आपकी बात..................... छात्र आंदोलन: अब शब्दों के पेलेट गन्स और एके-47........................आलेख ................. रंजन श्रीवास्तव
राजधानी दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा प्रधानमंत्री के विरुद्ध की गई अभद्र टिप्पणियों के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी तीखी एवं अपमानजनक भाषा का प्रयोग बढ़ गया है। लोकतंत्र में न तो गाली और न ही लाठी-गोली असहमति का समाधान हो सकते हैं। कुछ लोगों की गलती के आधार पर पूरे युवा वर्ग को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। सरकार, विपक्ष, छात्र और समाज, सभी को दमन और कटु भाषा के बजाय संवाद, संयम और लोकतांत्रिक मर्यादा का मार्ग अपनाना चाहिए।
आपकी बात
छात्र आंदोलन: अब शब्दों के पेलेट गन्स और एके-47
- रंजन श्रीवास्तव
कहा जाता है कि तीर और तलवार से ज़्यादा गहरा घाव शब्दों का होता है।
दुर्भाग्य से जिन शब्दों का, या सीधे कहें तो गालियों का, सहारा जंतर-मंतर पर सरकार के विरुद्ध एकत्र हुए युवाओं के एक वर्ग ने अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति के लिए लिया, उसका प्रतिकार अब राजनीतिक कार्यकर्ता, नेता तथा समाज का एक वर्ग, जो राजनीति में नहीं है लेकिन सत्ता पक्ष का समर्थक है, उसी भाषा में कर रहा है।
जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जेन जी (Gen Z) के एक वर्ग ने जिन शब्दों का प्रयोग किया, उन्हें लिखा नहीं जा सकता। यदि आक्रोश और विरोध-प्रदर्शन की अभिव्यक्ति का माध्यम हिंसा नहीं हो सकता, तो गाली भी नहीं हो सकती, क्योंकि गाली भी एक प्रकार की हिंसा ही है।
सोशल मीडिया जिस तेज़ी से किसी भी भद्दी या नकारात्मक टिप्पणी को कुछ ही क्षणों में हर हाथ में मौजूद स्मार्टफोन तक पहुँचा देता है, वह पूरे समाज में एक चेन रिएक्शन पैदा करता है। उस विवादित टिप्पणी के पक्ष और विपक्ष में लाखों लोग खड़े हो जाते हैं। उन लाखों लोगों में से अनेक लोग स्वयं भी उस अभियान का हिस्सा बन जाते हैं।
लेकिन यदि प्रतिकार में ऐसे लोग भी गालियाँ देने लगें, जिन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से परिपक्व माना जाता है, तो क्या इसे भी उचित माना जाएगा?
कुछ लोगों द्वारा दी गई गालियों के जवाब में यदि पूरे युवा समुदाय को ही अपमानित किया जाए, तो क्या यह न्यायसंगत होगा?
और यदि जेन जी (Gen Z) के एक वर्ग ने गालियाँ देकर जंतर-मंतर पर भौंडा प्रदर्शन किया, तो किसी पुलिस अधिकारी के आदेश पर प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाकर, इलेक्ट्रिक शॉक देने वाली लाठियों और कील-जड़ी लाठियों से उन्हें लहूलुहान करके क्या पुलिस ने बहुत बड़ी वीरता का परिचय दिया?
बिहार में एके-47 से प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोलियाँ चलाई गईं। क्या इसे उचित ठहराया जा सकता है?
