आपकी बात......... कोई पानी पीने से मरे या डूबने से.. क्या फर्क पड़ता है ? ..................आलेख............ रंजन श्रीवास्तव
आपकी बात.........
कोई पानी पीने से मरे या डूबने से..
क्या फर्क पड़ता है ?
- रंजन श्रीवास्तव
एक-दूसरे से लगभग 800 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर और उत्तर प्रदेश के नोएडा की घटनाओं ने आधुनिक शहरी नियोजन की व्यवस्था पर एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से दिसंबर माह से अब तक 24 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि कुछ लोग अभी भी गंभीर अवस्था में अस्पतालों में भर्ती हैं। वहीं, नोएडा में एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत हो गई कुछ बिल्डरों और अधिकारियों की लापरवाही और रेस्क्यू ऑपरेशन में लगी एजेंसियों की अक्षमता के कारण।
इंदौर और नोएडा दोनों ही जगह ट्रिपल इंजन की सरकार है यानी केंद्र, राज्य और स्थानीय नगर निगम तीनों ही जगह एक पार्टी यानी भाजपा का वर्चस्व है इसलिए शासन, प्रशासन और स्थानीय शहरी निकाय के बीच कोई तालमेल का अभाव हो, यह भी नहीं हो सकता। पर दोनों जगह अब जिम्मेदारी की फुटबॉल एक-दूसरे के पाले में फेंकी जा रही है। निचले स्तर पर कार्रवाई को लेकर दोनों ही प्रदेशों में राज्य शासन ने घटनाओं की जिम्मेदारी लेने से पल्ला झाड़ लिया है।
इंदौर में दो अधिकारियों का निलंबन और एक अधिकारी को सेवा से पदच्युत करने के बाद सरकार अपनी गति से चल रही है जबकि नोएडा के मामले में संबंधित बिल्डरों में से एक बिल्डर की गिरफ्तारी हो चुकी है। शासन ने जिम्मेदारी लेना तो दूर, किसी प्रशासकीय अधिकारी तक को निलंबित नहीं किया है। सत्य यह है कि दोनों ही घटनाएं सिर्फ कुछ अधिकारियों की लापरवाही नहीं बल्कि राज्य-स्तरीय रेगुलेटरी नाकामी का नतीजा हैं।
इन घटनाओं ने यह तो साबित कर ही दिया है कि शासन और प्रशासन के पुराने ढर्रे में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आया है।
राजनेताओं की नजर में बड़ी से बड़ी घटना की भी नैतिक जिम्मेदारी लेना सबसे बड़ा अनैतिक कार्य है। इसलिए किसी घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेना गुज़रे ज़माने की बात हो गई है।
इंदौर में भागीरथपुरा के लोग कई महीनों से दूषित पानी की आपूर्ति के बारे में स्थानीय पार्षद और अधिकारियों से शिकायत कर रहे थे। टूटी-फूटी खराब पाइपलाइन बदलने का टेंडर अगस्त में जारी हो गया था पर फाइलों में तेजी तभी आई जब दूषित पानी पीने से पीड़ित लोगों की मौत होना शुरू हो गई।
शुरुआत में नगर निगम और स्थानीय प्रशासन डिनायल मोड में बना रहा और जागा तब जब बीमार होने वालों और उनके बीच मरने वालों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। पर उसके बाद भी जिम्मेदारी की टोपी एक-दूसरे पर उछाली जाने लगी। मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने एक बैठक में कहा कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बयान में कहा कि उनके ऑफिस ने गंदे पानी की शिकायत को नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को 15 दिन पहले ही भेज दिया था।
अब एक नया मोड़ आ गया है। सोशल मीडिया पर एक आदेश वायरल हो रहा है जिसके आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि आयुक्त नगरीय प्रशासन संकेत भोंडवे ने एक आदेश सितंबर में इंदौर सहित प्रदेश के सभी नगरीय निकायों को भेजा जिसके अनुसार सभी निकायों को टेंडर नए शेड्यूल ऑफ रेट के हिसाब से बुलाने के लिए कहा गया। इसलिए इंदौर नगर निगम में भागीरथपुरा सहित अन्य बहुत से वार्डों में काम रुक गया। आश्चर्य की बात तो यह भी है कि भागीरथपुरा की त्रासदी की जांच के लिए जो समिति बनी है, उसमें आयुक्त नगरीय प्रशासन भोंडवे भी शामिल ।
नोएडा में निर्माणाधीन मॉल, जहां पर बेसमेंट के लिए लगभग 12 फीट गड्ढा खोदा गया था, उसमें पानी भरा हुआ था। पर उसके चारों तरफ ना कोई ढंग की दीवार खड़ी की गई और न ही कोई बैरिकेड या चेतावनी के लिए रिफ्लेक्टर लगाया गया था। स्थानीय निवासी कई बार जिम्मेदार अधिकारियों को शिकायत कर चुके थे कि वहां कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है क्योंकि वहां पहले से ही छोटी-मोटी दुर्घटनाएं हो रही थीं। पर वह प्रशासन ही क्या जो किसी की मौत से पहले चेत जाए?
जब हम अपने-आप को विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बता रहे हैं, ऐसे में इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि देश की राजधानी दिल्ली के नजदीक नोएडा में 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत सिर्फ इसलिए नहीं हुई क्योंकि उनकी कार गहरा घना कोहरा होने तथा वहां किसी दीवार या बैरिकेड न होने से गहरे गड्ढे में चली गई। उनकी मौत का कारण यह भी था कि फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ की टीम दो घंटे तक बाहर खड़े तमाशा देखती रही जबकि युवराज कार से बाहर आ चुके थे और अपने मोबाइल फोन की लाइट दिखा-दिखाकर अपने को बचाने की गुहार लगाते रहे।
पूरे विश्व में हमारे लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा कि रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित कर्मी तमाशबीन बन पानी ठंडा होने तथा निर्माणाधीन मॉल के गड्ढे में सरिया होने की वजह से बाहर ही खड़े रहे। चार घंटे बाद जब एनडीआरएफ की टीम पहुंची तो युवराज को बाहर लाया गया पर यह सिर्फ उनका मृत शरीर थी।
इस तरह की घटनाओं के बाद भी करोड़ों खर्च करके बहुत से सेमिनार और गोष्ठियों में हम देश की युवा शक्ति के बाहर पलायन पर चिंता व्यक्त करते हैं और इस बात पर भी चिंता व्यक्त करते हैं कि लोग देश छोड़कर बाहर बसने क्यों जा रहे हैं ?
एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 से 2024 तक यानी 5 वर्षों में 9 से 10 लाख लोगों ने भारत छोड़ा, लॉन्ग-टर्म सेटलमेंट के तौर पर बाहर रहने के लिए।
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श्री रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स और फ्री प्रेस, भोपाल के साथ अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद इन दिनों भोपाल में निवास और सामयिक मुद्दों व राजनीति पर नियमित स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क.. 94253-51688, ईमेल - ranjansrivastava1@gmail.com
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