये आंकड़े समावेशी पहुंच का संकेत देते हैं, लेकिन सिर्फ नामांकन समानता को सामाजिक न्याय की अंतिम मंजिल नहीं माना जा सकता। प्रश्न यह भी होना चाहिए कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बच्चों की उपस्थिति, सीखने की उपलब्धि, ड्रॉपआउट, माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच और उच्च शिक्षा में संक्रमण की स्थिति क्या है।
यूडीआईएसई+ को केवल आंकड़ों का भंडार नहीं, जवाबदेही का औजार बनाया जाए
यूडीआईएसई+ की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल डेटाबेस है। 2018-19 में शुरू हुआ यह डिजिटल प्लेटफॉर्म आज देश की स्कूली शिक्षा की योजना और निगरानी के लिए महत्वपूर्ण आधार बन चुका है।
लेकिन आंकड़ों का वास्तविक मूल्य तभी है जब उनसे समयबद्ध कार्रवाई निकले।
यदि किसी जिले में एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या अधिक है, तो वहां कब तक शिक्षक पहुंचेंगे? यदि किसी क्षेत्र में सेकंडरी ड्रॉपआउट अधिक है, तो उसका समाधान क्या है? जिन स्कूलों में इंटरनेट नहीं है, वहां कनेक्टिविटी कब पहुंचेगी? 29.9 प्रतिशत वर्षा जल संचयन के आंकड़े को अगले वर्ष कितना सुधारा जाएगा? 58.2 प्रतिशत रैंप की स्थिति को 100 प्रतिशत के करीब कब लाया जाएगा?
यूडीआईएसई+ ने सरकार को आईना उपलब्ध करा दिया है। अब जरूरत इस बात की है कि आईने में दिखाई देने वाली कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें दूर करने की समयबद्ध कार्ययोजना सामने आए।

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