होलिका दहन की आग घर की रसोई में

  • मधुकर पवार

      आज की पीढ़ी, जो तीस वर्ष से कम आयु की है, उन्हें यह बताया जाए कि गांवों में होलिका दहन के बाद वहां से आग लाकर रसोई के चूल्हे में रख दी जाती थी तथा उसी आग से साल भर भोजन बनाया जाता था, तो शायद वे विश्वास नहीं करेंगे। लेकिन ये सत्य है। दरअसल  होलिका दहन के बाद वहां की अग्नि को घर लाकर चूल्हा जलाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। होलिका दहन की अग्नि को वर्ष भर संभालकर रखने की परम्परा भारतीय लोकजीवन की गहरी संवेदनाओं, विश्वासों और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता का प्रमाण है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में यह परम्परा भले ही समाप्त हो रही है लेकिन इसके पीछे निहित विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। जब गाँवों में लोग होलिका की अग्नि को अपने घरों तक ले जाते थे, तो यह केवल अंगारों का स्थानांतरण नहीं होता था; यह विश्वास का संचार था कि जिस अग्नि ने अधर्म को भस्म किया, वही अग्नि घर-परिवार को भी नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखेगी।

     भारतीय समाज में अग्नि को अत्यंत पवित्र माना गया है। हर शुभ कार्य में अग्नि साक्षी होती है। ऐसे में होलिका की अग्नि से चूल्हा जलाना वर्ष भर की शुद्धता और मंगलकामना का प्रतीक बन जाता था। चूल्हा केवल भोजन पकाने का साधन नहीं था बल्कि  वह घर केंद्र था, परिवार के ऊर्जा का स्रोत था । चूल्हे के इर्द-गिर्द परिवार एकत्र होकर  दिनभर की थकान और पेट की क्षुधा को दूर कर जीवन की ऊर्जा पुनः प्राप्त करते थे। इसलिए होलिका की पवित्र अग्नि से चूल्हा जलाना परिवार के सामूहिक जीवन में धर्म और सद्भाव की ज्योति प्रज्वलित करने जैसा था।

       इस परम्परा का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष यह भी है कि गांवों में होलिका दहन सामूहिक रूप से किया जाता था। पंद्रह दिन पहले से ही गाँव मे एक निश्चित स्थान पर लकड़ियाँ इकट्ठे करते और होली के दिन रात्रि में पूजा कर होलिका दहन करते थे । यह प्रथा अभी भी गांवों में प्रचलित है लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदल गई हैं और होलिका दहन के बाद आग को घर लाकर चूल्हा जलाने की केवल औपचारिकता मात्र रह गई है। यह प्रक्रिया एकता का अद्भुत प्रतीक थी। मानो पूरा गाँव एक ही अग्नि से संचालित हो रहा हो। सामाजिक समरसता और भाईचारे की भावना को पुष्ट करने का इससे बेहतर माध्यम शायद ही कोई हो। आज जब समाज छोटे-छोटे वर्गों और मतभेदों में बँटता जा रहा है, तब यह परम्परा हमें सामूहिक शक्ति का महत्व याद दिलाती है।

    धार्मिक और सामाजिक पक्ष के साथ-साथ इसमें वैज्ञानिक तर्क भी निहित हैं। होली फाल्गुन पूर्णिमा को मनाई जाती है, जब शीत ऋतु समाप्त होकर ग्रीष्म का आगमन होता है। इस संक्रमण काल में वातावरण में कीटाणुओं की संख्या बढ़ जाती है। बड़े पैमाने पर जलने वाली होलिका की अग्नि से उत्पन्न ऊष्मा और धुआँ वातावरण को शुद्ध करने में सहायक होता है। ग्रामीण समाज अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित था; उन्हें यह ज्ञात था कि अग्नि और धुआँ रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। यही कारण है कि होलिका की राख को लोग घर में लाकर माथे पर लगाते और खेतों में भी छिड़कते थे। इसे रोगनाशक और कीटनाशक गुणों वाला माना जाता था।

      व्यावहारिक दृष्टि से भी इस परम्परा का महत्व था। प्राचीन काल में आग उत्पन्न करना सहज नहीं था। माचिस का आविष्कार बहुत बाद में हुआ। लकड़ी या पत्थर के घर्षण से आग जलाना श्रमसाध्य प्रक्रिया थी। इसलिए लोग चूल्हे की आग को राख में दबाकर सुरक्षित रखते थे, ताकि अगली सुबह उसी से पुनः चूल्हा जलाया जा सके। होलिका दहन की अग्नि से वर्ष का नया अग्नि-चक्र आरम्भ करना एक प्रकार का वार्षिक नवीनीकरण था मानो पुराने दोषों को भस्म कर नई ऊर्जा के साथ जीवन प्रारम्भ करने का संदेश था।

    रूप से भी देखें तो यह परम्परा जीवन के गहन सत्य की ओर संकेत करती है। होलिका दहन हमें यह सिखाता है कि अहंकार, द्वेष और वैमनस्य को जलाकर ही समाज में सौहार्द स्थापित किया जा सकता है। जब वही अग्नि घर के चूल्हे में जलती थी, तो यह संदेश देती थी कि परिवार का पोषण केवल अन्न से नहीं, बल्कि सद्भाव और विश्वास से होता है। भोजन बनाना भी एक प्रकार का यज्ञ है, जिसमें अग्नि देवता साक्षी होते हैं।

     समय के साथ तकनीक ने जीवन को सरल बना दिया है। गैस चूल्हों और बिजली के युग में होलिका की अग्नि लाने की परम्परा लगभग लुप्तप्राय है। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या हमने उसके साथ जुड़ी संवेदनाओं को भी भुला दिया है? आज समाज में बढ़ती दूरियाँ, टूटते रिश्ते और आपसी अविश्वास कहीं न कहीं यह संकेत देते हैं कि हमें उन परम्पराओं के मूल संदेश को पुनः समझने की आवश्यकता है।

     होलिका की अग्नि से चूल्हा जलाने की परम्परा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए मार्गदर्शन है। यह बताती है कि जीवन में नवीनीकरण आवश्यक है। विचारों का, संबंधों का और मूल्यों का। यदि हम प्रतीकात्मक रूप से ही सही, अपने भीतर की नकारात्मकता को जला सकें और सकारात्मकता की ज्योति को घर-परिवार में प्रज्वलित रख सकें, तो यही इस परम्परा का सच्चा अनुसरण होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम परम्पराओं को अंधविश्वास मानकर त्यागने के बजाय उनके मूल भाव को समझें। होलिका दहन की अग्नि हमें यह सिखाती है कि समाज की शक्ति उसकी सामूहिक चेतना में निहित है। जब तक हम उस चेतना की ज्योति को प्रज्वलित रखेंगे, तब तक हमारा सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी आलोकित रहेगा। यही इस परम्परा का शाश्वत संदेश है।