भाजपा इसके लिए विपक्ष को भी दोषी नहीं ठहरा सकती, क्योंकि दिल्ली में कानून-व्यवस्था और पुलिस केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन है, जहाँ भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार है।
बिहार में भी एनडीए की सरकार है और इस बार मुख्यमंत्री भी भाजपा के हैं।
क्या इस प्रकार की हिंसा का प्रदर्शन करके सरकार छात्रों का दमन नहीं करना चाहती? सरकार में इतने अनुभवी और समझदार लोग तो हैं कि वे यह समझ सकें कि दमन से छात्र और अधिक उत्तेजित हो सकते हैं, जिससे स्थिति और भी अप्रिय हो सकती है।
अब वास्तविक पेलेट गन्स और एके-47 की जगह शब्दों के पेलेट गन्स और एके-47 से युवाओं पर हमला किया जा रहा है।
ताज़ा मामला भाजपा सांसद कंगना रनौत के बयान का है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ दी गई गालियों से कंगना आक्रोशित होंगी, लेकिन यह पहली बार नहीं है, जब उनके बयान और टिप्पणियाँ सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही हैं।
कंगना ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अंग्रेज़ी में जो पोस्ट लिखा, उसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार है—
"मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी एक जगह इतनी बदसूरती नहीं देखी। जेन जी के इन प्रदर्शनों की रीलें देखकर उल्टी आने लगती है। जिस तरह वे बोलते हैं और जिस तरह की भाषा इस्तेमाल करते हैं, मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसा नहीं देखा कि हर फ्रेम इतना झकझोरने वाला और इतना भद्दा हो। मैं इन्हें 'जनरेशन गटर' कहती हूँ। ये पढ़ाई में अच्छे नहीं हैं। ये इतने बदसूरत और भ्रष्ट हैं कि अच्छे गृहस्थ भी नहीं बन सकते। आखिर इन्हें जन्म कौन दे रहा है और इनकी परवरिश कौन कर रहा है?"
संघ के विचारक एस. गुरुमूर्ति ने प्रदर्शनकारियों को अपराधी तक कह डाला।
उन्होंने एक टीवी न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में एक प्रश्न के उत्तर में कहा, "क्योंकि उन्होंने 50,000 लोगों को इकट्ठा किया, इसका मतलब यह नहीं है कि वे 'जेन जी', यानी आज की युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि बन गए हैं। वे अपराधी हैं। सरकार के पास जो जानकारी है, और जो मीडिया भी दिखा रहा है, उससे पता चलता है कि उनमें बलात्कारी, हत्यारे और गैंगस्टर शामिल हैं। और यही लोग वहाँ मौजूद हैं। आप उन्हें जेन जी का प्रतिनिधि कहते हैं? यह पूरी तरह गलत है।"
ऐसे और भी बयान हैं, जिन्हें राजनीति या सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने दिया है।
और यह सब तब हो रहा है, जब केंद्र सरकार ने युवाओं की माँग को उचित मानते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा ले लिया है और प्रधानमंत्री स्वयं सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा, “...हमें उन्हें तर्क समझाना होगा। हमें उन्हें बहुत प्यार देना होगा। हमें उनके साथ समय बिताना होगा। हमें उनसे बातचीत करनी होगी। उनके साथ तानाशाही करने के बजाय, हमें संवाद करना चाहिए। हम मनमानी नहीं कर सकते और जबरदस्ती सबके मालिक नहीं बन सकते।”
लोकतंत्र में असहमति का उत्तर गाली नहीं हो सकती और न ही लाठी या गोली। यदि कुछ छात्रों ने मर्यादा तोड़ी, तो उससे पूरे युवा वर्ग को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। और यदि कुछ नेताओं ने भी शब्दों की मर्यादा तोड़ी है, तो वह भी उतना ही अनुचित है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है, दमन नहीं। इसलिए सरकार, विपक्ष, छात्र और समाज सभी को यह तय करना होगा कि आने वाले भारत का निर्माण शब्दों के एके-47 (AK-47) से होगा या संवाद की भाषा से?
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श्री रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स और फ्री प्रेस, भोपाल के साथ अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद इन दिनों भोपाल में निवास और सामयिक मुद्दों व राजनीति पर नियमित स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क.. 94253-51688, ईमेल - ranjansrivastava1@gmail.com
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