ज्वलंत मद्दे …….दो इस्तीफे……… एक नकल न रोक पाने पर और दूसरा नकल रोकने पर................... डॉ. रजनीश श्रीवास्तव
परीक्षा में नकल रोकने वाले शिक्षकों की सुरक्षा और छात्रों के बढ़ते मानसिक दबाव को गंभीरता से लेने की जरूरत है। आत्महत्या की घटनाओं के बाद केवल पंखे या अन्य वस्तुएं हटाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। छात्रों के तनाव, अकेलेपन और असफलता के भय को समझने के लिए परिवार और संस्थानों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। नियमित परामर्श, व्यक्तिगत मार्गदर्शन, असफलता को सहज स्वीकार करने का वातावरण और शिक्षकों को संस्थागत सुरक्षा देना आवश्यक है। वास्तविक सुरक्षा भौतिक वस्तुएं हटाने से नहीं, बल्कि छात्रों में भरोसा और संवाद का वातावरण बनाने से संभव है।
ज्वलंत मद्दे …….दो इस्तीफे………
एक नकल न रोक पाने पर और दूसरा नकल रोकने पर
डॉ. रजनीश श्रीवास्तव
देश में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा का पेपर लीक हुआ तो आंदोलन हुआ, सरकार हिली और मंत्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने जश्न मनाया - "हमने सिस्टम हिला दिया।"
दूसरी खबर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई से आई। वहाँ एक प्रोफेसर ने परीक्षा में नकल रोक दी। शाम को छात्र ने आत्महत्या कर ली। कैंपस में आंदोलन शुरू, पुलिस आई और प्रोफेसर पर कार्रवाई शुरू हो गई। आरोप लगाया गया कि छात्र को प्रताड़ित किया गया।
पहली घटना में पेपर लीक कराने वाला माफिया और पेपर बेचने वाला कोचिंग माफिया गायब हो गया, पर मंत्री का इस्तीफा हो गया। दूसरी घटना में नकल रोकने वाला प्रोफेसर ही आरोपी बन गया।
हमारे देश में नकल कराना आसान है लेकिन नकल रोकना सबसे बड़ा अपराध है। मंत्री ने इस्तीफा देकर नैतिकता बचा ली, प्रोफेसर ने ईमानदारी दिखाकर नौकरी और अपने जीवन को मुकदमों में फंसा लिया।
ईमानदारी - प्राथमिकी (ऍफ़.आई.आर ) योग्य अपराध
देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान में एक प्रोफेसर ने वही काम किया जिसके लिए उसे वेतन मिलता है - नकल रोकी। नतीजा - प्राथमिकी -ऍफ़ आई आर। खबर सुनते ही बाकी ईमानदार शिक्षकों ने राहत की साँस ली कि अच्छा हुआ वे आईआईटी में नहीं पढ़ाते।
पुराने जमाने में कहते थे - "नकल करना पाप है।" नई नीति है - "नकल रोकना पाप है।"
पुलिस बधाई की पात्र है। चोरी-डकैती छोड़कर उन्होंने असली अपराधी पकड़ा है, जो बच्चों को मेहनत करने पर मजबूर कर रहा था। अगर आज नहीं रोका गया तो कल वह उपस्थिति भी माँगेगा, कार्य समय पर माँगेगा, प्रयोगशाला में प्रैक्टिकल भी करवाएगा। यह तो मानसिक स्वास्थ्य पर हमला है।
शिक्षक को चाहिए सुरक्षा
शिक्षक को अगर नकल रोकने पर ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा, तो कल कक्षा में कौन पढ़ाएगा? आज प्रोफेसर पर प्राथमिकी दर्ज हुई है, कल कोई भी शिक्षक कहेगा - "भाई, तुम नकल करो, मैं आँख बंद कर लेता हूँ, मेरी नौकरी तो बची रहेगी।" हम बच्चों को नकलची नहीं बना रहे, हम शिक्षकों को डरपोक बना रहे हैं। और डरपोक शिक्षक से पढ़ा हुआ छात्र कभी निर्भय नागरिक नहीं बन सकता। इसलिए सबसे पहले शिक्षक को सुरक्षा चाहिए - यह विश्वास कि अगर वह ईमानदारी करेगा तो संस्थान उसके साथ खड़ा है, उसके खिलाफ नहीं।
तथ्य जो कोई नहीं बताता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में हर साल हजारों छात्र आत्महत्या करते हैं। अकेले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में पिछले 5 साल में 15 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की है। कारण कभी पंखा नहीं रहा। कारण रहा - 98 प्रतिशत लाने वाले छात्रों की क्लास में 40 प्रतिशत पर फेल हो जाना, पहली बार घर से बाहर अकेले रहना, और हीन भावना से ग्रस्त होना।
पर संस्थान की फाइल में यह लिखना आसान नहीं है कि "हम बच्चों की काउंसलिंग में फेल हैं।" फाइल में यह लिखना आसान है कि "हमने 1200 पंखे हटा दिए।" आंकड़ा बड़ा दिखता है, काम हुआ जैसा लगता है, फोटो भी खिंच जाती है।
हमने कभी यह नहीं पूछा कि छात्र ने आत्महत्या से 10 दिन पहले किसी दोस्त से बात की थी या नहीं। हम सिर्फ यह देखते हैं कि कमरे में पंखा था या नहीं। यह वही बात है कि मरीज बुखार से मर गया और डॉक्टर कहे कि हमने तो थर्मामीटर बदल दिया था।
परिवार की भूमिका - सबसे बड़ा अनदेखा सच
इस पूरी घटना में हम शिक्षक और प्रशासन को तो कोस रहे हैं, पर परिवार की जिम्मेदारी पर कोई बात नहीं कर रहा।
आज माता-पिता ने बच्चे के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में जाने पर पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँटी - "हमारा बेटा तो अब लाखों का पैकेज लेगा।" पर क्या हमने कभी उससे पूछा - "बेटा, तू खुश है क्या?"
