पुस्तक समीक्षा.....

पचास वर्षों के सिने सरोकार का झरोखा

  • डा. विनोद पुरोहित
  •  कोई छह महीने पहले विनोद नागर जी घर पधारे। वर्षों बाद उनसे मुलाकात हुई थी तो जाहिर है खूब बतियाए। गुजरे दौर को याद किया और मौजूदा हालात पर बहस मुबाहिसा हुआ। बातों बातों में उन्होंने बताया कि सिनेमा पर उनकी कुछ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने तब अपनी तीन किताबें भेंट की थीं। ये किताबें हैं-सिने सरोकार, सिने झरोखा और छपा-अनछपा। ये तो पता था कि वे फिल्मों पर लिखते हैंवर्षों से लिख रहे हैं। उनके कुछेक समीक्षाएं और आलेख अखबारों में पढ़े भी थे। अब ये सुनियोजित तरीके से किताब की शक्ल में आ गए हैंये सुखद सूचना है और विनोद जी की साधना का सुपरिणाम भी है। इन किताबों की टैग लाइन भी हैपचास साल की शब्द यात्रा के विविध आयाम। बहरहाल, मेरी पढ़ने की किताबों की लंबी सूची है। इस वजह से वे किताबें अब पढ़ पाया। 

     वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रम्हात्मज का यह कथन एकदम सटीक है कि फिल्म विधा के आकलन, विश्लेषण और निष्कर्षों में विनोद नागर फिल्मों की सामाजिक और समसामयिकता का पूरा ध्यान रखते हैं। मैं तो यह भी कहूंगा कि वे बदलती तकनीक और इससे इससे उत्पन्न प्रभाव के साथ ही कहानियों के विषयों और बदलते किरदारों की भाव, भाषा-भंगिमा का भी ध्यान रखते हैं। ज्ञान मुद्रा पब्लिकेशन से छपी उनकी किताब सिने सरोकारमें उनका लेखन खरा-खरा है। समाज और सिनेमा में चल रहे मुद्दों पर उनकी दृष्टि एकदम निष्पक्ष और तार्किक है। उनके लेखों से जाहिर है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने फिल्मों में कुछ भी दिखाने के कतई पक्षधर नहीं हैं। वे नवाचार के हामी हैं लेकिन इसके नाम पर वल्गेरिटी परोसे जाने के घोर विरोधी हैं। तभी तो वे अपने एक आलेख की सुर्खी तय करते हैंअरे वाह थप्पड़ को इतनी सी बात कैसे मान लें। नागर जी के आलेख पढ़ते समय यह रोचक और गंभीर तथ्य उभरकर सामने आता है कि वे सिनेमा और समाज के बीच उस महीन सी रेखा पर खड़े होकर अपनी राय जाहिर करते हैं, जो दोनों ( समाज और सिनेमा) को जोड़ती है और विभाजित भी करती है। इसी विभाजक रेखा पर खड़े होकर विनोद नागर दो टूक विश्लेषण करते हैं। इस स्पष्ट राय की मजबूत पृष्ठभूमि उनका गहन सामाजिक सरोकार होता है। वे सतर्क रहते हैं कि कोई भी कुरीति या कुनीति बरास्ता सिनेमा समाज को संक्रमित न कर दे। 

     समाज में घट रही हर बुरी प्रवृत्ति/आदत सिनेमा के जरिये दिखाया जाएविनोद जी इसे कतई जरूरी नहीं मानते। सिनेमा भले समाज का दर्पण माना जाता हो लेकिन एक सीमा रेखा जरूरी है, क्योंकि समाज के हर वर्ग और हर उम्र के दर्शक को सिनेमा प्रभावित करता है। इसी वजह से यह जरूरी है कि सिनेमा में नवाचार के साथ विषयवस्तु के चयन को लेकर संतुलन बेहद आवश्यक है। किताब में कुछ आलेख ऐसे हैं जो जाहिर करते हैं कि सिनेमा में सकारात्मकता का आकाश गहरा नीला और साफ है। 

    तमाम घटाटोप के बीच उनका यह लिखना आश्वस्ति भाव पैदा करता है कि फिल्म इंडस्ट्री में सब लोग खराब नहीं हैं। सुशांत राजपूत की आत्महत्या के बाद उपजे हालात और मादक पदार्थों की गिरफ्त के आरोपों से घिरी फिल्म बिरादरी की कशमकश के बीच ऐसा लिखा जाना उनकी लेखकीय जिम्मेदारी को जाहिर करता है। 

      ‘सिने सरोकारमें सिने संताप, सिने सम्मान, सिने हालात और सिने विकास जैसे बहुरंगी आलेख संकलित किए गए हैं। करीब 200 पन्नों की इस किताब की भूमिका सुपरिचित फिल्म लेखक-निर्देशक रूमी जाफरी में लिखी है। लंबे समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े रहे नागर जी को कहन का हुनर खूब आता है। उनकी भाषा सहज, सरल और रोचक है, जो पढ़ने के लिए बांधे रखती है। सिने झरोखा में गुजरे जमाने के सिनेमा और समकालीन सिनेमा का कोलाज है। इसमें समाहित आलेख भी ज्ञानवर्धक और रोचक हैं। छपा-अनछपाकिताब में वे आलेख, समीक्षाएं और संपादक के नाम पत्र शामिल किए गए हैं जो किन्हीं कारणों से पत्र-पत्रिकाओं में नहीं प्रकाशित हो पाए। 

     इन किताबों में संकलित आलेख सिनेमा में रुचि रखने वालों के लिए नई और रोचक जानकारियों का खजाना है। वहीं, पत्रकारिता से जुड़े साथियों खासकर सिनेमा में रुचि रखने वाले पत्रकारों और छात्रों के लिए यह अहम दस्तावेज हैं। विनोद जी को हार्दिक बधाईशुभकामनाएं।

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डा. पुरोहित.jpeg

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित दैनिक भास्कर, पत्रिका, नई दुनिया, अमर उजाला आदि समाचार पत्रों में सम्पादक का दायित्व बखूबी निर्वहन करने के बाद इन दिनों इंदौर में निवासरत हैं  साहित्यानुरागी डा. पुरोहित समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के साथ व्यंग्य, कविता, पुस्तक समीक्षा आदि विधाओं में भी कलम चला रहे हैं