श्री राम कथा: द्वितीय दिवस...

पारम्परिक विधि विधान से हुआ शिव पार्वती विवाह

श्रद्धालुओं ने पैर पखार कर लिया आशीर्वाद

        भोपाल। शिव विवाह प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि भक्ति, तप, त्याग और दिव्य प्रेम का अद्भुत उदाहरण है, जो श्रीराम कथा को और भी समृद्ध और प्रेरणादायक बनाता है।

     अयोध्या बायपास स्थित राज सम्राट नगर में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कथावाचक श्री सिद्धांत जी महाराज ने कहा कि भगवान शिव की बारात सामान्य नहीं थी, उसमें भूत, प्रेत, गण, योगी, नाग और विचित्र रूप वाले गण शामिल थे। स्वयं शिव जटाधारी, भस्म रमाए, गले में सर्प धारण किए हुए थे। जब यह बारात पार्वती के घर पहुंची तो पार्वती जी की माता मैना देवी जिन वस्तुओं से शिवजी का स्वागत करना चाहती थीं, वे सभी चीजें शिवजी के पास विराजमान थीं जिससे उन्हें आपने दामाद के दिव्य स्वरूप का आभास हुआ। उन्होंने बताया कि पूर्व जन्म में माता पार्वती, सती थीं और पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर उन्होंने देह त्याग दी थी। पुनर्जन्म लेकर वे पार्वती बनीं और बाल्यकाल से ही उनका लक्ष्य भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना था। उन्होंने शिवजी को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की, कठोर व्रत, और ध्यान के माध्यम से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया। तत्पश्चात शिवजी और पार्वती जी का विवाह हुआ।

        रविवार क़ो राज सम्राट नगर और आसपास की कालोनियों के रहवासी भी शिव पार्वती विवाह के साक्षी बने। कथा पंडाल में विवाह मंत्रोच्चार से सम्पन्न हुए विवाह के दौरान श्रद्धालुओं ने मनमोहक नृत्य किया और भगवान शिव और माता पार्वती के पैर पखारकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान पूरा पंडाल और आसपास का परिसर हर - हर महादेव के जयकारे से गूंज उठा।

श्री सिद्धांत जी महाराज ने विवाह के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में बताते हुए कहा कि रामायण में शिव विवाह और श्रीराम जानकी विवाह प्रसंग में जो भी बातें कही गई हैं वे आज भी प्रासंगिक हैं लेकिन हमने आधुनिकता के कारण उन्हें विस्मृत कर दिया है। उन परम्पराओं को पुन: अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि वे सभी वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरती हैं। इस अवसर पर आचार्य सीताराम पाठक सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन मौजूद थे।

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