हमने बच्चे पर अपने अधूरे सपनों का बोझ लाद दिया। जब छात्र फोन करता है कि "पापा, यहाँ बहुत दबाव है", तो जवाब आता है - "बेटा, थोड़ा सह ले, उसके बाद तो जिंदगी बन जाएगी।" कभी-कभी बच्चे को लाखों के पैकेज की नहीं, माँ के हाथ की चाय और पिता के इस वाक्य की जरूरत होती है - "नौकरी न भी लगी तो क्या हुआ, तू घर आ जा, हम हैं ना।"
संस्थान में परामर्शदाता बाद में आएगा, पहले घर में सुनने वाला चाहिए।
कोचिंग माफिया और ग्रेड का सच
पंखा तो हमने हटा दिया, पर वह सिस्टम नहीं हटाया जो बच्चे को 12 साल की उम्र से कोटा में 16 घंटे पढ़ने पर मजबूर करता है। और कैंपस में ग्रेड सिस्टम - 10 में से 6 मिला तो तू नालायक। पंखा हटाने से ग्रेड नहीं हटेगा, कोचिंग की मानसिकता नहीं हटेगी।
पंखा हटाओ अभियान - आपदा में अवसर
आत्महत्या के बाद प्रशासन ने ताबड़तोड़ तनाव की जड़ खोज ली - पंखा। और अब दूसरा चरण शुरू हो गया है - सीलिंग फैन हटाकर दीवाल में लगने वाले पंखे लगाए जा रहे हैं।
यह तो आपदा में अवसर वाला फॉर्मूला है। पुराने पंखे बेचो, नए पंखे खरीदो और लगाओ। टेंडर निकालो, बजट बनाओ, बिल पास कराओ। फाइल में लिख दो - "छात्र हित में बड़ा सुधार किया।"
किसी ने नहीं पूछा कि पंखा छत पर हो या दीवार पर, फंदा कहीं भी बनाया जा सकता है। मकसद पंखा हटाना नहीं, मकसद नया पंखा लगाना है।
अब क्या-क्या बैन होगा? - भविष्य में होने वाले बैन का पूरा ब्लू-प्रिंट यह लग रहा है
प्रशासन की इस त्वरित कार्रवाई से हम सब आश्वस्त हैं। पंखा हट गया, अब अगले नोटिस की प्रतीक्षा है -
1. डाइनिंग हॉल के छुरी-कांटे: छात्र ने अगर पंखा न मिलने पर छुरी कांटे से कुछ कर लिया तो? बेहतर है पहले ही सारे छुरी-कांटे हटा लिए जाएं। छात्र हाथ से खाएगा तो सभ्यता थोड़ी कम होगी, पर फाइल में सुरक्षा 100 प्रतिशत दिखेगी।
2. दाढ़ी बनाने की ब्लेड: हर छात्र के पास ब्लेड है। यह भी तो धारदार हथियार है। इसलिए सभी हॉस्टलों से ब्लेड जब्त कर ली जाए। छात्र दाढ़ी बढ़ाकर साधु जैसे लगेंगे, पर कैंपस सुरक्षित कहलाएगा।
3. मैकेनिकल इंजीनियरिंग की मशीनें: यह सबसे खतरनाक विभाग है। वहाँ लेथ मशीन, ड्रिल मशीन, कटर, हथौड़े हैं। अगर सुरक्षा ही करनी है तो इस पूरे विभाग पर ही ताला लगा दो। न मशीन रहेगी, न इंजीनियर बनेगा, न तनाव होगा।
4. केमिकल लैब के केमिकल: केमिस्ट्री लैब में तो जहर ही जहर रखा है। छात्र उदास हुआ और लैब से कुछ पी लिया तो? इसलिए पूरी केमिस्ट्री लैब ही बैन कर दो।
5. रस्सी, बेल्ट, गमछा, दुपट्टा: पंखा तो हट गया, पर फंदा तो रस्सी से भी बनता है, बेल्ट से भी। तो क्यों न इन सब पर भी प्रतिबंध लगा दिया जाए? छात्र बिना बेल्ट के पायजामा पकड़ कर घूमेगा, पर सुरक्षित रहेगा।
