सवाल यह है कि आज कितने घरों में ऐसे संकेत दिखाई देते हैं और उन्हें बच्चों की जिदया मूड स्विंगकहकर टाल दिया जाता है? अब समय आ गया है कि माता-पिता और परिवार यह समझें कि बच्चों का मोबाइल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक ऐसा दरवाजा भी है जिससे बाहर की दुनिया उनके कमरे में प्रवेश कर सकती है।

जब मोबाइल की दुनिया बच्चों की असली दुनिया निगलने लगे

  • रमन बोरखड़े

       गाजियाबाद के टीला मोड़ क्षेत्र में तीन नाबालिग सगी बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या किए जाने की घटना केवल एक दर्दनाक समाचार नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज, प्रशासन और डिजिटल व्यवस्था के लिए एक कठोर चेतावनी है। 16, 14 और 12 वर्ष की तीन बच्चियों का एक साथ जीवन समाप्त कर देना, किसी भी संवेदनशील समाज के लिए असहनीय और शर्मनाक स्थिति है। यह घटना बताती है कि आज बच्चों की दुनिया किस प्रकार तेजी से बदल रही है और कैसे मोबाइल की स्क्रीन के भीतर छिपा जाल, मासूम जीवन को धीरे-धीरे मौत की ओर धकेल सकता है।

      प्रारंभिक जानकारी में सामने आया है कि तीनों बहनें एक टास्क-बेस्ड कोरियन ऑनलाइन गेम का शिकार थीं। यह पहलू अत्यंत गंभीर है, क्योंकि यहां मामला केवल ऑनलाइन गेमिंग की लत या मोबाइल की आदततक सीमित नहीं दिखता। अगर किसी गेम या ऐप के जरिए बच्चों को चरणबद्ध तरीके से अलग-थलग किया जाए, परिवार से संवाद तोड़ने को कहा जाए, मानसिक दबाव बनाया जाए, भावनात्मक रूप से कमजोर किया जाए और अंततः आत्महत्या को अंतिम लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यह सीधा-सीधा एक मनोवैज्ञानिक अपराध है। यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर हमला है, जिसे सामान्य मनोरंजन या डिजिटल गतिविधि मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

      यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर बच्चों तक ऐसी सामग्री, ऐसे ऐप और ऐसे एडमिनिस्ट्रेटरकैसे पहुंच रहे हैं, जो उन्हें मौत के टास्क दे रहे हैं? क्या हमारी साइबर सुरक्षा एजेंसियां और प्रशासनिक तंत्र इतना कमजोर हो गया है कि बच्चों की दुनिया में घुसकर कोई अज्ञात व्यक्ति उन्हें नियंत्रित करता रहे और किसी को भनक तक न लगे? आज मोबाइल और इंटरनेट बच्चों के हाथ में है, लेकिन उनके आसपास सुरक्षा की दीवार नहीं है। डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा के लिए जितने नियम होने चाहिए, जितनी निगरानी होनी चाहिए, वह जमीन पर दिखाई नहीं देती।

      दूसरा पहलू परिवार और समाज के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बताया गया कि परिवार के लोग उन्हें गेम खेलने से मना करते थे, मोबाइल लेने पर वे रोती थीं, खाना छोड़ देती थीं और अकेले रहना पसंद करने लगी थीं। यह सब संकेत बताते हैं कि बच्चियां मानसिक दबाव और नियंत्रण की स्थिति में थीं। सवाल यह है कि आज कितने घरों में ऐसे संकेत दिखाई देते हैं और उन्हें बच्चों की जिदया मूड स्विंगकहकर टाल दिया जाता है? अब समय आ गया है कि माता-पिता और परिवार यह समझें कि बच्चों का मोबाइल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक ऐसा दरवाजा भी है जिससे बाहर की दुनिया उनके कमरे में प्रवेश कर सकती है।

     इस घटना में यह भी सामने आया कि पुलिस ने एक डायरी बरामद की है, जिसे बच्चियों ने ट्रू लाइफ स्टोरीनाम दिया था। यह तथ्य बताता है कि यह केवल अचानक उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि उनके मन में एक कहानी, एक योजना, एक भ्रमित विचारधारा धीरे-धीरे बन रही थी। यही सबसे भयावह है जब बच्चे कल्पना और वास्तविकता के बीच का अंतर खोने लगें और मौत को भी किसी लास्ट स्टेजया फाइनल गोलकी तरह देखने लगें। यह स्थिति केवल पुलिस जांच से नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर समझ से रोकी जा सकती है।

     घटना में यह भी बताया गया कि कोरोना के बाद आर्थिक कारणों से तीनों बच्चियां स्कूल नहीं जा रही थीं। यह तथ्य समाज के लिए एक और आईना है। स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं होता, वह बच्चों के लिए संवाद, अनुशासन, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक संतुलन का मंच भी होता है। जब बच्चे स्कूल से कट जाते हैं, तो उनका सामाजिक संसार सिमटने लगता है। फिर मोबाइल और इंटरनेट उनके लिए अकेलेपन का साथी बनता है। ऐसे में अगर गलत सामग्री, गलत ऐप और गलत लोग उनके संपर्क में आ जाएं, तो परिणाम बेहद खतरनाक हो सकता है।

    यह घटना प्रशासन और सरकार के लिए भी सीधा संदेश है कि बच्चों से जुड़े डिजिटल अपराधों पर अब सामान्य जांचवाली सोच पर्याप्त नहीं है। ऐसे टास्क-बेस्ड गेम्स, ऑनलाइन नेटवर्क और उनके संचालकों पर कठोर कार्रवाई जरूरी है। सोशल मीडिया और ऐप प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह भी जरूरी है कि स्कूलों, कॉलोनियों और स्थानीय स्तर पर डिजिटल जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि माता-पिता और बच्चे दोनों यह समझ सकें कि कौन-सी गतिविधि सामान्य है और कौन-सी खतरनाक।

     अंततः, तीन बच्चियों की मौत केवल एक परिवार का दुख नहीं है। यह हमारे समय की सामाजिक विफलता है। यह उस खतरनाक बदलाव का संकेत है जिसमें बच्चे अपने ही घर में रहते हुए भी असुरक्षित हो गए हैं। अगर समाज, प्रशासन और डिजिटल कंपनियां मिलकर बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाएंगी, तो यह त्रासदी किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहेगी। गाजियाबाद की यह घटना एक चेतावनी है कि अब बच्चों को केवल सिखाना नहीं, बचाना भी होगा।

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श्री रमन बोरखड़े, स्वतंत्र लेखक 

सेंधवा, जिला बड़वानी (म.प्र.) ,  सम्पर्क.... 9826907281