उन्यासी हार गया, ‘सेवन्टी नाइन’ जीत गया !
उन्यासी हार गया, ‘सेवन्टी नाइन’ जीत गया !
हिंदी दिवस पर विशेष………….
एक लड़का दुकान पर सामान खरीदने गया। दुकानदार ने सामान का हिसाब लगाते हुए कहा—“उन्यासी रुपये दे दो।” लड़के ने दुकानदार से कहा—“अंग्रेजी में बताओ।” दुकानदार ने कहा—“उन्यासी को अंग्रेजी में सेवन्टी नाइन कहते हैं।”
पहली नजर में यह प्रसंग हंसी पैदा कर सकता है। लेकिन थोड़ा रुककर सोचिए। यह हंसी का नहीं, चिंता का विषय है। हिंदी भाषी क्षेत्र में पैदा हुआ, हिंदी बोलने वाले परिवार और समाज में पला-बढ़ा बच्चा यदि अपनी ही भाषा में 79 को ‘उन्यासी’ नहीं कह पाता, लेकिन ‘सेवन्टी नाइन’ तुरंत समझ जाता है, तो समस्या उस बच्चे की नहीं, उस व्यवस्था की है जिसने उसे अपनी भाषा में सहज होने का अवसर ही नहीं दिया। यह केवल एक संख्या के भूल जाने की घटना नहीं है। यह हमारी शिक्षा और सामाजिक सोच का आईना है।
सवाल भाषा के छूटने का
यह स्पष्ट होना चाहिए कि अंग्रेजी सीखना बुरी बात नहीं है। आज के वैश्विक संसार में अंग्रेजी का ज्ञान उपयोगी है और अनेक क्षेत्रों में आवश्यक भी। बच्चे जितनी भाषाएं सीखें, उतना अच्छा। समस्या अंग्रेजी सीखने में नहीं, बल्कि अपनी भाषा को पीछे धकेलकर अंग्रेजी को श्रेष्ठ और मातृभाषा को कमतर मानने की मानसिकता में है।
जब बच्चा ‘वन, टू, थ्री, फोर’ बोलता है तो घर में खुशी होती है। ‘सेवन्टी नाइन’ बोलता है तो माता-पिता गर्व करते हैं। लेकिन वही बच्चा ‘उन्यासी’ नहीं बोल पाता तो शायद ही कोई चिंतित होता है। किसी बच्चे को अंग्रेजी कविता याद हो तो उसकी प्रशंसा होती है, लेकिन उसे कबीर का दोहा, रहीम का पद, लोकगीत या अपनी भाषा की कहावतें याद हों तो हम उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते। यहीं से भाषा का क्षरण शुरू होता है। भाषा पहले शब्दों से निकलती है, फिर वाक्यों से और अंततः जीवन से।
हम बच्चों भाषा का दर्जा सिखा रहे हैं
बच्चा जन्म के साथ किसी भाषा को श्रेष्ठ या निम्न नहीं मानता। वह तो वही भाषा सीखता है जो घर में सुनता है। उसे यह नहीं मालूम कि अंग्रेजी प्रतिष्ठित है और हिंदी सामान्य। यह भेद समाज उसके मन में पैदा करता है।
जब माता-पिता बच्चे से कहते हैं—“हिंदी मत बोलो, अंग्रेजी में बोलो।”
जब विद्यालय में अंग्रेजी बोलने वाले बच्चे को अधिक आधुनिक समझा जाता है।
जब हिंदी माध्यम के विद्यार्थी को अपने ही शहर में कमतर महसूस कराया जाता है।
जब नौकरी और सफलता की चर्चा होते ही भाषा की योग्यता का अर्थ केवल अंग्रेजी से जोड़ दिया जाता है।
तब बच्चे के मन में धीरे-धीरे यह धारणा बनती है कि अपनी भाषा केवल घर और सामान्य बातचीत के लिए है, जबकि सफलता की भाषा अंग्रेजी है। इस मानसिकता का परिणाम वही है—‘उन्यासी’ पीछे छूट जाता है और ‘सेवन्टी नाइन’ आगे निकल जाता है।
शिक्षा व्यवस्था से सबसे बड़ा सवाल
हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को कितनी भाषाएं सिखाती है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह बच्चे को अपनी मातृभाषा में कितना सक्षम बनाती है।
क्या हमारी कक्षाओं में बच्चे केवल पाठ याद कर रहे हैं या भाषा को जी भी रहे हैं?
