नजरिया....................... त्विशा की मौत और न्यायपालिका के सामने खड़े होते सवाल ..................... अरूण कुमार जैन
नजरिया
त्विशा की मौत और न्यायपालिका के सामने खड़े होते सवाल
* अरूण कुमार जैन
एक ही दिन में प्रकाशित कई समाचारों और विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों पर यदि समग्र दृष्टि डाली जाए तो वे केवल कुछ अलग-अलग घटनाएं नहीं लगती, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण स्तंभ की कमजोरियों की ओर गंभीर संकेत करते दिखाई देते हैं। ये घटनाएं न केवल न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े करती हैं, बल्कि उसकी बुनियादी खामियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती हैं।
भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके तीन प्रमुख स्तंभ - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। किसी एक स्तंभ के कर्तव्य निर्वहन में कमी आने पर दूसरा उसे नियंत्रित और संतुलित करने का प्रयास करता है। इनमें न्यायपालिका को विशेष स्थान प्राप्त है। संविधान प्रदत्त शक्तियों के आधार पर वह न केवल विवादों का निराकरण करती है, बल्कि अपने निर्णयों के माध्यम से न्याय और नैतिकता के मानदंड भी स्थापित करती है।
लेकिन समय के साथ समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह नैतिक गिरावट यदि हर जगह दिखाई दे रही है, तो न्यायपालिका उससे पूरी तरह अछूती कैसे रह सकती है? भारतीय न्याय व्यवस्था को लेकर आम नागरिकों की शिकायतें नई नहीं हैं। अदालतों में वर्षों तक चलने वाले मुकदमे, तारीख पर तारीख की संस्कृति, न्यायालयीन प्रक्रियाओं की जटिलता, अधिवक्ताओं और बाबू तंत्र की भूमिका, सम्मन और वारंट की तामील में होने वाली देरी, पुलिस की कार्यप्रणाली तथा कई स्तरों पर धनबल के प्रभाव जैसे प्रश्न लंबे समय से उठते रहे हैं।
त्विशा की मौत का मामला इन सवालों को और अधिक तीखे रूप में सामने लाता है। जिस प्रकार मृतका की सास, जो स्वयं पूर्व न्यायाधीश हैं और वर्तमान में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की अध्यक्ष हैं, तथा मृतका के अधिवक्ता पति के पक्ष में प्रारंभिक परिस्थितियां बनती दिखाई दीं, उससे व्यवस्था के विभिन्न अंगों के बीच संभावित सांठगांठ को लेकर गंभीर आशंकाएं पैदा हुईं। यह पूरा घटनाक्रम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया की भूमिका को भी रेखांकित करता है। मीडिया की सतत निगरानी और पीड़ित परिवार के अदम्य संघर्ष ने ही इस मामले को दबने नहीं दिया।
जिस परिवार की बेटी ने संदिग्ध परिस्थितियों में जान गंवाई, उसने न्याय मिलने तक शव का अंतिम संस्कार करने से इंकार कर दिया। न्यायालय के आदेशों के बावजूद पुनः पोस्टमार्टम की मांग पर उनका अडिग रहना, घटना के बाद पति का जमानत की कोशिशों के बीच सार्वजनिक जीवन से गायब हो जाना तथा दिल्ली एम्स के चिकित्सकों द्वारा पुनः पोस्टमार्टम की आवश्यकता पर बल देना, ये सभी घटनाएं मामले को और गंभीर बनाती गईं।
इसके साथ ही मृतका के भाई का सेना में उच्च पद पर होना, परिवार का दिल्ली में निवास करना और राष्ट्रीय मीडिया द्वारा मामले को प्रमुखता से उठाना भी महत्वपूर्ण कारक बने। बढ़ते जनदबाव और मीडिया की निरंतर निगरानी के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया और अंततः मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई।
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि यह मामला किसी साधारण परिवार से जुड़ा होता, यदि मृतका का भाई सेना में उच्च पद पर न होता, यदि परिवार के पास संसाधन और धैर्य न होता, तो क्या न्याय की यह प्रक्रिया इतनी दूर तक पहुंच पाती? माता-पिता का न्याय के लिए दृढ़ संकल्प, आठ दिनों तक बेटी के शव का अंतिम संस्कार न करना, गहन मानसिक पीड़ा के बावजूद एक अपरिचित शहर में लगातार संघर्ष करते रहना और हाथों में तख्तियां लेकर सप्ताह भर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना, ये सभी घटनाएं बताती हैं कि न्याय पाने के लिए उन्हें कितना कठिन संघर्ष करना पड़ा।
अंततः इन्हीं प्रयासों और बढ़ते दबाव का परिणाम था कि राज्य सरकार को मामला सीबीआई जांच के लिए भेजना पड़ा। इससे पहले गठित एसआईटी की जांच को लेकर भी अनेक सवाल उठे। जांच की गति, रिपोर्ट की गुणवत्ता, उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों की कथित अनदेखी, पोस्टमार्टम प्रक्रिया पर उठे प्रश्न तथा मृतका की सास द्वारा अपने प्रभाव और पद का लाभ उठाने के आरोप, इन सबने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया। यह तथ्य और भी चिंताजनक है कि मृतका एक ख्यातनाम कलाकार थीं और उनका परिवार भी प्रभावशाली था, फिर भी उन्हें न्याय के लिए इतना लंबा संघर्ष करना पड़ा।
