रोहिणी नौतपा और बढ़ते तापमान का प्रभाव...........आलेख........... डा. सुमन शर्मा
रोहिणी नौतपा 25 मई से 2 जून तक का वह नौ दिवसीय काल है, जब सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने के कारण वर्ष की सबसे अधिक गर्मी पड़ने की मान्यता है। भारतीय लोक परंपरा में नौतपा की तीव्र गर्मी को अच्छे मानसून और बेहतर कृषि उत्पादन का संकेत माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इस अवधि में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध पर अधिक सीधी पड़ने के कारण तापमान और लू अपने चरम पर पहुंच जाते हैं। डा सुमन शर्मा ने रोहिणी नौतपा और बढ़ते तापमान का प्रभाव आलेख में जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों, वनों की कटाई और शहरीकरण को बढ़ती गर्मी के प्रमुख कारण बताया है। साथ ही हीटवेव से बचाव, पर्यावरण संरक्षण तथा कार्बन उत्सर्जन कम करने के उपायों पर भी जोर दिया गया है। हालांकि नौतपा कल 2 जून को समाप्त रहा है। नौतपा के विभिन्न वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में डा. शर्मा ने ज्ञानवर्धक जानकारी दी है।
रोहिणी नौतपा और बढ़ते तापमान का प्रभाव
डा. सुमन शर्मा
रोहिणी नौतपा भारतीय पारंपरिक ज्योतिष और लोक मान्यताओं में ग्रीष्म ऋतु के सबसे अधिक गर्म दिनों को कहा जाता है। यह वह समय माना जाता है जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है और लगभग 9 दिनों तक अत्यधिक गर्मी पड़ती है। इसी कारण इसे “नौतपा” कहा जाता है - अर्थात नौ दिनों की तीव्र तपन। सूर्य देव हर साल 25 मई को रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं | इस के साथ ही ज्येष्ठ महीने के सबसे गर्म 9 दिनों, 'नौतपा' की शुरुआत होती है |
भारतीय परंपरा में महत्व एवं लोक मान्यता के अनुसार नौतपा के दौरान अच्छी गर्मी पड़ना मानसून के लिए शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि यदि इन दिनों पर्याप्त गर्मी हो, तो वर्षा अच्छी होती है, किसान इसे खेती और वर्षा चक्र से जोड़कर देखते हैं। यह वैज्ञानिक नियम नहीं है, लेकिन लंबे अनुभवों के मौसम ज्ञान पर आधारित है।
ज्योतिष और लोक-परंपराओं के अनुसार, नौतपा का न तपना भारी नुकसान का संकेत माना जाता है। यदि इन 9 दिनों में गर्मी नहीं पड़ती या बारिश हो जाती है, तो मानसून चक्र प्रभावित होता है, कीट-पतंगों की संख्या बढ़ जाती है और फसलों को भारी नुकसान होने की आशंका रहती है | इन नौ दिनों में यदि बारिश हो जाय, तो कहते हे नौतपा गल गया |
नौतपा में धरती पर तेज गर्मी अपने चरम पर होती है। आमतौर पर यह अवधि मई के अंत से जून की शुरुआत तक (25 मई से 2 जून ) मानी जाती है। इस दौरान तापमान तेजी से बढ़ता है, लू चलती है और दिन बेहद तपने वाले होते हैं | नौतपा के दौरान सूर्य रोहिणी नक्षत्र में स्थित होता है। सूर्य का उत्तरी गोलार्ध की ओर अधिक झुकाव होता है | इस अवधि में सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं, भूमि अत्यधिक गर्म हो जाती है, लू चलती है, तापमान वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुँच सकता है | इस समय पृथ्वी अपनी धुरी पर ऐसे झुकी होती है कि सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध (विशेष रूप से भारत जैसे देशों में) पर बिल्कुल सीधी और लंबवत पड़ती हैं, जिससे इन 9 दिनों में पृथ्वी पर गर्मी अपने चरम पर होती है | वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस अवधि (मई के अंत से जून की शुरुआत) के दौरान सूर्य पृथ्वी के सबसे करीब या भूमध्य रेखा के सबसे करीब होता है | पृथ्वी का अपनी कक्षा में लगभग (23.5^) झुकाव होने के कारण, सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध में बहुत कम दूरी तय करके सीधे सतह पर पहुंचती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी और सूर्य की स्थिति, वायुमंडलीय परिस्थितियों तथा गर्म हवाओं के कारण यह समय अत्यधिक गर्म होता है।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के बढ़ते तापमान पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसका प्रभाव मौसम के स्वरूप, वर्षा चक्र, समुद्र स्तर तथा प्राकृतिक संतुलन पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
भीषण गर्मी और हीटवेव की बढ़ती घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन तथा शहरों में बढ़ता "अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव" प्रमुख कारण हैं। जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग और वनों की कटाई के कारण कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) तथा मीथेन (CH₄) जैसी ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में लगातार बढ़ रही हैं। ये गैसें पृथ्वी से उत्सर्जित ऊष्मा को अंतरिक्ष में जाने से रोकती हैं, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है।
अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव
