सन 1947 में, सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों का दौरा किया और मंदिर के पुनर्निर्माण का अपना दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उनका दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित था कि सोमनाथ का पुनरुद्धार भारत के सांस्कृतिक विश्वास को बहाल करने के लिए अनिवार्य है। यह पुनर्निर्माण जन-भागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प के साथ शुरू किया गया था। कैलाश महामेरु प्रसाद स्थापत्य शैली में निर्मित वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा 11 मई, 1951 को की गई थी। यह समारोह केवल एक मंदिर के पुनः खुलने का प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत के सभ्यतागत आत्म-सम्मान की पुष्टि थी।

 

 

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व

गहन आस्था, विश्वास और सभ्यतागत गौरव के एक हजार वर्ष

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।

उज्जयिन्यां महाकालम्ॐकारममलेश्वरम्

     द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम के इस आरंभिक श्लोक में गुजरात के सोमनाथ को बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पर रखा गया है जिससे भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में उसके महत्व का पता चलता है। यह उस सभ्यतागत विश्वास को प्रतिबिंबित करता है कि सोमनाथ भारत के आध्यात्मिक भूगोल का आधार है। गुजरात में वेरावल के निकट प्रभास पाटन में स्थित, सोमनाथ केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक जीवंत प्रतीक है।

    सदियों तक, सोमनाथ करोड़ों लोगों की श्रद्धा और उपासना का केंद्र रहा है। इसे बार-बार उन आक्रमणकारियों द्वारा निशाना बनाया गया जिनका उद्देश्य भक्ति नहीं, बल्कि विनाश था। इसके बावजूद, सोमनाथ की कथा सनातन धर्म को मानने वाले करोड़ों लोगों के अटूट साहस, विश्वास और संकल्प से जानी जाती है।

जीवटता की एक हजार वर्ष

    सोमनाथ की ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा में अत्यंत गहरी हैं। प्रभास तीर्थ, जहाँ सोमनाथ स्थित है, भगवान शिव की चंद्रदेव द्वारा की गई आराधना से जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार, चंद्रदेव ने यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी और उन्हें उनके श्राप से मुक्ति मिली थी, जो इस स्थान को अपार आध्यात्मिक महत्व प्रदान करता है।

    सदियों  से, सोमनाथ मंदिर निर्माण के कई चरणों का साक्षी रहा, जिनमें से प्रत्येक उस समय की भक्ति, कलात्मकता और संसाधनों को दर्शाता है। प्राचीन वृत्तांत विभिन्न सामग्रियों का उपयोग करके बनाए गए क्रमिक मंदिरों का वर्णन करते हैं, जो नवीनीकरण और निरंतरता का प्रतीक हैं। सोमनाथ के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा चरण ग्यारहवीं शताब्दी में शुरू हुआ।

जनवरी 1026 में, सोमनाथ को आक्रमणकारियों द्वारा अपने पहले अभिलिखित हमले का सामना करना पड़ा। इसने एक लंबी अवधि की शुरुआत की, जिसके दौरान सदियों तक मंदिर को बार-बार नष्ट किया गया और फिर से बनाया गया। इसके बावजूद, सोमनाथ लोगों की सामूहिक चेतना से कभी ओझल नहीं हुआ। मंदिर के विनाश और पुनरुद्धार का यह चक्र विश्व इतिहास में अद्वितीय है। यह दर्शाता है कि सोमनाथ कभी भी केवल पत्थर की एक संरचना मात्र नहीं था, बल्कि आस्था, पहचान और सभ्यतागत गौरव का एक जीवंत प्रतीक था।

  सन 1947 में, सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों का दौरा किया और मंदिर के पुनर्निर्माण का अपना दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उनका दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित था कि सोमनाथ का पुनरुद्धार भारत के सांस्कृतिक विश्वास को बहाल करने के लिए अनिवार्य है। यह पुनर्निर्माण जन-भागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प के साथ शुरू किया गया था। कैलाश महामेरु प्रसाद स्थापत्य शैली में निर्मित वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा 11 मई, 1951 को की गई थी। यह समारोह केवल एक मंदिर के पुनः खुलने का प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत के सभ्यतागत आत्म-सम्मान की पुष्टि थी।