उसी दिन सामने आए अन्य घटनाक्रम भी न्यायपालिका को लेकर चिंताएं बढ़ाते हैं। मध्यप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी को पुरस्कार दिलाने के लिए कथित रूप से फर्जी न्यायिक आदेश तैयार किए जाने के मामले में निलंबित न्यायाधीश की गिरफ्तारी और बाद में अग्रिम जमानत पर रिहाई ने भी अनेक प्रश्न खड़े किए हैं।
इसी बीच मद्रास हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार मौजूद है और इस कैंसर को समाप्त करना स्वयं न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। न्यायालय ने यह भी कहा कि वकीलों की मिलीभगत के बिना न्यायिक भ्रष्टाचार संभव नहीं है। साथ ही यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की गई कि न्यायपालिका को आत्मनिरीक्षण और सुधार के लिए तीखी आलोचना तथा सार्वजनिक बहस का स्वागत करना चाहिए।
कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के आवास पर आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नोट जलने का मामला भी चर्चा में रहा। प्रारंभिक स्तर पर पुलिस द्वारा पंचनामा तैयार करने में दिखाई गई अनिच्छा और बाद में मीडिया में मामला उजागर होने के बाद हुई कार्रवाई ने भी कई सवाल पैदा किए। तीखी आलोचनाओं के बाद संबंधित न्यायाधीश का स्थानांतरण कर दिया गया, किंतु बाद में जांच में आरोपों की पुष्टि होने पर उन्हें अंततः इस्तीफा देना पड़ा। प्रश्न यह है कि यदि परिस्थितियां इतनी गंभीर थीं तो स्थानांतरण के बजाय तत्काल कठोर कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
ये सभी घटनाएं ऐसे समय सामने आ रही हैं जब न्यायाधीशों की सुविधाएं और संसाधन पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़े हैं, फिर भी लाखों मामले वर्षों तक लंबित पड़े हैं। न्याय प्राप्ति में होने वाली देरी केवल न्यायिक प्रक्रिया की कमजोरी नहीं है, बल्कि आम नागरिक के विश्वास को भी कमजोर करती है। स्थिति यह हो गई है कि अनेक लोग वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने और मानसिक यातना झेलने के बजाय अन्याय सह लेना अधिक आसान समझने लगे हैं।
क्या न्यायपालिका स्वयं इस स्थिति को महसूस नहीं करती? क्या उसकी गिरती साख के लिए वह स्वयं भी कुछ हद तक जिम्मेदार नहीं है? यदि हां, तो फिर सुधार की दिशा में व्यापक और ठोस प्रयास अब तक क्यों दिखाई नहीं देते? क्या न्यायपालिका अपने विरुद्ध किसी बड़े जनआंदोलन या और अधिक गंभीर आरोपों की प्रतीक्षा कर रही है?
यह भी विचारणीय है कि न्यायालय जब अन्य विभागों और संस्थाओं की कार्यप्रणाली की कठोर समीक्षा कर सकता है, तो अपनी व्यवस्था में व्याप्त समस्याओं के समाधान के लिए उतनी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाता? न्यायिक भ्रष्टाचार, प्रक्रियागत जटिलताओं और विलंब को रोकने के लिए कोई प्रभावी एवं पारदर्शी तंत्र अब तक क्यों विकसित नहीं हो पाया है? पीड़ितों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने के लिए जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो पा रहे हैं?
त्विशा की मौत का मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। इसने न्याय व्यवस्था की उन परतों को उजागर किया है जहां प्रभाव, प्रतिष्ठा, पद, राजनीतिक संपर्क और धनबल के आरोप बार-बार सामने लगते रहे। यह मामला न्यायपालिका को अपने भीतर झांकने और आत्ममंथन करने के लिए बाध्य करता है।
समय की मांग है कि न्यायपालिका इन संकेतों को गंभीरता से सुने। केवल न्याय करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि न्यायिक व्यवस्था समय-समय पर आत्मनिरीक्षण करे, स्वतंत्र सर्वेक्षणों और जन प्रतिक्रिया के आधार पर अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करे तथा व्यापक संस्थागत सुधारों की दिशा में आगे बढ़े।
देश की जनता को न्याय के नाम पर अनिश्चित प्रतीक्षा और मानसिक यातना नहीं, बल्कि समयबद्ध, पारदर्शी और निष्पक्ष न्याय चाहिए। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। (आलेख में लेखक के अपने निजी विचार हैं। )
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अरूण कुमार जैन भारतीय राजस्व सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। वे ज्वलंत और सामयिक विषयों पर निरंतर लेखन कर रहे हैं। इसके साथ ही श्री जैन कविताएं और व्यंग्य विधा में भी पारंगत हैं।

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