व्यंग्य

खाना और नीयत

  • अरुण कुमार जैन 

भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञ हर मामले में पैसा खाने और पैसा खाने के रास्ते बनाने में माहिर रहे हैं और खूब भ्रष्टाचार को करना, करने देना और उसे प्रोत्साहित करते हुए प्रश्रय देने के काम को अंजाम देने के लिए मशहूर रही है। उसने इसे शिष्टाचार बना डाला है। जो शासन और प्रशासन यह नहीं करे, वह शासन और प्रशासन ही क्या। सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से ऐसा सिस्टम सियासत की शास्त्रीय परिभाषा से मेल नहीं खाता, फिर उसे असामाजिक सिस्टम मान लिया जाता है। तब ये है कि ऐसे असामाजिक सिस्टम को चलाने वाले भी असामाजिक तत्व ही कहे जाएंगे।

अभी केंद्रीय नेतृत्व कुछ ऐसा ही बेहूदा-सा है—न खाएंगे, न खाने देंगे, भला यह क्या बात हुई। आपके पेट भरे हों न हों, आपने सदाचार का ताबीज पहन रखा हो, आप बाल-बच्चेदार हों न हों, परिवार की जरूरत आपको पता नहीं है, इसका मतलब यह नहीं कि आप दूसरों की जरूरत का ख्याल नहीं रखें। सामाजिक रूप में भी जब आप बड़े आदमी हैं, तो आपका रसूख जरूरी है। बिना रसूख के, बिना लवाजमे के आप बड़े ओहदे वाले कैसे मान लिए जाएं? आखिर आम और खास में कोई फर्क तो होना चाहिए। माना, खास के सिर में दो सींग नहीं उग आते। मगर मारने और खाने को वह बैल की तरह ही भड़कता है। इस भड़कने में ही तो रसूखी का बीज छुपा होता है। आपका अंदाज, पहनावा, शौक, मौज सब शाही नहीं हुए, दिखावे की फिजूलखर्ची नहीं की, तब आप बड़े आदमी बन ही नहीं सकते। इधर आपने अपना लवाजमा भी छोटा कर दिया, यह क्या बात हुई? इतना बड़ा देश और उसके प्रधान दस-पांच गाड़ियों का काफिला लेकर नहीं चले तो फिर क्या? हमारे राज्यों के प्रधान कैसे रसूखी दिखाएंगे? हर किसी का कद इतना बड़ा नहीं होता, तब ये बनाया जाता है और बनाने के लिए सारे खट कर्म करने पड़ते हैं। सादगी का नारा लिए गांधीजी लंगोट लगाए विश्व भर में घूमते रहे, पर क्या उनकी पार्टी और उसके नुमाइंदे उनकी बात पर चले, क्या? नहीं ना, क्योंकि उन्हें सत्ता का रुतबा भी दिखाना था। वे सामाजिक बने रहना चाहते थे, समाज के व्यवहार को वे भली-भांति समझते थे। इतने बरसों में उनके राज में देश ने बहुत तरक्की की, साल-दर-साल। बड़े से बड़े घोटाले करना उनके खून में रच-पच गया था। आखिर बड़े होने के लिए बड़ी दावत देना भी जरूरी है, जिसमें बड़ा खाना ही नहीं होता, दुनिया भर की महंगी शराब और महंगा कबाब न हो, तो शबाब का मजा कहां से आएगा।

इधर ब्रिक्स का सम्मेलन दिल्ली में विगत दिनों आयोजित कर डाला। कूटनीति की सफलता हो गई, भारतीय जनता और सरकार की मेहमाननवाजी और पलक-पांवड़े बिछाने की विश्व भर में भूरी-भूरी प्रशंसा हो गई। मगर सब कुछ अच्छा होकर भी कुछ अच्छा नहीं हुआ। विपक्ष ने कनखजूरिए की तरह कान में घुसकर फूंक मार दी। खाने में खाने डालकर मैदान को शतरंज बना डाला। तकलीफ यह हो गई कि खाना खाने वाले बिना डकार मारे चल दिए। डकार ले लेते, तो जैसे देश को आराम मिल जाता, महंगाई से राहत मिल जाती। मगर यह हुआ नहीं। कोई चूक कहीं नहीं हुई, चर्चाओं में उठे मुद्दों पर कोई रार नहीं ठनी, कोई तना-तनी नहीं हुई। सब कुछ सौहार्दपूर्ण रहा। बर्तन आपस में टकराए नहीं, आवाज बाहर आई नहीं, तो फिर खाना कैसे पचे। इसी बात का अजीर्ण हो गया।

विपक्षियों ने इसी खाने को निशाना बना लिया। बात यह हो गई कि हम भारतीय पद्धति से शाकाहारी भोजन अपने मेहमानों को खिला दिए और सबने उसे चुपचाप बड़े चाव से खाया। जब उन्हें तकलीफ नहीं हुई, तब इन्हें तकलीफ हो गई। "दूसरे की कमीज हमसे ज्यादा सफेद कैसे" हो सकती है? यह कहावत आपने सुनी होगी। यह जलन का एक पैमाना है। विपक्ष का डर यह है कि अब सरकारी डिनर में क्या दाल-चपाती ही खाएंगे, मुर्ग-मुसल्लम का क्या होगा, चिकन बिरयानी के दिन भी लद जाएंगे। मुफ्तिया खाने का मजा किरकिरा हो जाएगा। इफ्तार पार्टियां वैसे ही गायब हो गई हैं।

पैसा खाने के घोटालों के समाचार केवल नई सड़कों और महामार्ग के धंसने तक ही सीमित रह गए हैं। बड़े कामों में बड़े घोटालों के मामले खुल ही नहीं रहे हैं। नेता-मंत्री फंस नहीं रहे हैं। आखिर जेन-जी भी कब तक चलाएंगे, काकरोच पर ज्यादा ध्यान देना बंद हो गया है। अब नया शगूफा कुछ तो हो, तब इस पीड़ा का कीड़ा ही जगजाहिर कर दो। आखिर शाही खाना शाकाहारी ही क्यों हुआ। इतिहास उठाकर देख लो, राजा, राणा, छत्रपति, नवाब, सम्राट, अंग्रेज—सबकी दावतें देख लो। शाकाहारी दावतें, दावतें नहीं होतीं। देश के बेहतरीन बावर्चियों की रोजी-रोटी का सवाल है। इसकी आड़ में अपने खुद के खाने और अपनी ही नीयत का बवाल है।

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श्री अरूण कुमार जैन भारतीय राजस्व सेवा के सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त हैं। वर्तमान में इंदौर में निवास, समसामयिक विषयों के साथ व्यंग्य, कविताएं भी लिखते हैं।  श्री जैन की अनेक  पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी  हैं। संपर्क 9826011099….. E mail arungelada@gmail.com