    वर्ष 2026 में, राष्ट्र 1951 के उस ऐतिहासिक समारोह के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है, जो न केवल सोमनाथ मंदिर के पुन: खुलने का प्रतीक था, बल्कि भारत के सभ्यतागत स्वाभिमान की पुनर्स्थापना भी था। साढ़े सात दशक बाद, सोमनाथ आज एक नए कायाकल्प के साथ खड़ा है, जो उस सामूहिक राष्ट्रीय संकल्प की चिरस्थायी शक्ति को प्रतिबिंबित करता है।

सोमनाथ मंदिर : भव्यता, आस्था और जीवंत विरासत

       सोमनाथ को भगवान शिव के 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम के रूप में पूजा जाता है। वर्तमान मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप शामिल हैं, जो अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़े हैं। मंदिर के शिखर की ऊँचाई 150 फीट है, जिसके शीर्ष पर 10 टन भारी कलश स्थापित है। 27 फीट ऊँचा ध्वजदंड मंदिर की आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है। पूरा परिसर 1,666 स्वर्ण-मंडित कलशों और 14,200 ध्वजाओं से सुसज्जित है, जो पीढ़ियों की भक्ति और उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रतीक हैं।

     सोमनाथ निरंतर जीवंत उपासना का केंद्र बना हुआ है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हमेशा से अधिक रही है। यह संख्या एक वर्ष में 92 से 97 लाख भक्तों के बीच रहती है (2020 में लगभग 98 लाख तीर्थयात्रियों ने मंदिर के दर्शन किए)। बिल्व पूजा जैसे अनुष्ठानों में 13.77 लाख से अधिक भक्त हिस्सा लेते हैं, जबकि 2025 में महाशिवरात्रि  के अवसर पर 3.56 लाख श्रद्धालु आये थे। भक्तों को सोमनाथ के इतिहास से जोड़ने में सांस्कृतिक पहलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2003 में शुरू किया गया प्रकाश एवं ध्वनि शो (लाइट एंड साउंड शो) को  2017 में कथा वृतांत और 3 डी लेज़र तकनीक के साथ आधुनिक बनाया गया, पिछले तीन वर्षों में इस शो में 10 लाख से अधिक दर्शक देख चुके हैं। 'वंदे सोमनाथ कला महोत्सव' जैसे कार्यक्रमों ने लगभग 1,500 वर्ष पुरानी नृत्य परंपराओं को पुनर्जीवित किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के प्रमुख  के रूप में भी कार्यरत हैं, उनके नेतृत्व में सोमनाथ पुनरुद्धार के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। शासकीय सुधारों, बुनियादी ढांचे के उन्नयन और विरासत संरक्षण के प्रयासों ने एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में मंदिर की भूमिका को और सुदृढ़ किया है।

सोमनाथ मंदिर में महिला सशक्तिकरण

    सन 2018 में "स्वच्छ आदर्श स्थल" घोषित होने के बाद, सोमनाथ ने संवहनीयता के क्षेत्र में कई नवीन प्रथाओं को अपनाया है। मंदिर में चढ़ने वाले फूलों को वर्मीकम्पोस्ट में बदला जा रहा है, जिससे परिसर के 1,700 बिल्व वृक्षों को पोषण मिलता है। 'मिशन लाइफ' के अंतर्गत, प्लास्टिक कचरे को सड़क बनाने के ब्लॉक में परिवर्तित किया जा रहा है, जिससे हर महीने लगभग 4,700 ब्लॉक्स तैयार होते हैं। इसके अतिरिक्त, वर्षा जल संचयन से प्रति माह लगभग 30 लाख लीटर गंदे जल का प्रशोधन किया जाता है।