क्या उन्हें अपनी भाषा के पर्यायवाची शब्द पता हैं?
क्या वे मुहावरों का अर्थ जानते हैं?
क्या वे अपने क्षेत्र की लोकभाषा और बोलियों से परिचित हैं?
क्या वे बिना अंग्रेजी मिलाए सहज हिंदी में अपनी बात कह सकते हैं?
क्या उन्हें अपनी भाषा में गणना, समय, दिशा, रिश्तों और प्रकृति से जुड़े पारंपरिक शब्द मालूम हैं?
यदि इन सवालों के जवाब लगातार ‘नहीं’ की ओर जा रहे हैं तो हमें यह मानना होगा कि संकट केवल भाषा का नहीं, शिक्षा की दिशा का भी है।
बच्चे को दुनिया से जोड़ना जरूरी है, लेकिन उसकी जड़ों से काटकर नहीं।
मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं
मातृभाषा वह भाषा है जिसमें बच्चा पहली बार मां को पुकारता है। जिसमें वह डरने पर रोता है, खुश होने पर हंसता है और अपने मन की पहली बात कहता है। मातृभाषा में केवल शब्द नहीं होते, उसमें अनुभवों की पूरी दुनिया होती है। ‘दादी’, ‘नानी’, ‘आंगन’, ‘चूल्हा’, ‘बरामदा’, ‘पगडंडी’, ‘सावन’, ‘कुआं’, ‘मेड़’, ‘चौपाल’, ‘मेला’, ‘झूला’ जैसे शब्द केवल वस्तुओं या स्थानों के नाम नहीं हैं। इनके पीछे जीवन, स्मृति और संस्कृति की पूरी कहानी है। इसीलिए जब कोई पीढ़ी अपनी भाषा के शब्द भूलती है तो वह केवल शब्द नहीं भूलती। वह धीरे-धीरे उन शब्दों से जुड़े अनुभवों से भी दूर होने लगती है। भाषा के साथ स्मृतियां चलती हैं और स्मृतियों के साथ संस्कृति।
लोकभाषाओं का संकट और भी गहरा
हिंदी के भीतर ही अनेक बोलियां और लोकभाषाएं हैं—मालवी, निमाड़ी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली और ऐसी अनगिनत बोलियां हैं, जिन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य को समृद्ध बनाया है। आज इन लोकभाषाओं के सामने भी चुनौती है। शहरों में बच्चों को अपनी क्षेत्रीय बोली बोलने से रोका जाता है। कई माता-पिता मानते हैं कि बच्चा बोली बोलेगा तो उसकी ‘अच्छी भाषा’ खराब हो जाएगी। परिणाम यह कि बच्चा न अपनी बोली ठीक से सीख पाता है, न शुद्ध हिंदी में पूरी तरह सहज हो पाता है और अंग्रेजी शब्दों का सहारा अलग लेने लगता है।
हमारी ताकत हमेशा से बहुभाषिकता रही है। भारत में एक व्यक्ति घर में एक भाषा, बाजार में दूसरी, पड़ोस में तीसरी और कामकाज में चौथी भाषा का इस्तेमाल कर सकता है। हमें इस विविधता को कमजोरी नहीं, ताकत मानना होगा।
जिम्मेदारी हमारी
डिजिटल दुनिया ने भाषा के स्वरूप को तेजी से बदला है। संदेश छोटे हुए हैं, शब्द संक्षिप्त हुए हैं और बातचीत में अंग्रेजी के शब्दों की संख्या बढ़ी है। यह बदलाव पूरी तरह रोका नहीं जा सकता और शायद रोका जाना भी नहीं चाहिए। लेकिन तकनीक को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। यदि घर में माता-पिता बच्चों से लगातार अंग्रेजी में बात करेंगे, दादा-दादी की कहानियों के लिए समय नहीं होगा, पुस्तकें पढ़ने की आदत नहीं होगी और विद्यालय में भाषा केवल परीक्षा का विषय रह जाएगी ।
भाषा को बचाने का पहला विद्यालय घर
