बाल गणेश की माँ पार्वती से पुकार ... “माँ, अबकी बार मैं नहीं जाऊँगा ! ..................आलेख................ मधुकर पवार
गणेशोत्सव आस्था और भक्ति का पर्व है, लेकिन विसर्जन के बाद प्रतिमाओं की दुर्दशा हमारी श्रद्धा और विवेक पर सवाल खड़े करती है। पीओपी की प्रतिमाएं जलस्रोतों को प्रदूषित करने के साथ विसर्जन के बाद अपमानजनक स्थिति में पहुंचती हैं, इसलिए मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देना जरूरी है। प्रतिमा निर्माण से लेकर बिक्री और विसर्जन तक नियमों के पालन की जिम्मेदारी प्रशासन, मूर्तिकारों और श्रद्धालुओं—सभी की है। घर या स्थानीय स्तर पर स्वच्छ पात्र में विसर्जन कर मिट्टी का उपयोग पौधों में किया जा सकता है। गणेश और दुर्गा प्रतिमाओं को जलस्रोतों में फेंकना नहीं, सम्मानपूर्वक प्रकृति में लौटाना ही सच्चा विसर्जन है।
बाल गणेश की माँ पार्वती से पुकार
“माँ, अबकी बार मैं नहीं जाऊँगा !
मधुकर पवार
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी आते ही देश गणपति बप्पा के जयकारों से गूंज उठता है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक सहित अनेक राज्यों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं घर-घर और सार्वजनिक पंडालों में स्थापित होती हैं। ढोल-नगाड़े बजते हैं। आरती होती है। मोदक चढ़ाए जाते हैं। भक्त अपने आराध्य से सुख, समृद्धि, बुद्धि और संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। दस दिनों तक गणेश जी हमारे घरों और पंडालों में श्रद्धा के केंद्र बने रहते हैं।
लेकिन अनंत चतुर्दशी आते ही एक कड़वी सच्चाई सामने खड़ी हो जाती है। दस दिन तक भगवान गणेश की पूरी आस्था, भक्ति और श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं, उसी प्रतिमा को विसर्जन के बाद हम किस हालत में छोड़ आते हैं? ट्रकों और ट्रेक्टरों में भरकर प्रतिमाओं को नदियों और तालाबों तक ले जाते हैं और जिस तरह से फेंकते हैं , बेहद अपमानजनक होता है।
नदी किनारे जाइए। तालाब के आसपास देखिए। विसर्जन के बाद की तस्वीरें देखिए। कहीं टूटा हुआ हाथ पड़ा है, कहीं धड़, कहीं मुकुट। कहीं प्रतिमा कीचड़ में आधी दबी है तो कहीं पूजा सामग्री के ढेर के बीच भगवान का चेहरा दिखाई देता है।

जिस प्रतिमा के सामने दस दिन तक सिर झुकाया गया, उसके टूटे अंगों को देखकर भी क्या हमारी आत्मा नहीं कांपती?
कल्पना कीजिये विसर्जन के बाद जब भगवान गणेश अपने धाम में वापस जाते हैं तब वे अपनी माता पार्वती से क्या कहते होंगे
“मां, अबकी बार मैं पृथ्वी पर नहीं जाऊंगा।”
पार्वती पूछती हैं—“क्यों पुत्र?”
गणेश की आंखें भर आती हैं।
“मां, भक्त मुझे बड़े प्रेम से बुलाते हैं। घर लाते हैं। फूल चढ़ाते हैं। आरती उतारते हैं। मेरे सामने अपनी परेशानियां रखते हैं। मैं भी उनके सुख-दुख में उनके साथ रहता हूं। लेकिन दस दिन बाद वे मुझे नदियों और तालाबों में फेंक देते हैं लावारिश छोड़ देते हैं। इससे मेरा शरीर टूटता है। मेरा हाथ अलग हो जाता है। मुकुट टूट जाता है। चेहरा मिट्टी में दब जाता है। मां, मुझे बहुत दर्द होता है।”
पार्वती पूछती हैं—“तो तुम चाहते क्या हो?”
बाल गणेश कहते हैं—
“मां, मुझे बुलाना है तो मिट्टी से बनाकर बुलाओ। और विदा करना है तो सम्मान से विदा करो। मेरे नाम पर नदियों और तालाबों को गंदा मत नदियों को पवित्र रहने दो ।”
भले ही यह संवाद काल्पनिक है, लेकिन इसके पीछे छिपा प्रश्न हमारे समाज के सामने बिल्कुल वास्तविक है।
गणेश जी को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। फिर उनके उत्सव में विवेक सबसे पीछे क्यों चला जाता है? हम अपने विवेक से काम क्यों नहीं लेते ? गणेश उत्सव कब भक्ति से भव्यता में परिवर्तित हो जाता है, पता ही नहीं चलता । प्रतिमा कितनी ऊंची है? पंडाल कितना विशाल है? सजावट कितनी महंगी है? आयोजन में कितनी भीड़ है? ध्वनि कितनी तेज है?
क्या यही गणेश उत्सव की सफलता का पैमाना है
क्या भगवान की पूजा प्रतिमा की ऊंचाई से तय होगी?
हम भूल रहे हैं कि भगवान को भव्यता नहीं, भावना चाहिए, श्रद्धा और भक्ति चाहिए । मिट्टी की छोटी-सी प्रतिमा भी उतनी ही श्रद्धा का केंद्र हो सकती है, जितनी विशाल प्रतिमा। अंतर केवल इतना है कि मिट्टी की छोटी प्रतिमा पूजा के बाद प्रकृति में वापस लौट सकती है, जबकि पीओपी की प्रतिमाएं जलस्रोतों के लिए समस्या बन सकती हैं।
पीओपी की प्रतिमाओं पर रोक है !
