जय राजा भोज…….. सरस्वती कंठाभरण के स्मरण का दिन................... विजय मनोहर तिवारी
भोपाल देश का अकेला शहर है, जिसका राजा भोज के समय का डिजाइन आज भी गूगल मैप से देखा जा सकता है। चौक बाजार का केंद्रीय स्थान एक ऐसे ही संस्कृत के ज्ञान केंद्र की भूमि रहा है, जिसे सभामंडल कहा गया। वह भी परमार राजाओं का एक महान निर्माण था। भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध विषयों पर केंद्रित एक विद्यापीठ। ये विद्या केंद्र सदियों तक चले और पीढ़ियों को तैयार किया।
जय राजा भोज……..
सरस्वती कंठाभरण के स्मरण का दिन
- विजय मनोहर तिवारी
बसंत पंचमी का दिन राजा भोज के महान निर्माण कार्यों के स्मरण का पवित्र दिन है। वर्तमान धार जिनकी राजधानी थी। वे परमार वंश के महाप्रतापी सम्राट थे, जिनकी पहले राजधानी उज्जैन थी। राजा भोज ने पहले उज्जैन, फिर धार और मंडपदुर्ग में तीन सरस्वती कंठाभरण बनवाए थे। ये भारतीय ज्ञान परंपरा के महान केंद्र थे। सरस्वती की उपासना के लिए अपनी आराध्य देवी सरस्वती के मंदिर और विद्यालय।

धार में जो भोजशाला आज राख और धुएँ की कहानी बनकर हमारे सामने है, वह उसी सरस्वती कंठाभरण के अवशेषों से बनी है। तीनों सरस्वती कंठाभरण मध्यकाल के विध्वंस की चपेट में आए और यह विनाशलीला पूरे भारत में चली। विदिशा में वर्तमान बीजामंडल के खंडहर भी राजा भोज के वंशज नरवर्मन की महान कृति थी, जिसे इल्तुतमिश ने ढहाया था। उदयपुर का नीलकंठेश्वर मंदिर भाग्य से पूरा बच गया, जो राजा उदयादित्य ने 1080 में बनवाया था।

भोपाल देश का अकेला शहर है, जिसका राजा भोज के समय का डिजाइन आज भी गूगल मैप से देखा जा सकता है। चौक बाजार का केंद्रीय स्थान एक ऐसे ही संस्कृत के ज्ञान केंद्र की भूमि रहा है, जिसे सभामंडल कहा गया। वह भी परमार राजाओं का एक महान निर्माण था। भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध विषयों पर केंद्रित एक विद्यापीठ। ये विद्या केंद्र सदियों तक चले और पीढ़ियों को तैयार किया। कालांतर में इनके अवसान का समय भी आया। एक दिन के बाद रात आती है। भारत में वह संघर्ष की सदियों लंबी रात थी। संस्कृति के कोष पर पलने वाले किसी लिटरेचर फेस्टिवल में इन विषयों पर बात नहीं होती। अज्ञान के अंधेरे अब तक पसरे हुए हैं। लालच और निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं है।

अगर धार में एक स्मारक के लिए अब भी संघर्ष है तो मानिए की स्वाधीनता अपूर्ण है और वह रात अभी छटी नहीं है। कम से कम हर उस स्थान पर उस रात का अंधेरा अभी भी टिका हुआ है, जिसने भारत की पहचान को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया। वे प्रयास भी कभी रुके नहीं है। जहाँ भी ऐसा अंधेरा पसरा हुआ है, वहाँ निशाचर अपने काम में लगे हुए हैं। मध्यप्रदेश में यह दुर्भाग्य है कि शुक्रवार और बसंत पंचमी पर ढाई दशक पुराना वही शोर कायम है। हम उसी चौराहे पर खड़े हैं, जहाँ धार का सरस्वती कंठाभरण सदियों से सिसक रहा है।

जय राजा भोज। जय भारत।
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