आपकी बात ....................थाली महंगी, मंत्रियों के बयान जंतर-मंतर पर कील लगी लाठियों जैसे...................... रंजन श्रीवास्तव
चीनी समेत कई जरूरी खाद्य वस्तुओं के लगातार महंगे होने से आम आदमी की थाली और घरेलू बजट पर बोझ बढ़ रहा है। चीनी की कीमतों में तेज वृद्धि के पीछे एथेनॉल नीति, चीनी उत्पादन का गलत आकलन और चीनी के निर्यात जैसे कारण बताए जा रहे हैं। ऐसे समय में मंत्रियों के गैर-जिम्मेदाराना बयान आम जनता की परेशानी को और बढ़ाते हैं। सरकार के सामने चुनौती केवल कीमतों पर नियंत्रण की नहीं, बल्कि त्योहारों से पहले आम लोगों को उचित कीमत पर जरूरी खाद्य वस्तुएं उपलब्ध कराने की भी है।
आपकी बात
थाली महंगी, मंत्रियों के बयान जंतर-मंतर पर कील लगी लाठियों जैसे
रंजन श्रीवास्तव
देश में चीनी भले ही खुदरा बाजार में 70 रुपये किलो तक पहुंच गई है, लेकिन सरकार के तमाम दावों के बाद भी चीनी के दाम में फिलहाल कोई कमी दिखाई नहीं दे रही है।
आम आदमी की थाली चीनी के साथ-साथ प्याज, आलू और टमाटर जैसी सब्जियों, तेलों तथा दालों की कीमतों के कारण दिन-प्रतिदिन महंगी होती जा रही है।
बिहार के एक मंत्री श्रवण कुमार ने चीनी के दामों में बढ़ोतरी को बेहद बेतुके तरीके से जायज ठहराते हुए और आम आदमी के घाव पर नमक छिड़कते हुए कहा कि वैसे भी आजकल मिठाई खाता कौन है? सभी लोग तो डायबिटीज से पीड़ित हैं।
इसी तरह मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने शक्कर की बढ़ती कीमतों पर मीडिया के सामने बयान दिया कि 90 प्रतिशत लोग मीठा खाना पसंद नहीं करते हैं, मैं भी मीठा नहीं खाता हूँ। यहां तक तो समझ में आता है लेकिन इसके आगे वे कहते हैं कि शक्कार खूब महंगी हो जाए और सिर्फ कंट्रोल पर ही बच्चों के लिए सस्ती शक्कर मिले।
मंत्री महोदय के इस बयान ने देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान की याद दिला दी, जब उन्होंने प्याज के दामों में बढ़ोतरी को लेकर कहा था, "मैं प्याज नहीं खाती।"
आम जनता के लिए स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि आगामी कुछ महीने त्योहारों के हैं। अगर महंगाई रोकने के सरकार के प्रयास सफल नहीं हुए, तो त्योहारों की मिठास कितनी फीकी होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
सरकार का दावा है कि एथेनॉल को पेट्रोल में मिश्रित करने की योजना का कोई असर चीनी के दामों पर नहीं पड़ा है। यानी चीनी के महंगे होने के और भी कारण हैं।
लेकिन जब केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन स्वयं सरकार की आक्रामक ई-20 नीति को लेकर चिंतित हों और यह कहें कि पुरानी गाड़ियों के लिए ई-10 ईंधन नीति को वापस लाया जाए, तो इससे ही स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि लोगों की शिकायतों कि एथेनॉल से उनकी गाड़ियां खराब हो रही हैं और माइलेज कम हो रहा है, को न सिर्फ लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, बल्कि केंद्र सरकार के कुछ मंत्री उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की धमकी भी दे रहे थे, जो एथेनॉल को लेकर अफवाहें फैलाएंगे।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी तो अपनी बात पर अड़े हुए थे कि एथेनॉल से न माइलेज कम होता है और न गाड़ियां खराब होती हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा उनके बेटों के एथेनॉल के कारोबार में होने को लेकर पूछे गए सवाल पर तो उन्होंने मानहानि का केस करने तक की धमकी दे डाली।
हालांकि, गडकरी ने अभी कुछ समय पहले यह स्वीकार किया कि हां, एथेनॉल से गाड़ियों का माइलेज कुछ कम होता है।
जनता की चिंता सिर्फ गाड़ियों का माइलेज कम होने और गाड़ियों के खराब होने को लेकर ही नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि लोगों को पेट्रोल और एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, दोनों का विकल्प देने के बजाय सरकार आक्रामक तरीके से एथेनॉल ब्लेंडिंग का प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने का प्रयास कर रही है।
अगर चीनी का संकट न आया होता, तो एथेनॉल नीति कहां जाकर रुकती, कहना मुश्किल था।
सरकार को क्या फर्क पड़ता है अगर लोगों की गाड़ियां खराब हो रही हैं तो? यह तो सरकार के खजाने के लिए अच्छा ही है। लोगों की गाड़ियां खराब होंगी, तो वे नई गाड़ियां खरीदेंगे और नई गाड़ियों की बिक्री पर सरकार को अच्छा-खासा टैक्स मिलता है।
वैसे, कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार की पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर बेचने की नीति के कारण ही नहीं, बल्कि चीनी के निर्यात के कारण भी चीनी महंगी हुई है।
चीनी के साथ-साथ कई तरह की दालें, तेल, प्याज, आलू, टमाटर और अन्य सब्जियां, गुड़, चाय की पत्ती और नमक भी महंगे हुए हैं। इसलिए आम घरों का बजट अचानक गड़बड़ा गया है। चीनी महंगी होने के पीछे सरकार का चीनी निर्यात करने का फैसला भी एक बड़ा कारण है।
एक अर्थशास्त्री ने दावा किया कि कृषि मंत्रालय ने देश में चीनी उत्पादन का गलत अनुमान लगाया। उत्पादन का गलत आकलन होने से चीनी निर्यात, जो बंद था, उसे खोलने की इजाजत दे दी गई। जबकि चीनी का उत्पादन अनुमान से कम हुआ और देश की जरूरत के हिसाब से चीनी की उपलब्धता कम होने के कारण चीनी बेहिसाब महंगी हो गई।
देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत पिछले महीने 20 तारीख को 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। अर्थात, एक महीने में ही चीनी की कीमत करीब 15.6 प्रतिशत बढ़ गई। और अब तो खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 70 रुपये किलो तक पहुंच गई है।
सरकार ने चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने तथा जमाखोरी को रोकने के लिए स्टॉक सीमा लागू की है तथा 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि विश्व बाजार में निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के दाम मांग और आपूर्ति के हिसाब से घटते-बढ़ते हैं। अतः, देश में चीनी का संकट होने पर जिन देशों से चीनी खरीदी जानी है, वे अब चीनी हमें महंगी बेचेंगे।
और भी कारण होंगे, लेकिन फिलहाल तो त्योहारों से पहले चीनी महंगी होने के पीछे तीन प्रमुख कारण दिखाई दे रहे हैं - एथेनॉल नीति, चीनी उत्पादन का गलत आकलन और चीनी का निर्यात।
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श्री रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स और फ्री प्रेस, भोपाल के साथ अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद इन दिनों भोपाल में निवास और सामयिक मुद्दों व राजनीति पर नियमित स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क.. 94253-51688, ईमेल - ranjansrivastava1@gmail.com

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