भारत की निर्वाचन व्यवस्था में मतदाता सूची तैयार करने से लेकर ईवीएम के उपयोग  तक विभिन्न स्तरों पर निर्धारित प्रक्रियाओं और निगरानी की व्यवस्था है। ईवीएम की कमीशनिंग, मॉक पोल, मतदान और सीलिंग की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भागीदारी तथा वीडियो रिकॉर्डिंग का प्रावधान है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की जिम्मेदारी बूथ स्तरीय अधिकारी से लेकर रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तक की होती है। चुनाव संबंधी किसी भी अनियमितता की शिकायत के लिए आरोपों के बजाय प्रमाण और निर्धारित संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

अपर कलेक्टर पद से सेवानिवृत्त डा. रजनीश श्रीवास्तव, जिन्होंने नगरीय निकायों, विधानसभा और लोकसभा की चुनाव प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई है, वोट चोरी के आरोप और निर्वाचन आयोग की वास्तविकता आलेख में 1 मई 2026 के बाद उत्पन्न देश की राजनीतिक स्थिति पर बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किए हैं।  

आलेख

वोट चोरी के आरोप और निर्वाचन आयोग की वास्तविकता

डा. रजनीश श्रीवास्तव

       मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद देश के 28 राज्यों में से 20 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी/राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार है और दो केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली और पुडुचेरी को मिलाकर कुल 22 प्रदेशों में  राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में है।

        गैर-भाजपा शासित राज्यों में अब भी 7-8 राज्य हैं, जिनमें केरल, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, जबकि तमिलनाडु, झारखंड, पंजाब और मिजोरम में अन्य गैर-राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दलों की सरकार है। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार है।

 आरोप क्या हैं?

         वर्तमान में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दलों को छोड़कर प्रायः सभी विपक्षी दल द्वारा निर्वाचन आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाया जा रहा है। यह आरोप दो तरह से लगाया जा रहा है - पहला, मतदाता सूची तैयार करने में और दूसरा, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन / ईवीएम से निर्वाचन कराने में।

 ईवीएम से वोट चोरी असंभव क्यों?

           ईवीएम को गोदाम से निकालने, उसकी कमीशनिंग करने, मॉक पोल करने तथा मतदान केंद्र पर मतदान शुरू होने से पूर्व मॉक पोल और मतदान के पश्चात मशीन को सील करने तक अलग-अलग समय पर सभी अभ्यर्थियों और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को लिखित रूप से सूचना देने तथा उनके प्रतिनिधियों की मौजूदगी में उक्त प्रक्रिया संपन्न की जाती है। इसकी बाकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जाती है। ऐसी स्थिति में ईवीएम से किसी भी प्रकार की वोट चोरी या धांधली का प्रश्न ही नहीं उठता।

         पूर्व में विपक्ष इस बात पर बार-बार सवाल उठाता रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से वोट चोरी हो रही है, मगर परिणाम अलग-अलग प्रदेशों और अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में अलग-अलग रहे हैं तथा हर राजनीतिक दल के नेता किसी न किसी चुनाव क्षेत्र से जीतते और हारते भी रहे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से मतदान के संबंध में दो महत्वपूर्ण तथ्य हैं:

(1) अवैध मत नहीं पड़ता है - मतपत्र से मतदान करने पर दो नामों के बीच गलत स्थान पर मुहर लग जाने से मत अवैध हो जाता था, जबकि ईवीएम में ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

(ब) बूथ कैप्चरिंग असंभव हो गई है - मतपत्र से मतदान में दस मिनट में 500 वोट डाले जा सकते थे, मगर मशीन से अब यह संभव नहीं है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से वोट चोरी संभव नहीं है।

मतदाता सूची कैसे बनती है?