      करीब 72,000 वर्ग फुट में फैला 7,200 पेड़ों का एक मियावाकी वन प्रतिवर्ष लगभग 93,000 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है। इसके अतिरिक्त, अभिषेक जल को शुद्ध करके 'सोमगंगाजल' के रूप में बोतलबंद किया जाता है, जिससे दिसंबर 2024 तक 1.13 लाख से अधिक परिवार लाभान्वित हो चुके हैं।

       सोमनाथ महिला सशक्तिकरण के एक सशक्त केंद्र के रूप में भी उभरा है। सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के 906 कर्मचारियों में से 262 महिलाएँ हैं। विशेष रूप से, बिल्व वन का प्रबंधन पूरी तरह से महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, 65 महिलाएँ प्रसाद वितरण के कार्य में और 30 महिलाएँ मंदिर की भोजन सेवाओं में जुटी हुई हैं। कुल मिलाकर, 363 महिलाओं को यहाँ प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त हुआ है, जो सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष लगभग 9 करोड़ रुपये की आय अर्जित करती हैं। यह उनके आर्थिक स्वावलंबन और गरिमापूर्ण जीवन को दर्शाता है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व

      सोमनाथ स्वाभिमान पर्व  से 11 जनवरी 2026 तक एक राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। यह जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले अभिलिखित आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में स्मरणोत्सव के रूप में आयोजित किया गया है। इस आयोजन की परिकल्पना विनाश के स्मरण के रूप में नहीं, बल्कि सहनशीलता, विश्वास और सभ्यतागत आत्म-सम्मान को श्रद्धांजलि के रूप में की गई है। सदियों से, सोमनाथ को बार-बार उन आक्रमणकारियों द्वारा निशाना बनाया गया जिनका उद्देश्य भक्ति के बजाय विनाश था। हालाँकि, हर बार देवी अहिल्या बाई होल्कर जैसे भक्तों के सामूहिक संकल्प के माध्यम से मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। पुनरुद्धार के इस अटूट चक्र ने सोमनाथ को भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक शक्तिशाली प्रतीक बना दिया।

    2026 का वर्ष उस समय के भी 75 साल पूरे होने का अवसर है, जब स्वतंत्रता के बाद 11 मई, 1951 को मौजूदा सोमनाथ मंदिर को भक्तों के लिए फिर से खोला गया था। ये दोनों अहम पड़ाव सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आधार बने हैं।

       चार दिवसीय पर्व के दौरान, सोमनाथ आध्यात्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय स्मरण के केंद्र में परिवर्तित हो गया है। इस उत्सव की एक मुख्य विशेषता 72 घंटे का अखंड ओंकार जाप है, जो एकता और सामूहिक विश्वास का प्रतीक है। इसके साथ ही, पूरे मंदिर परिसर और नगर में भक्ति संगीत, आध्यात्मिक विमर्श और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत की सनातन सभ्यता की यात्रा में गौरव, स्मरण और विश्वास की एक सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में खड़ा है।

      सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत के सभ्यतागत आत्मविश्वास की पुष्टि करता है। यह विनाश पर जीवंतता और भय पर अटूट आस्था की विजय का सम्मान है। सौराष्ट्र के तट पर अडिग खड़ा सोमनाथ मंदिर दुनिया भर में भारतीयों को प्रेरित करता है। यह हमें स्मरण कराता है कि जहाँ विनाशकारी शक्तियाँ इतिहास के पन्नों में ओझल हो जाती हैं, वहीँ  सच्चाई,  एकता और आत्म-सम्मान में निहित विश्वास सदैव अक्षुण रहता है।14

आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै।

आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्।

प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥

अर्थात.... सर्वशक्तिमान भगवान शिव ने, अपने आदिनाथ स्वरूप में, समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु अपने शाश्वत सिद्धांत और संकल्प से इस अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र क्षेत्र को प्रकट किया, जिसे प्रभास खंड के नाम से जाना जाता है। दिव्य आभा से आलोकित यह पुण्य भूमि वह स्थान है जहाँ मनुष्यों को आध्यात्मिक पूर्णता, पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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