शहरों में कंक्रीट की इमारतें, डामर (कोलतार) की सड़कें और बहुमंजिला भवन दिनभर सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित करते हैं तथा रात में धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इसके कारण शहरी क्षेत्रों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक बना रहता है। इसके अतिरिक्त, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से छाया और प्राकृतिक वाष्पीकरण की प्रक्रिया कम हो जाती है। इससे वातावरण में नमी घटती है और तापमान बढ़ता है। मार्च, अप्रैल और मई में धूल भरी आंधियां तथा हल्की वर्षा तापमान को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन इनकी कमी और वायुमंडल में उच्च दाब वाले क्षेत्रों के निर्माण से गर्म हवाएं नीचे की ओर धकेली जाती हैं, जिससे लू की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रशांत महासागर के जल तापमान में वृद्धि भी वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करती है। इससे भारत सहित कई क्षेत्रों में हवाओं के पैटर्न और मानसून व्यवस्था में बदलाव आता है, जो गर्मी के प्रभाव को और बढ़ा सकता है।
ग्रीनहाउस गैसें और उनका प्रभाव
पृथ्वी के वायुमंडल में कुछ गैसें ऐसी होती हैं जो सूर्य से प्राप्त ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को जीवन के अनुकूल तापमान प्रदान करती हैं। इन्हें ग्रीनहाउस गैसें कहा जाता है। प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), जलवाष्प तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) शामिल हैं। इन गैसों की सामान्य मात्रा पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन जब इनकी मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है, तब अधिक ऊष्मा वायुमंडल में फंस जाती है और पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है।
तापमान वृद्धि के प्रमुख कारण
1. जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग
औद्योगिक क्रांति के बाद से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाने लगा। इनके दहन से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। वाहन, ताप विद्युत संयंत्र, उद्योग, एयर कंडीशनर और विभिन्न मशीनें इसके प्रमुख स्रोत हैं।
2. वनों की कटाई
पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं। जब बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई होती है, तो CO₂ का अवशोषण कम हो जाता है और वायुमंडल में कार्बन की मात्रा बढ़ने लगती है। इससे तापमान वृद्धि की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
3. औद्योगीकरण और प्रदूषण
कारखानों से निकलने वाला धुआं, रसायन और विभिन्न गैसें वायुमंडल को प्रदूषित करती हैं। थर्मल पावर प्लांट, सीमेंट, स्टील और रासायनिक उद्योग बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों तथा सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन करते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करते हैं।
4. वाहनों की बढ़ती संख्या
डीजल और पेट्रोल से चलने वाले वाहन कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें छोड़ते हैं। महानगरों में बढ़ता तापमान और वायु प्रदूषण इसी का परिणाम है।
5. मीथेन गैस का बढ़ता स्तर
मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैस मानी जाती है। इसकी बढ़ती मात्रा वैश्विक तापमान वृद्धि को और तेज कर रही है।
6. ओजोन परत में क्षति
ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसी गैसों के कारण ओजोन परत कमजोर होती है, जिससे ताप संतुलन प्रभावित होता है और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ता है।
7. समुद्र और हिमखंडों पर प्रभाव
बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ घट रही है और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। बर्फ के पिघलने से पृथ्वी की परावर्तन क्षमता (Albedo) कम हो जाती है, जिसके कारण अधिक ऊष्मा अवशोषित होती है और तापमान वृद्धि का चक्र और तेज हो जाता है।
8. जनसंख्या वृद्धि और ऊर्जा की बढ़ती मांग
जनसंख्या वृद्धि के साथ ऊर्जा की खपत, परिवहन, औद्योगिक गतिविधियां और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ता है। इससे कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि होती है और जलवायु परिवर्तन की समस्या और गंभीर बनती है।
समाधान एवं रोकथाम
जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए विश्व के अनेक देश सामूहिक स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर भी प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं। अधिक से अधिक वृक्षारोपण कर हरित क्षेत्र बढ़ाना, ऊर्जा की बचत करना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाना, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना तथा सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण उपाय हैं। इसके अलावा जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली अपनाकर भी बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सरकारों, उद्योगों और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयास ही पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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