समंदर, इतिहास और रोमांच के साथ

अंडमान-निकोबार की यादगार यात्रा

  • डा. चंदर सोनाने

      जब हम किसी पर्यटन स्थल की यात्रा पर निकलते हैं तो वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखने की उत्सुकता तो रहती ही है, लेकिन यदि उस स्थान के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति से पहले ही परिचित हो जाएं, तो यात्रा का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। हर दृश्य के पीछे छिपी कहानी तब हमें दिखाई देने लगती है। इसी भाव के साथ हमने अंडमान-निकोबार की अपनी यात्रा शुरू की। यह यात्रा केवल समुद्र, द्वीपों और खूबसूरत समुद्र तटों को देखने की यात्रा नहीं थी, बल्कि इतिहास, प्रकृति, रोमांच और स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों से रूबरू होने का अवसर भी थी।

अंडमान-निकोबार : इतिहास और संस्कृति की अनोखी धरती

      अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। यहां की संस्कृति विभिन्न जनजातियों और आधुनिक समुदायों के अनूठे मेल से बनी है। अंडमान के मूल निवासियों में जारवा, ओंगे, सेंटिनल और ग्रेट अंडमानी जैसी प्राचीन जनजातियां शामिल हैं, जबकि निकोबार क्षेत्र में निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों का निवास है।

      प्राचीन यात्रियों के यात्रा-वृत्तांतों में भी इन द्वीपों का उल्लेख मिलता है। मार्को पोलो सहित अनेक यात्रियों ने इस क्षेत्र के बारे में लिखा है। अंडमान नाम को लेकर यह मान्यता भी प्रचलित है कि इसका संबंध भगवान हनुमान के नाम से है।

        18वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजों ने यहां अपनी गतिविधियां शुरू कीं। आगे चलकर यही द्वीप ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कुख्यात ‘काला पानी’ बन गया। पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर जेल आज भी उन अमानवीय यातनाओं और बलिदानों की मूक गवाह है, जिनका सामना वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने किया।

     द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इन द्वीपों पर जापान का अधिकार रहा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने यहां आजाद भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। स्वतंत्रता के बाद 1956 में अंडमान-निकोबार को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।

      आज यहां अलग-अलग प्रदेशों और समुदायों से आए लोग मिल-जुलकर रहते हैं। बंगाली, तमिल, तेलुगु और केरल से आए लोगों की सांस्कृतिक छाप यहां दिखाई देती है। दुर्गा पूजा, पोंगल, क्रिसमस सहित विभिन्न त्योहार पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं। इतिहास और आधुनिकता का यह मेल अंडमान को एक अलग पहचान देता है।

आकर्षक रॉस आइलैंड : खंडहरों में छिपी कहानी

     हमारी दूसरे दिन की यात्रा 24 सितंबर की सुबह नाश्ते के बाद शुरू हुई। उस दिन हमारे सामने दो खूबसूरत द्वीपों - रॉस आइलैंड और कोरल आइलैंड - को देखने का रोमांच था। होटल से निकलकर हम सभी एक बड़ी नाव में सवार हुए। नाव जैसे-जैसे समुद्र की लहरों को चीरती आगे बढ़ी, पोर्ट ब्लेयर पीछे छूटता गया और सामने समुद्र का विशाल विस्तार खुलता चला गया। चारों ओर नीला पानी और दूर दिखाई देते द्वीप - मानो प्रकृति ने समुद्र के बीच छोटे-छोटे रहस्यमय संसार बसा रखे हों।

      कुछ ही देर में हम रॉस आइलैंड पहुंचे। अंडमान-निकोबार का यह ऐतिहासिक द्वीप अब आधिकारिक तौर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप कहलाता है। पोर्ट ब्लेयर से करीब तीन किलोमीटर पूर्व स्थित यह द्वीप कभी ब्रिटिश प्रशासन का प्रमुख केंद्र था। अपनी भव्य इमारतों और स्थापत्य के कारण इसे कभी ‘पूरब का पेरिस’ भी कहा जाता था।