आज प्रायः सभी अभिभावक बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं चाहे वह अमीर हो या मजदूर । इसमें कोई गलत बात नहीं। अच्छी शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है। लेकिन अंग्रेजी माध्यम का अर्थ अंग्रेजी मानसिकता होना नहीं है। बच्चे को अंग्रेजी विद्यालय में पढ़ाइए, लेकिन घर में उससे अपनी भाषा में बात कीजिए। उसे हिंदी की अच्छी किताबें दीजिए। दादा-दादी की कहानियां सुनने दीजिए। कहावतों और मुहावरों का अर्थ समझाइए। उसे अपनी गिनती सिखाइए। उसे बाजार में दुकानदार से हिंदी में हिसाब करने दीजिए। उसे यह अहसास कराइए कि अपनी भाषा बोलना पिछड़ेपन की निशानी नहीं, अपनी पहचान है और इस पर गर्व करना चाहिए ।
भाषा का भविष्य
हम हर वर्ष हिंदी दिवस मनाते हैं। हिंदी के संरक्षण की बातें होती हैं। गोष्ठियां होती हैं, भाषण होते हैं, पुरस्कार दिए जाते हैं। लेकिन भाषा का वास्तविक भविष्य इन आयोजनों से तय नहीं होगा। भाषा तब बचेगी जब बच्चा घर में उसे बोलेगा। जब शिक्षक उसे सम्मान के साथ पढ़ाएगा। जब माता-पिता उसे महत्व देंगे। जब समाज अपनी भाषा बोलने में शर्म नहीं, गर्व महसूस करेगा। जब नौकरी और सफलता की दुनिया में भारतीय भाषाओं को भी अवसर मिलेंगे। जब किताबें, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन और आधुनिक ज्ञान अपनी भाषाओं में उपलब्ध होगा। भाषा को संग्रहालय में रखकर नहीं बचाया जा सकता। उसे जीवन में उतारना होगा।
अंग्रेजी जानना उपलब्धि है लेकिन………………
हमें अपने बच्चों से यह नहीं कहना चाहिए कि अंग्रेजी मत सीखो। हमें कहना चाहिए—अंग्रेजी सीखो, लेकिन हिंदी मत भूलो। हिंदी सीखो, लेकिन अपनी मातृभाषा और बोली को भी सम्मान दो। दुनिया की भाषाएं सीखो, लेकिन अपने घर की भाषा को पराया मत बनाओ। क्योंकि जिस दिन बच्चा अपनी मां से भी अपनी भाषा में बात करने में असहज होने लगेगा, उस दिन संकट केवल भाषा का नहीं रहेगा। वह अपने परिवार, रिश्तेदार, समाज और संस्कृति से भी दूर होने लगेगा।
आज एक बच्चा ‘उन्यासी’ को ‘सेवन्टी नाइन’ के रूप में पहचानता है। कल संभव है वह अपनी दादी की कही किसी कहावत का अर्थ न समझे। परसों उसे अपने गांव के किसी लोकगीत का एक शब्द भी अपरिचित लगे। और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब वह अपनी ही सांस्कृतिक स्मृतियों को अनुवाद के सहारे समझने लगे। क्या हम ऐसी पीढ़ी चाहते हैं जो दुनिया की कई भाषाएं जानती हो, लेकिन अपनी जड़ों की भाषा में अपने ही अतीत को पढ़ने में असमर्थ हो?
यह सवाल उस लड़के से ज्यादा हमसे है…………
दुकानदार ने केवल 79 रुपये मांगे थे। लड़के ने अंग्रेजी में उसका अर्थ पूछा। लेकिन उस छोटे-से संवाद ने हमें बता दिया कि मामला 79 रुपये का नहीं है। मामला उस कीमत का है जो हम अपनी भाषा को भूलकर चुका रहे हैं।
‘उन्यासी’ को बचाना किसी एक संख्या को बचाना नहीं है। यह उस भाषा, उस संस्कृति और उस आत्मीयता को बचाना है जिसमें हमारी पीढ़ियां पली-बढ़ी हैं। और यदि आज हमने इस पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाली पीढ़ियां शायद ‘सेवन्टी नाइन’ तो बोल लेंगी, लेकिन यह पूछेंगी—‘उन्यासी’ आखिर होता क्या है?
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