अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार,पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता श्री राजकुमार बरुआ का आलेख.....

स्वयं निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक आज की नारी

  • राजकुमार बरूआ

                                                                                                                                यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

 

     अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च केवल एक तारीख नहीं बल्कि महिलाओं के संघर्ष, उनकी शक्ति और समाज में उनके योगदान को सम्मान देने का एक वैश्विक उत्सव है।

    यह दिन उन महिलाओं को समर्पित है जिन्होंने अपने अधिकारों जैसे वोट देने का अधिकार, काम के घंटे कम करना और बेहतर वेतन के साथ समानता का अधिकार देने के लिए दशकों पहले आवाज उठाई थी। यह हमें याद दिलाता है कि आज हम जिस समानता की बात करते हैं, वह एक लंबे संघर्ष का परिणाम है।

    संघर्ष अभी जारी है और "स्वयं सिद्धा" उन सभी चुनौतियों का मानसिक दृढ़ता और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ समाधान खोजकर समाज को मजबूती प्रदान कर रही है।

      नारी केवल एक शक्ति नहीं, बल्कि सृष्टि का आधार है। हम उस सृष्टि की कल्पना भी नहीं कर सकते जिसमें महिलाएं ना हो। और कहते भी है, कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला खड़ी है। महिलाऐं इस सृष्टि की प्राण वायु है जिससे इस सृष्टि का दिल धड़क रहा है। 

     नारी हर रूप में ही सम्मान जनक है - प्रेम, करुणा, शक्ति और शांति का समंदर है। मकान को घर बनाने के लिए महिला का होना आवश्यक है। इस संसार में महिलाओं को जो शक्ति ईश्वर ने दी है, वह और किसी के पास नहीं है।

     स्वयं सिध्दा - आज वह 'स्वयं सिद्धा' है - अर्थात वह जिसने अपनी सिद्धियां स्वयं प्राप्त की हैं और जो अपनी नियति का लेखन अपने साहस और परिश्रम की स्याही से कर रही है।

     कल तक महिलाओं को घर की चारदीवारी और सामाजिक मर्यादाओं के घेरे में देखा जाता था। आज वह घेरा टूट चुका है। शिक्षा की लौ ने उसे वह दृष्टि दी है, जिससे उसने न केवल अपने अधिकारों को पहचाना है, बल्कि अपनी क्षमताओं का लोहा भी मनवाया है। चाहे वह कॉर्पोरेट जगत की ऊंची इमारतें हों, सीमाओं की सुरक्षा हो  या अंतरिक्ष के अनसुलझे रहस्य, आज ऐसी कोई दहलीज नहीं जिसे स्त्री के कदमों ने ना नापा हो।

     आज की महिलाओं की सबसे बड़ी विशेषता उसका संतुलन है। वह एक तरफ आधुनिकता के शिखर को छू रही है, तो दूसरी तरफ अपनी जड़ो और संस्कारों को भी संजोए हुए है। वह 'मल्टीटास्किंग' की जीवंत मिसाल है। घर की ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए केरियर की ऊंचाइयों पर पहुंचना उसकी अदम्य इच्छाशक्ति का प्रमाण है। महिलाएं अब दूसरों के द्वारा तय किए गए रास्तों पर नहीं चलती, बल्कि अपने रास्ते खुद बनाती हैं।

      राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भागीदारी - महिलाऐं केवल सहभागिता नहीं, बल्कि आधारशिला है। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, राजनीति, और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सक्रिय योगदान देकर आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर रही हैं। मिशन शक्ति और अन्य सरकारी नीतियों के माध्यम से वे अब रूढ़ियों को तोड़कर सेना, विज्ञान व उद्यमिता में नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। आज की नारी हर उस क्षेत्र में अपने आप को दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ साबित और स्थापित कर रही है जिस पर पहले उसका पहुंचना भी असंभव माना जाता था। आज महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपना योगदान देकर राष्ट्र को मजबूती प्रदान की है। आज हर क्षेत्र में महिलाओं का योगदान सराहनीय है और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से स्वय: अनुशासन स्थापित होता है जो हर क्षेत्र के लिए अति आवश्यक है।

महिला दिवस के अवसर पर - "महिलाओं को दिया जाने वाला सबसे अनमोल और बेहतरीन उपहार उन्हें सच्चा सम्मान, समानता और उनके निर्णयों की स्वतंत्रता देना है। पुरुष वर्ग का भी कर्तव्य बनता है कि वे महिलाओं को आगे आकर काम करने की स्वतंत्रता दें, इसके लिए जरूरी है कि वे महिलाओं के काम में उनको सहयोग करें,  चाहें वह काम घरेलू हो या व्यवसाय से जुड़ा हुआ।  सहयोग देकर उसके अंदर समानता की भावना को प्रबल करें। 

      घर में काम करती महिलाओं के काम में उनकी मदद करें, उन्हें समय दे ताकि वे अपने आपको घरों के साथ अन्य कार्य क्षेत्र में भी स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।

      आपका दिया यही सहयोग समाज की जड़ों को मजबूत करेगा और राष्ट्र निर्माण के लिए दोनों की साझेदारी ही राष्ट्र को मजबूती प्रदान करेगी।

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श्री राजकुमार बरूआ वरिष्ठ लेखक, कहानीकार, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। भोपाल में निवासरत श्री बरूआ सामयिक और ज्वलंत विषयों के साथ लघुकथाएं पर निरंतर लिख रहे हैं।