मुफ्त में बदनाम "मोहन"
गटक रहे "शिव" के हिस्से का विष

इंदौर (डॉ. संतोष पाटीदार) मध्य प्रदेश में गेहूं खरीदी को लेकर बनी असमंजस की स्थिति अब राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बन गई है। देरी, दबाव और निर्णयों की उलझन के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका चर्चा में है, जबकि परिस्थितियां उनके नियंत्रण से बाहर बताई जा रही हैं।

कहते हैं कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता है, लेकिन जब खुद गेहूं ही राजनीति की चक्की में फंस जाए, तो हालात और जटिल हो जाते हैं। प्रदेश में फिलहाल कुछ ऐसी ही स्थिति दिखाई दे रही है। सरकार, यानी संतरी-मंत्री और उनके मुखिया "मुख्यमंत्री", कई तरह के दबावों से घिरे नजर आ रहे हैं। दिल्ली दरबार का दबाव भी उन पर प्रभाव डालता दिख रहा है, जिसके चलते गेहूं खरीदी लगातार टलती रही। इसे राजनीतिक मजबूरी का हिस्सा माना जा रहा है। मुख्यमंत्री किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाना चाहते हैं, लेकिन परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं हैं।

बताया जाता है कि केंद्र के पास पिछले वर्षों का गेहूं का तीन गुना तक स्टॉक मौजूद है। ऐसे में नए गेहूं के भंडारण की समस्या खड़ी हो गई है। केंद्र सरकार की नीतियों के कारण न तो गेहूं का पर्याप्त निर्यात हो पाया और न ही उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रभावी ढंग से खपाया गया। इसका असर मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों पर पड़ा है, जहां नए गेहूं की खरीदी और भंडारण को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बड़ी मात्रा में खरीदी और उस पर आने वाले खर्च को लेकर भी सरकार सतर्क है।

पिछले चार वर्षों में गेहूं के निर्यात और वितरण को लेकर अपेक्षित पहल नहीं हो सकी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अग्रिम वितरण नहीं होने और राज्य के वेयरहाउस में रखे पुराने गेहूं को समय पर नहीं उठाए जाने से समस्या और बढ़ गई। राज्य का लगभग 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक का गेहूं खरीदी का बकाया अब तक लंबित है। खरीदी के समय किसानों को भुगतान राज्य सरकार करती है, जबकि केंद्र बाद में उस राशि का समायोजन करता है, जिससे राज्य पर वित्तीय दबाव बढ़ता है।

गेहूं उपार्जन को लेकर भारतीय किसान संघ का आंदोलन पिछले कई दिनों से जारी था। अंततः सरकार ने "देर आए, दुरुस्त आए" की तर्ज पर खरीदी की तारीख घोषित कर दी। हालांकि अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार सीधे खरीदी करेगी या भावांतर योजना के माध्यम से किसानों को राहत देगी। दोनों विकल्पों के अपने-अपने जोखिम और राजनीतिक प्रभाव हैं। मोहन जी के मामले में इस तरह की राजनीति का दबाव अपने ही लोगों से अधिक बताया जा रहा है।

आर्थिक कारण भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। अधिकारियों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में निर्णय लेना आसान नहीं है। यह स्थिति कुछ हद तक पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं का परिणाम भी मानी जा रही है।

माना जा रहा है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अनदेखी के कारण कई जिम्मेदारियां प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर आ गई हैं, जो मूलतः उनके हिस्से की नहीं थीं। बारदान (बोरी) की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठे हैं, जबकि सामान्यतः इसकी तैयारी पहले ही कर ली जाती है। साथ ही, पिछले वर्ष का गेहूं स्टॉक भी समय पर वेयरहाउस से नहीं उठाया गया, जिससे भंडारण की समस्या बढ़ी।

इन परिस्थितियों का असर किसानों पर पड़ा और भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों को आंदोलन करना पड़ा। विपक्ष भी अब सक्रिय हुआ है और इस मुद्दे को लेकर आवाज उठा रहा है।

इस बीच, किसान नेता कमल सिंह आंजना का कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव संवेदनशील और दूरदर्शी नेता हैं, जो बेहतर करना चाहते हैं, लेकिन सरकारी तंत्र की जटिलताओं और सलाहकारों की कार्यशैली के कारण निर्णय समय पर नहीं हो पाते। संवाद की कमी के चलते छोटी समस्याएं भी बड़ा रूप ले लेती हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण हो या समर्थन मूल्य का मुद्दा, सरकार अक्सर तब सक्रिय होती है जब किसान संगठन आंदोलन के लिए मजबूर हो जाते हैं।

प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से एक ही दल का प्रभाव रहा है, जिससे विपक्ष कमजोर होता गया। हालांकि अब कांग्रेस ने गेहूं के समर्थन मूल्य को 3000 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग के साथ आंदोलन शुरू किया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की चेतावनी के बाद राजनीतिक हलचल तेज हुई।

बताया जाता है कि इस दबाव के बाद शिवराज जी और मोहन जी की दोनों स्तरों पर सक्रियता बढ़ी। अंततः मुख्यमंत्री ने भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों से चर्चा कर गेहूं खरीदी प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा कर दी।

कुल मिलाकर, गेहूं खरीदी का यह मुद्दा प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक जटिलताओं से जुड़ा हुआ है, जिसमें विभिन्न स्तरों की जिम्मेदारियां और दबाव स्पष्ट रूप से दिखाई  दे रहे हैं।

 

न्यूज़ सोर्स : डॉ. संतोष पाटीदार