      लेकिन आज समय की करवट ने यहां एक अलग ही दृश्य रच दिया है। ब्रिटिश काल के पुराने चर्च, चीफ कमिश्नर का बंगला, बॉलरूम और कब्रिस्तान के अवशेष अब घने जंगल और पेड़ों की जड़ों से घिरे हुए हैं। प्रकृति ने मानो इतिहास की इन इमारतों को धीरे-धीरे अपने आगोश में ले लिया है। कहीं टूटी दीवारों के बीच से पेड़ उग आए हैं तो कहीं बेलों ने पुराने भवनों को ढक लिया है।

      इन खंडहरों के बीच खड़े होकर ऐसा महसूस होता है जैसे बीता हुआ समय अचानक सामने आ गया हो। 1941 में आए तेज भूकंप और प्राकृतिक आपदा के बाद अंग्रेजों ने अपना प्रशासनिक मुख्यालय यहां से पोर्ट ब्लेयर स्थानांतरित कर लिया था। हमने रॉस आइलैंड के इन ऐतिहासिक अवशेषों को देखा और मन भरकर तस्वीरें खींचीं। हर तस्वीर के पीछे उस दौर की एक कहानी जैसे कैद हो रही थी।

नॉर्थ बे यानी कोरल आइलैंड : समुद्र के भीतर एक नई दुनिया

      रॉस आइलैंड की ऐतिहासिक यात्रा के बाद हमारी नाव नॉर्थ बे की ओर बढ़ी। इसे कोरल आइलैंड भी कहा जाता है। यहां पहुंचते ही वातावरण पूरी तरह बदल गया। इतिहास के खंडहरों से निकलकर हम समुद्र के भीतर बसे रंगीन संसार की ओर बढ़ रहे थे।

       नॉर्थ बे अपने खूबसूरत प्रवाल भित्तियों और रोमांचक जल क्रीड़ाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां का ऐतिहासिक लाइटहाउस भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसकी तस्वीर भारत के पुराने 20 रुपये के नोट के पीछे भी दिखाई देती थी।

      समुद्र का पानी इतना साफ था कि भीतर की दुनिया को देखने की उत्सुकता और बढ़ गई। हम सब एक सेमी-सबमरीन में सवार हुए। करीब 10 से 12 यात्री एक साथ बैठे और धीरे-धीरे हम समुद्र की सतह से नीचे, तलहटी के करीब पहुंचने लगे। चारों ओर कांच लगे थे। जैसे ही समुद्र के भीतर का संसार सामने आया, सभी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। रंग-बिरंगे कोरल, छोटी-बड़ी मछलियां और समुद्री जीवन की अनगिनत झलकियां—ऐसा लग रहा था मानो हम किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हों।

      हममें से अधिकांश ने समुद्र के भीतर का ऐसा दृश्य जीवन में पहली बार देखा था। रोमांच और आश्चर्य से हर कोई अभिभूत था। कैमरे लगातार तस्वीरें खींच रहे थे और आंखें समुद्र के उस अद्भुत संसार को अपने भीतर उतार रही थीं। समुद्र के भीतर की इस अविस्मरणीय दुनिया को देखने के बाद शाम को हम वापस पोर्ट ब्लेयर के होटल लौट आए। रात का भोजन किया और दिनभर के रोमांच को याद करते हुए विश्राम किया।

कॉर्बिन्स कोव बीच : नीले समंदर के साथ सफर

       हमारी यात्रा का तीसरा दिन 25 सितंबर था। सुबह नाश्ता करने के बाद हमने पोर्ट ब्लेयर के होटल से विदा ली और अगली यात्रा के लिए निकल पड़े। पोर्ट ब्लेयर हार्बर से फेरी द्वारा हैवलॉक आइलैंड की ओर जाना था। लेकिन उससे पहले कॉर्बिन्स कोव बीच हमारा इंतजार कर रहा था।

