ग्रीन इंडिया मिशन के तहत 2030 तक वन आवरण की गुणवत्ता सुधारने और कार्बन सिंक क्षमता बढ़ाने के लक्ष्य के बावजूद अब तक उपलब्धि बेहद निराशाजनक रही है। कैग के 16 राज्यों के ऑडिट में लक्ष्य का केवल करीब 8 प्रतिशत ही पूरा होने की बात सामने आई है। मध्यप्रदेश में भी 3,40,700 हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 26,939 हेक्टेयर में पौधारोपण हुआ। कई राज्यों में कार्बन सीक्वेस्टरेशन का आकलन तक नहीं किया गया। मध्यप्रदेश में समितियों की कार्यप्रणाली, ऑडिट और पौधारोपण स्थलों की जांच में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। ऐसे में सरकार को जिम्मेदारी तय कर मिशन के लक्ष्यों की समयबद्ध पूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।

सरोकार

12 साल पहले शुरू हुआ ग्रीन इंडिया मिशन फेल

लक्ष्य की केवल 8 प्रतिशत ही उपलब्धि रही

  •  डा. चन्दर सोनाने

       बरसात के मौसम में पौधे लगाओ, पर्यावरण बचाओ के नारे खूब बुलंद होते हैं। किंतु असल में वास्तविक धरातल पर हालात बिल्कुल उलट हैं। देश में वर्ष 2012 में शुरू किए गए ग्रीन इंडिया मिशन की 12 साल बाद भी उपलब्धि मात्र 8 प्रतिशत रही! यानी लक्ष्य का 92 प्रतिशत काम अब भी बाकी है। यह तस्वीर और हालात अत्यंत निराशाजनक और चिंताजनक हैं।

        कैग के देश में 16 राज्यों के ऑडिट में उक्त तथ्य सामने आया है। इस मिशन के अंतर्गत देशभर में 14 लाख हेक्टेयर में वन आवरण की गुणवत्ता में सुधार का लक्ष्य तय किया गया था। इसमें से 12 साल में केवल 1.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही यह काम किया गया। अर्थात लक्ष्य का मात्र 8 प्रतिशत ही प्राप्त किया जा सका। इसी प्रकार, इस मिशन के अंतर्गत कार्बन सीक्वेस्टरेशन का आकलन 16 राज्यों में से केवल दो राज्योंमध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़  ने ही किया। बाकी राज्यों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।

        मध्यप्रदेश राज्य की स्थिति देखें तो यहां ग्रीन इंडिया मिशन के अंतर्गत वर्ष 2012 में 3,40,700 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधारोपण का लक्ष्य तय किया गया था। इसमें से मात्र 26,939 हेक्टेयर क्षेत्र में ही पौधारोपण किया गया। यानी लक्ष्य की केवल 7.91 प्रतिशत उपलब्धि रही। अर्थात 92.09 प्रतिशत लक्ष्य की पूर्ति नहीं की जा सकी। मध्यप्रदेश में भी अन्य राज्यों की तरह पौधारोपण को लेकर खूब हल्ला मचा, किंतु वास्तविक स्थिति अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है।

        कैग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि देश के 16 राज्यों में से सिर्फ दो राज्यों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2015-25 के दौरान कार्बन सीक्वेस्टरेशन का आकलन किया गया। कैग ने यह भी कहा कि 14 राज्यों ने कार्बन सीक्वेस्टरेशन का आकलन किया ही नहीं। इसलिए मिशन का जलवायु परिवर्तन से निपटने में वास्तविक असर मापा ही नहीं जा सका।

        इस ग्रीन इंडिया मिशन के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन सीओ2 इक्विवेलेंट कार्बन सिंक क्षमता विकसित करने का लक्ष्य तय किया गया है। अक्टूबर 2015 में इस संबंध में सभी राज्यों को निर्देश दिए गए थे। किंतु मार्च 2025 तक दो राज्यों को छोड़कर ज्यादातर राज्यों ने इसका पालन ही नहीं किया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ने कार्बन सोखने की मात्रा मापने के लिए घाटपुर और सोनहट में दो फ्लक्स टावर लगाए। इन दोनों पर करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये खर्च भी किए गए। वर्ष 2020 में शुरू की गई इस व्यवस्था में सेंसर और अन्य तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण पूरा सिस्टम बेकार पड़ा है। कैग ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