6. बालकनी, खिड़की, सीढ़ियां और झील: छात्र अगर बालकनी से कूद गया तो? तो बालकनी पर भी जाली, खिड़की पर भी जाली, सीढ़ियों पर भी ताला। कैंपस में पवई झील है, वह भी गहरी है, उस पर भी दीवार बना दो। बेहतर है पूरे हॉस्टल को ही ग्राउंड फ्लोर का बना दो।
7. विद्युत,मोबाइल और इंटरनेट: छात्र करंट लगने से भी तो मर सकता है इसलिए बिजली बन्द सिर्फ धूप की रोशनी में पढ़ाई होगी। छात्र रात भर मोबाइल पर रील देख कर अवसाद में जाता है। सबसे अच्छा है मोबाइल और वाई-फाई ही बैन कर दो। फाइल में लिखा जाएगा - "डिजिटल डिटॉक्स कराया।"
8. हाजिरी और परीक्षा ही बैन: अगर सच में तनाव कम करना है तो हाजिरी ही बैन कर दो। 75 प्रतिशत हाजिरी का दबाव ही तो छात्र को मारता है। और परीक्षा - परीक्षा ही तनाव की जड़ है। परीक्षा ही बैन कर दो, सब पास, सब खुश।
9. काउंसलिंग का नाटक: हर आत्महत्या के बाद एक ईमेल आता है - "काउंसलिंग सेल से संपर्क करें।" वह सेल कहाँ है, किसी को नहीं पता। एक कमरा है, जिसमें एक रजिस्टर है। छात्र वहाँ जाएगा तो लोग कहेंगे - "देखो, वो पागल हो गया है।" इसलिए कोई नहीं जाता। पंखा हटाने के लिए 10 मजदूर लगते हैं, काउंसलर रखने के लिए एक ईमानदार नियत लगती है।
और अंत में एक अंतिम ऐतिहासिक नोटिस आएगा - "छात्र ही कैंपस में बैन, तो आत्महत्या भी अपने आप बैन। शत-प्रतिशत सफलता।"
हमने बाहर की दुनिया की हर चीज पर जाली लगा दी। डाइनिंग की छुरी पर, दाढ़ी की ब्लेड पर, वर्कशॉप की मशीन पर, लैब के केमिकल पर, विद्युत व्यवस्था पर,रस्सी-बेल्ट पर। पर जो खाई छात्र के मन में बन रही है - अकेलेपन की, "तू फेल है" वाली फुसफुसाहट की - उस पर कोई जाली नहीं लग रही। बाहर की खाई पर जाली लगाना आसान है, अंदर की खाई पर पुल बनाना मुश्किल है।
बिल्डिंग गिराने से बिल्डिंग गिरती है, हौसला नहीं बनता। पंखा बदलने से हवा की दिशा बदलती है, मन की नहीं।
समाधान पंखा हटाना नहीं है। समाधान है - घर में सुनने वाले कान, हर 10 छात्रों पर एक मेंटर, 24 घंटे परामर्श सुविधा, फेल होने को अपराध न मानने की संस्कृति, और प्रोफेसर को सजा नहीं, कानूनी सुरक्षा देना होगा।
असली जाली लोहे की नहीं, भरोसे की चाहिए। असली सुरक्षा पंखा हटाने में नहीं, पास बैठ कर चाय पिलाने में है। और यह कहने में कि - तू घबराता क्यों है, मैं हूँ ना।
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- डा रजनीश श्रीवास्तव अपर कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्ति के बाद इंदौर में निवास एवं स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले डा श्रीवास्तव सामयिक और ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय व्यक्त करते हैं। उनके आलेखों में समस्या का सूक्ष्म गहन विश्लेषण और समाधान भी रहता है।

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