कॉर्बिन्स कोव पोर्ट ब्लेयर का सबसे नजदीकी और आसानी से पहुंचा जा सकने वाला समुद्र तट है। ऊंचे-ऊंचे नारियल के पेड़ों से घिरा यह अर्धचंद्राकार समुद्र तट पहली नजर में ही मन मोह लेता है। वहां तक पहुंचने वाला तटीय मार्ग भी अपने आप में किसी खूबसूरत यात्रा से कम नहीं है। एक ओर नीला समुद्र और दूसरी ओर हरी-भरी पहाड़ियां । बीच में जाती सड़क ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती है जिसे लंबे समय तक भुलाना मुश्किल है। रास्ते और समुद्र तट के आसपास द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना द्वारा बनाए गए बंकर भी दिखाई देते हैं। प्रकृति की सुंदरता के बीच युद्ध के ये अवशेष इतिहास की गंभीरता का एहसास कराते हैं।

      हमने कॉर्बिन्स कोव के समुद्र तट को देखा, लहरों का आनंद लिया और खूब तस्वीरें खींचीं। इसके बाद हमारी यात्रा आगे बढ़ी और हम हैवलॉक आइलैंड के रिसॉर्ट पहुंचे। यहां हमें दो रात रुकना था। इस तरह हमारी छह दिन की अंडमान-निकोबार यात्रा के तीन दिन रोमांच, प्रकृति और इतिहास के बीच बीत चुके थे। अभी यात्रा के तीन दिन और बाकी थे और आगे के अनुभव हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।

हैवलॉक आइलैंड यानी स्वराज द्वीप : प्रकृति का मनमोहक संसार

     हैवलॉक आइलैंड, जिसे अब आधिकारिक रूप से स्वराज द्वीप कहा जाता है, अंडमान-निकोबार का सबसे लोकप्रिय और खूबसूरत पर्यटन स्थल है। पोर्ट ब्लेयर से लगभग 70 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित यह द्वीप अपने सफेद रेतीले समुद्र तटों, साफ नीले पानी, प्रवाल भित्तियों और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।

      प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 दिसंबर 2018 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि देते हुए इसका नाम स्वराज द्वीप रखा था। जैसे-जैसे हम इस द्वीप पर पहुंचे, समुद्र का रंग, हवा की ताजगी और चारों ओर फैली हरियाली मन को एक अलग ही शांति दे रही थी। सफेद रेत पर पड़ती धूप और सामने फैला नीला समुद्र किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर जैसा लग रहा था। हम सभी ने स्वराज द्वीप का भरपूर आनंद लिया।

राधानगर बीच : सफेद रेत और नीले पानी का सम्मोहन

       हैवलॉक आइलैंड के भ्रमण के बाद हमारी अगली मंजिल थी राधानगर बीच। इसे बीच नंबर 7 भी कहा जाता है। सफेद रेत और नीले पानी के कारण यह समुद्र तट बेहद आकर्षक दिखाई देता है। जैसे ही हम राधानगर बीच पहुंचे, सामने का दृश्य देखकर हर किसी के चेहरे पर उत्साह दिखाई देने लगा। मखमली सफेद रेत, विशाल हरे-भरे पेड़ और चमकीला नीला पानी । प्रकृति जैसे यहां अपनी पूरी सुंदरता के साथ उपस्थित थी।

      राधानगर बीच अपनी स्वच्छता और पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन के लिए प्रतिष्ठित ब्लू फ्लैग प्रमाणन भी प्राप्त कर चुका है। समुद्र की लहरें लगातार किनारे से टकरा रही थीं और यात्री उस दृश्य में पूरी तरह खोए हुए थे। अधिकांश यात्रियों ने समुद्र में स्नान का आनंद लिया। किसी ने लहरों के साथ अठखेलियां कीं तो कोई किनारे खड़े होकर इस अद्भुत दृश्य को कैमरे में कैद करता रहा। तस्वीरें खिंचती रहीं और समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला। यहीं हमने दोपहर का भोजन किया और फिर अपने रिसॉर्ट लौट आए।

     इसके बाद आगे घूमने का कोई कार्यक्रम नहीं था। कुछ यात्री आराम करने अपने कमरों में चले गए तो कुछ बाजार की ओर निकल पड़े। बाजार में खरीदारी का दौर चला। सभी ने अपनी पसंद की वस्तुएं खरीदीं और यात्रा की यादों को साथ ले जाने की तैयारी की। रात को भोजन के बाद सभी अपने-अपने कमरों में आराम करने चले गए।