        मतदाता सूची तैयार करने में प्रत्येक मतदान केंद्र के लिए एक बूथ स्तरीय अधिकारी नियुक्त होता है और 10 से 12 बूथ स्तरीय अधिकारियों के ऊपर एक बूथ स्तरीय सुपरवाइजर होता है। उनके ऊपर सहायक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और रजिस्ट्रीकरण अधिकारी होते हैं।

         18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके भारतीय नागरिक का नाम जोड़ना, मृत मतदाताओं के नाम हटाना, अन्य स्थान पर स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं के नाम हटाना और दोहरी प्रविष्टियों को हटाने का पूरा दायित्व बूथ स्तरीय अधिकारी से लेकर रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तक का होता है।

निर्वाचन आयोग के पास इसके लिए अलग से कोई अमला नहीं होता। वह प्रत्येक राज्य के कर्मचारियों को ही राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के माध्यम से निर्देश देता है। निर्वाचन के समय सभी कर्मचारी भारत निर्वाचन आयोग के अधीन रहते हुए भी स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर कार्य करते हैं। यह प्रक्रिया आयोग के गठन के समय से ही चली आ रही है।

      बूथ स्तरीय अधिकारी के साथ सभी राजनीतिक दलों द्वारा अपने बूथ स्तरीय एजेंट प्रत्येक मतदान केंद्र के लिए नियुक्त किए जाते हैं, जो पूरी प्रक्रिया पर नजर रखते हैं।

 इस्तीफे की मांग कितनी उचित ?

          कुछ राजनीतिक दल  भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। यह कहां तक उचित है?

        जब हम अपने पड़ोसी के बारे में यह नहीं जानते कि वह किसे वोट देकर आया है, तो निर्वाचन आयोग पूरे देश के मतदाताओं के बारे में यह कैसे समझ सकता है कि अमुक व्यक्ति किस पार्टी का है और इसलिए उसका नाम काट या जोड़ दिया जाए?

          निर्वाचन आयोग के निर्देश से कोई भी बूथ स्तरीय अधिकारी किसी व्यक्ति का नाम मनमाने ढंग से काट या जोड़ नहीं सकता।

          इस्तीफा उसको देना चाहिए, जिसको यह नहीं मालूम कि वरिष्ठ की शिकायत कहां करनी चाहिए ?  कहा जा रहा है कि दो उप निर्वाचन आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा है। यह बात गले नहीं उतरती, क्योंकि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के अधीन नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। ऐसी स्थिति में पत्राचार राष्ट्रपति को किया जाना चाहिए था।

        यह तो वही बात हो गई कि वरिष्ठ ने कार्रवाई की तो हम उसके वरिष्ठ को बताने के बजाय अपने अधीनस्थ को पत्र लिखें कि वरिष्ठ को ऐसा करने से रोका जाए।

         साथ ही, जब किसी निर्णय में एक से अधिक व्यक्ति होते हैं तो बहुमत से हुआ निर्णय ही मान्य होता है। जैसे तीन, पांच या सात न्यायाधीशों की पीठ में सभी न्यायाधीश एकमत हों, यह जरूरी नहीं। असहमति व्यक्त करने वाला देशद्रोही नहीं हो जाता।

अराजकता फैलाने का प्रयास

        इससे प्रतीत होता है कि कुछ लोग जंतर-मंतर पर धरना देकर सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। अभी एक खबर यह भी आई है कि लगभग 2,000 से अधिक तथाकथित बुद्धिजीवियों ने पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से संज्ञान लेने की मांग की है।

        यह नई परंपरा शुरू हो जाएगी कि हर व्यक्ति सिर्फ पत्र लिखकर घर में बैठ जाएगा और बिना साक्ष्य के न्याय की उम्मीद करेगा।

         यदि वास्तव में अनियमितता लगती है तो हर स्तर पर दस्तावेजी साक्ष्य के साथ शिकायत, फिर अपील और उसके बाद याचिका का रास्ता खुला है। मगर इसके लिए प्रमाण चाहिए, जो है ही नहीं। इसीलिए कोई न्यायालय नहीं जाना चाहता, बल्कि केवल सोशल मीडिया   पर मौखिक चर्चा की जा रही है।

          यह लोकतंत्र के लिए बहुत नुकसानदायक है, क्योंकि झूठ को बार-बार अलग-अलग मंचों से बोलने पर कुछ लोग उसे सच मान लेते हैं।

          भारत की निर्वाचन प्रणाली बूथ स्तरीय अधिकारी से लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त तक एक मजबूत श्रृंखला है, जिसमें हर स्तर पर पारदर्शिता और राजनीतिक दलों की निगरानी है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और मतदाता सूची, दोनों पर लगाए जा रहे आरोपों का कोई दस्तावेजी आधार नहीं है। लोकतंत्र को मजबूत करना है तो आरोपों की जगह प्रमाण के साथ निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

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न्यूज़ सोर्स : डा. रजनीश श्रीवास्तव