        कैग ने अपने ऑडिट के निष्कर्ष में यह भी बताया कि ग्रीन इंडिया मिशन में सभी राज्यों में हर स्तर पर निगरानी में काफी कमियां रही हैं। यह भी पता नहीं चल सका कि जीआईएम ने जलवायु परिवर्तन से निपटने में कितना योगदान दिया है।

        कैग द्वारा मध्यप्रदेश में किए गए ऑडिट में यह भी पता चला कि 14 समितियों ने बिना किसी प्लान के ही काम कर दिया। प्रदेश के आठ संभागों में 70.67 करोड़ रुपये का भुगतान भी विभागीय स्तर पर कर दिया गया। कैग की रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि 145 समितियों में से मात्र पांच समितियों ने ही सीए से ऑडिट कराया। बाकी समितियों ने ऑडिट कराने का कष्ट ही नहीं उठाया।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में 444 हेक्टेयर में काम शुरू होना बताया गया, लेकिन कैग द्वारा की गई जांच में आरएफ-269 सहित अन्य साइटों पर कई जगह हरियाली नहीं मिली। यही नहीं, 68 हेक्टेयर की एक साइट पर कोई काम ही नहीं मिला। कैग ने इस स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की है।

        यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले दो दशकों में मध्यप्रदेश सहित देश के सभी राज्यों में वन विभाग का अनाप-शनाप विस्तार किया गया। जिन जिलों में जिला अधिकारी के रूप में केवल एक वन मंडलाधिकारी और संभाग स्तर पर वन संरक्षक पदस्थ रहते थे, वहीं संभाग स्तरीय पद को जिला स्तरीय बना दिया गया। अर्थात जिलों में वन मंडलाधिकारी की जगह वन संरक्षक पदस्थ किए गए। इसी प्रकार संभाग स्तर पर वन संरक्षक से उच्च पदों के अधिकारी पदस्थ किए गए। इसके साथ ही जिलों और संभागों में अन्य अधिकारियों की भी पहले से अधिक तैनाती की जाने लगी। इसके बावजूद ग्रीन इंडिया मिशन के लक्ष्य और उपलब्धि आंखें खोलने वाली है। वन विभाग के अधिकारी अपने पद के कर्तव्यों का पालन ही नहीं कर रहे हैं।

         ग्रीन इंडिया मिशन की यह हालत बता रही है कि देश में सभी राज्य पौधारोपण के प्रति अत्यंत लापरवाह हैं। देश के 16 राज्यों में किए गए ऑडिट में एक भी राज्य में ऐसी उपलब्धि नजर नहीं आई, जो उल्लेखनीय हो। यह स्थिति अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है। केंद्र सरकार को चाहिए कि जिन राज्यों में लक्ष्य की दयनीय उपलब्धि है, उन राज्यों के प्रदेश, संभाग और जिला स्तर के वन विभाग के अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई करे, जो अपने कर्तव्य पालन में नाकाम रहे हैं।

        इसके साथ ही राज्यों से इस बारे में सवाल-जवाब तलब किए जाएं और ग्रीन इंडिया मिशन के वर्ष 2030 तक के लक्ष्यों को गंभीरतापूर्वक पूरा करने के लिए सख्त निर्देश दिए जाएं। तभी उस अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति संभव होगी, जिसके तहत ग्रीन इंडिया मिशन शुरू किया गया था।

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डा. चंदर सोनाने मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से संयुक्त संचालक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उज्जैन में निवास कर रहे हैं। उनकी सामयिक और सामाजिक विषयों पर विशेष रूचि है और वे “सरोकार” स्तम्भ मे जरिये जनहित से सरोकार रखने वाले मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय व्यक्त करते हैं।

 

न्यूज़ सोर्स :  डा. चन्दर सोनाने