दर्शनीय हैवलॉक हार्बर : विदाई की आहट

     यात्रा का पांचवां दिन यानी 27 सितंबर। सुबह नाश्ते के बाद हमने हैवलॉक आइलैंड यानी स्वराज द्वीप के रिसॉर्ट को छोड़ा। सामान साथ लिया और हैवलॉक हार्बर की ओर निकल पड़े। हैवलॉक हार्बर को हैवलॉक जेटी या आधिकारिक रूप से स्वराज द्वीप फेरी घाट भी कहा जाता है। यह स्वराज द्वीप का प्रमुख समुद्री बंदरगाह है और पोर्ट ब्लेयर तथा नजदीकी नील द्वीप से इसे जोड़ता है।

     गोविंद नगर में स्थित यह फेरी घाट समुद्र के रास्ते इस खूबसूरत द्वीप का प्रमुख प्रवेश और निकास द्वार है। हमने हार्बर को भी मन भरकर देखा। लेकिन इस बार मन में एक हल्की उदासी थी। कुछ ही समय पहले जिन रास्तों पर घूमते हुए हम आए थे, अब उन्हीं से लौटने का समय आ गया था।

      दोपहर में हम फेरी से वापस पोर्ट ब्लेयर आ गए। होटल में सामान रखा, भोजन किया और थोड़ी देर आराम करने के बाद हमारी अगली मंजिल थी। वह स्थान, जिसका नाम सुनते ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अनेक स्मृतियां मन में उभर आती हैं।

सेल्यूलर जेल : जहां दीवारें आज भी चीखती हुई इतिहास सुनाती हैं

       होटल से राष्ट्रीय स्मारक सेल्यूलर जेल के लिए निकले ही थे कि मौसम अचानक बदल गया। पहले हल्की बूंदाबांदी शुरू हुई और देखते ही देखते हवा के साथ तेज बारिश होने लगी। हमें पहले ही बताया गया था कि अंडमान में मौसम कभी भी करवट ले सकता है। इसलिए लगभग सभी यात्रियों के पास छाते या बरसाती थे। बारिश के बीच हमने अपने-अपने ‘सुरक्षा कवच’ निकाले और बस से सेल्यूलर जेल के पास पहुंचे।

      प्रवेश द्वार पर पहुंचते ही वातावरण का रंग बदल गया। कुछ समय पहले तक हम समुद्र, लहरों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच थे। अब हमारे सामने वह जेल थी, जहां देश की आजादी के लिए लड़ने वाले असंख्य सेनानियों ने अमानवीय यातनाएं सही थीं। सब पंक्तिबद्ध होकर जेल के भीतर पहुंचे। जेल देखने के लिए हमारे साथ एक गाइड था। उसने जेल के अलग-अलग हिस्सों में ले जाकर वहां के इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों पर हुए अत्याचारों की कहानी सुनाई। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, वातावरण गंभीर होता गया।

       जिन यातनाओं के बारे में हम किताबों में पढ़ते आए थे, उनके प्रतीक और मॉडल जब आंखों के सामने दिखाई दिए तो मन विचलित हो उठा। यह कल्पना करना भी कठिन था कि देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले लोगों ने यहां किस तरह का कष्ट सहा होगा। हर दृश्य हमें उस दौर में ले जा रहा था। मन में एक ओर अंग्रेजी शासन की क्रूरता के प्रति आक्रोश था तो दूसरी ओर उन वीर सेनानियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता उमड़ रही थी, जिन्होंने असहनीय यातनाएं सहकर भी स्वतंत्रता की लौ बुझने नहीं दी।

       काला पानी केवल एक सजा का नाम नहीं था। वह उस दौर के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए देश से हजारों किलोमीटर दूर एक ऐसी यातनाभूमि थी, जहां से वापस लौटना आसान नहीं था। सेल्यूलर जेल की दीवारों के बीच खड़े होकर हमने उन सभी वीरों को मन ही मन नमन किया।

