कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुए बदलावों ने राजनीतिक गलियारे में तूफान खड़ा कर दिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी, माकपा (सीपीआई-एम) ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए हैं। माकपा का कहना है कि बंगाल में लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं।

'वोटर संदिग्ध नहीं, नागरिक हैं'

माकपा के महासचिव एमए बेबी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे पत्र में विरोध दर्ज कराया है। पत्र में दावा किया गया है कि पूरी प्रक्रिया के दौरान वोटर को एक संदिग्ध की तरह देखा गया। पार्टी का आरोप है कि अब मतदाता को यह साबित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है कि वह निर्दोष है और उसे वोट देने का हक है, जबकि यह जिम्मेदारी प्रशासन की होनी चाहिए थी।

तकनीक के इस्तेमाल पर सवाल

माकपा ने 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची के विशेष सुधार अभियान (एसआईआर) पर सवाल उठाते हुए इसे बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने की साजिश करार दिया है। पार्टी के मुताबिक, अब जमीनी स्तर पर वेरिफिकेशन की जगह 'एल्गोरिदम' और सॉफ्टवेयर के जरिए नाम हटाए जा रहे हैं। लाखों लोगों को बिना किसी ठोस आधार के 'अंडर एडजूडिकेशन' यानी, विचाराधीन श्रेणी में डाल दिया गया है। इतना ही नहीं, माकपा ने दावा किया है कि शिकायत निवारण के सरकारी पोर्टल और तंत्र या तो काम नहीं कर रहे हैं या आम जनता की पहुंच से बाहर हैं।

हाशिए के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित-माकपा

माकपा ने दावा किया गया है कि इस छंटनी का सबसे बुरा असर मुस्लिम समुदाय, महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ा है। पार्टी ने इसे संविधान के अनुच्छेद 326, वोट देने का अधिकार का उल्लंघन बताया है। माकपा का कहना है कि वोट देना सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि इंसान की गरिमा और समानता से जुड़ा मौलिक अधिकार है।माकपा ने यह भी कहा कि लिस्ट से नाम कटने और उसे दोबारा जुड़वाने की जद्दोजहद में लोगों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। पार्टी ने यहां तक दावा किया कि इस प्रक्रिया के कारण पैदा हुए तनाव से लोगों को मानसिक आघात पहुंचा है और कुछ मामलों में मौतें भी हुई हैं। माकपा ने चुनाव आयोग से मांग की है कि इस डिजिटल छंटनी को तुरंत रोककर पारदर्शी तरीका अपनाया जाए, जिससे बंगाल का कोई भी असली नागरिक लोकतंत्र के इस महापर्व से बाहर न छूटे।