प्रशासन द्वारा हर साल गणेशोत्सव शुरू होने के करीब डेढ़ - दो माह पहले प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी की प्रतिमाओं को लेकर निर्देश जारी किए जाते हैं। अपील की जाती है कि मिट्टी की प्रतिमाएं बनाएं । फिर भी बाजार में बड़ी संख्या में पीओपी की प्रतिमाएं कैसे पहुंच जाती हैं?
यह सवाल केवल प्रशासन से नहीं, पूरी व्यवस्था से है। प्रतिमा कहां बनती है? किसने बनाई? किसने बेची? किसने खरीदी? किसने स्थापित की? और अंत में किसने उसे जलस्रोत में विसर्जित किया? इन सबकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

यदि नियम हैं तो उनका पालन भी होना चाहिए। केवल त्योहार से पहले बैठकें करने और विसर्जन के दिन घाटों पर व्यवस्था करने से काम नहीं चलेगा। नियमों की निगरानी प्रतिमा निर्माण से लेकर बिक्री तक होनी चाहिए। और यदि कोई नियम तोड़ता है तो कार्रवाई भी केवल कागज पर नहीं, जमीन पर दिखाई देनी चाहिए।
हम सिर्फ प्रशासन और मूर्तिकारों को दोष देकर बच नहीं सकते। यहां सार्वजनिक स्थानों और घरों में स्थापित करने वालों की जिम्मेदारी होती है। जब तक श्रद्धालु पीओपी की बड़ी और आकर्षक प्रतिमाएं खरीदते रहेंगे, तब तक मूर्तिकार उन्हें बनाते रहेंगे। इसलिए सबसे बड़ा बदलाव सरकारी आदेश से नहीं, हमारी खरीदारी के निर्णय से आएगा। हम मिट्टी की प्रतिमा मांगेंगे तो मूर्तिकार मिट्टी की प्रतिमा ही बनाएंगे । हम पर्यावरण-अनुकूल रंगों वाली प्रतिमा मांगेंगे तो निर्माता उसी दिशा में जाएगा। हम छोटी और सहज प्रतिमा को सम्मान देंगे तो दिखावे की प्रतियोगिता कमजोर होगी। परिवर्तन की असली शक्ति भक्त के हाथ में है।
मिट्टी का गणेश- सबसे सरल समाधान
हमारा शरीर पांच तत्वों मिट्टी, जल, वायु अग्नि और आकाश से बना है। इन्हीं तत्वों में से एक तत्व मिट्टी से प्रतिमा बनाएंगे तो विसर्जन के बाद यह प्रतिमा भी इन्ही तत्वों में विलीन हो जाएगी। इससे न तो जल प्रदूषित होगा और न ही प्रतिमा के अवशेष तालाबों, नदियों, पोखरों और जल स्रोतों के निकट बेतरतीब अपमानजनक स्थिति में पड़े रहेंगे।
यह भी देखना होगा कि विसर्जन के लिए नदी या तालाब तक प्रतिमा ले जाना अनिवार्य नहीं है। घर में स्वच्छ पात्र में प्रतिमा का विसर्जन किया जा सकता है। मिट्टी के घुलने के बाद उस मिट्टी और जल का उपयोग पौधे लगाने और गमलो में किया जा सकता है। इसी तरह सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित की गयी प्रतिमाओं को भी पवित्रता के साथ स्थानीय स्तर पर ही विसर्जित किया जा सकता है। इसके लिए केवल इच्छा शक्ति की जरूरत है। सार्वजनिक गणेश उत्सव समितियां भी प्रशासन द्वारा निर्धारित सुरक्षित और स्वच्छ विसर्जन व्यवस्था का उपयोग कर सकती हैं।
वास्तव में गणेश जी अथवा माँ दुर्गा जी की प्रतिमाओं को नदी, तालाब, पोखरों और अन्य जल स्रोतों के में छोड़ना ही विसर्जन नहीं है। भगवान को सम्मानपूर्वक प्रकृति में लौटाना विसर्जन है। नदियां जीवन की धारा हैं। तालाब केवल त्योहारों के लिए नहीं, बल्कि भूजल, पशु-पक्षियों और मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
गणेशोत्सव के बाद शारदीय नवरात्र पर्व भी देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में सार्वजनिक पंडालों में दुर्गा देवी, काली देवी और देवी के नौ स्वरूपों की स्थापना की जाती हैं। नौ दिनों के बाद विजयादशमी के दिन प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। दुर्गा जी की प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जो गणेश जी की प्रतिमाओं के विसर्जन के समय होती हैं।
ये उत्सव हमारी संस्कृति, आस्था और राष्ट्रीय पहचान है लेकिन जब हमारे आराध्यों की प्रतिमाओं को हम ही विसर्जन के बाद देखकर शर्मिन्दा होते हैं तब सभी के मन में यह भाव जरूर उत्पन्न होता है कि काश प्रतिमाओं को विसर्जन के बाद इस दशा में पहुंचाने वाले हम आप ही हैं। इसलिए हम सब का दायित्व है कि श्री गणेश और माँ दुर्गा जी की प्रतिमाओं का विसर्जन और इसके बाद मर्यादा और सम्मान यथावत रहे अर्थात प्रतिमाएं विसर्जन के बाद विसर्जन स्थल के इधर - उधर बिखरी न हो। और यह तभी सम्भव है जब प्रतिमाएं मिट्टी से बनाएंगे। इसमें प्रशासन केवल आदेश जारी कर अपनी इतिश्री न करें , मूर्तिकार भी दिशा - निर्देशों का कड़ाई से पालन करें और प्रतिमाएं स्थापित करने वाले यह संकल्प लें कि वे केवल मिट्टी की ही प्रतिमाओं की स्थापना करेंगे।
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