लाइट एंड साउंड शो : इतिहास जब जीवंत हो उठा

       सेल्यूलर जेल का भ्रमण समाप्त होते-होते शाम हो चुकी थी। अब हमें प्रसिद्ध लाइट एंड साउंड शो देखना था। हम मैदान में पहुंचकर अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ गए। तभी बारिश ने फिर दस्तक दे दी। लेकिन किसी के कदम पीछे नहीं हटे। सबकी आंखें अब जेल की उस पृष्ठभूमि पर टिकी थीं, जहां थोड़ी देर बाद इतिहास जीवंत होने वाला था।

     रोशनी और ध्वनि के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के बलिदान की कहानी प्रस्तुत की गई। जेल की दीवारें, अंधेरा, बारिश का वातावरण और सामने चलती कहानी । इन सबने मिलकर पूरे अनुभव को और प्रभावशाली बना दिया। दिन में गाइड से हमने जो कुछ सुना था, वही कहानी अब प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से हमारे सामने जीवंत हो रही थी। बलिदानों की गाथा सुनते-सुनते एक बार फिर मन भारी हो गया। कई क्षण ऐसे आए जब लगा कि हम केवल दर्शक नहीं हैं, बल्कि उस इतिहास के साक्षी बन गए हैं। शो समाप्त हुआ तो सब चुपचाप वहां से बाहर निकले। चेहरे पर यात्रा की थकान थी, लेकिन उससे कहीं अधिक मन में उन वीर सेनानियों की स्मृतियां थीं। होटल लौटे। भोजन किया और रात्रि विश्राम के लिए अपने-अपने कमरों में चले गए।

विदा की बेला : यादों का सफर साथ लेकर

       हमारी छह दिन की यात्रा का अंतिम दिन था। सुबह नाश्ता करने के बाद सभी ने अपना-अपना सामान समेटा। होटल के कमरों में यात्रा के दौरान जमा हुई वस्तुएं तो थीं ही, लेकिन उससे कहीं अधिक हमारे पास यादों का सामान था । समुद्र की लहरें, नाव की यात्रा, रॉस आइलैंड के खंडहर, कोरल की रंगीन दुनिया, कॉर्बिन्स कोव की खूबसूरती, स्वराज द्वीप की शांति, राधानगर बीच की सफेद रेत और सेल्यूलर जेल की गंभीर स्मृतियां। पांच रात और छह दिन कब बीत गए, पता ही नहीं चला। अब हम पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट की ओर बढ़ रहे थे।

     एक यात्रा समाप्त हो रही थी, लेकिन उसके अनुभव हमारे भीतर हमेशा के लिए बस चुके थे। एयरपोर्ट पर यात्रियों ने एक-दूसरे से विदा ली और फिर मिलने का वादा किया। इस अविस्मरणीय यात्रा को सफल और सुखद बनाने के लिए सभी यात्रियों ने यात्रा के संयोजक वर्ल्ड आयुष फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. रंजन वर्मा विशद, विश्व हिन्दी मंच के डॉ. प्रणव शास्त्री तथा हमारे टूर मैनेजर श्री आलोक कुमार का हृदय से धन्यवाद दिया।

       अंडमान-निकोबार से लौटते समय विमान भले ही हमें मुख्य भूमि की ओर ले जा रहा था, लेकिन मन अभी भी उन नीली लहरों के बीच कहीं ठहरा हुआ था। कभी रॉस आइलैंड के खंडहरों में इतिहास खोजता, कभी समुद्र के भीतर रंग-बिरंगी मछलियों के साथ तैरता और कभी सेल्यूलर जेल की दीवारों के सामने खड़े उन अनाम-अमर सेनानियों को नमन करता। शायद यही किसी यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है, जब स्थान पीछे छूट जाता है  लेकिन उसकी स्मृतियां हमारे भीतर हमेशा जीवित रहती हैं।

      अंडमान-निकोबार की यह यात्रा भी हमारे लिए ऐसी ही एक यात्रा बन गई जो समुद्र की लहरों से शुरू होकर इतिहास की गहराइयों तक पहुंचने वाली, रोमांच से भरी और जीवन भर याद रहने वाली यात्रा।