आलेख......... देवभूमि में क्यों बेखौफ नाच रहीं हैं डायन…!! ..................... संजीव शर्मा
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हिमाचल प्रदेश में प्राचीन समय में लोग बीमारी, अकाल या किसी अनहोनी को डायन की करतूत मानते थे। इससे बचाव के लिए गांव के लोग मिलकर रात को अनुष्ठान करते और ढोल-नगाड़ों के साथ ऐसा माहौल बनाते कि बुरी आत्माएं डरकर भाग जाएं। धीरे-धीरे यह प्रथा लोकनृत्य और उत्सव का रूप लेने लगी, जिसे आज डगैली पर्व कहा जाता है।
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आलेख.........
देवभूमि में क्यों बेखौफ नाच रहीं हैं डायन…!!
- संजीव शर्मा
देवभूमि में डायनों का क्या काम? तो फिर हिमाचल में इन दिनों डायन या चुड़ैल क्यों नाच रही हैं ? और ऐसा क्या है कि आम लोग भी उनका रंग रूप धरकर नाचने गाने में मशगूल है? क्यों महिलाएं घर में बैठकर कभी डायन की नाक तो कभी हाथ पैर काट रही है ? और डायनों के इतने खुले प्रदर्शन के बाद भी देवता क्यों चुप है? आप भी यह सब सवाल पढ़कर चौंक रहे होंगे और अचरज में पड़ना लाजमी भी है क्योंकि देवभूमि हिमाचल प्रदेश में जहां पग - पग पर देवताओं का वास है, ऐसे में किसी भी बुरी आत्मा की मौजूदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लेकिन भाद्रपद मास की अमावस्या पर करीब दो दिन तक राज्य के कई इलाकों में कथित तौर पर डायनों का बोलबाला रहता है। कहीं यह स्थिति जन्माष्टमी के हफ्ते भर बाद बनती है तो कहीं रक्षाबंधन के पखवाड़े भर बाद।
दरअसल,हिमाचल प्रदेश की धरती अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ - साथ समृद्ध लोक संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। यहां के पर्व, मेलों और परंपराओं में पहाड़ के लोगों की आस्था, डर, विश्वास और सामूहिक जीवन की झलक मिलती है। इन्हीं लोकपर्वों में से एक है डगैली पर्व, जो इन दिनों मनाया जाता है। इसे डगयाली, दगाली, अघोरा चतुर्दर्शी, कुशाग्रहणी अमावस्या और डायनों का पर्व जैसे कई अन्य नामों से जाना जाता है। हम इसे हिमाचल का हैलोवीन भी कह सकते हैं। मेक्सिको का डिया डे लॉस मुर्टोस भी कुछ इसी तरह का पर्व है।
यह पर्व सीधे-सीधे उन कथाओं और मान्यताओं से जुड़ा है जिनमें डायन का जिक्र आता है। लोक मान्यता के अनुसार डायन बुरी शक्तियों का प्रतीक होती है और डगैली पर्व उसी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति पाने का सामूहिक प्रयास है। डगैली पर्व की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार यह पर्व सदियों पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में लोग बीमारी, अकाल या किसी अनहोनी को डायन की करतूत मानते थे। इससे बचाव के लिए गांव के लोग मिलकर रात को अनुष्ठान करते और ढोल-नगाड़ों के साथ ऐसा माहौल बनाते कि बुरी आत्माएं डरकर भाग जाएं। धीरे-धीरे यह प्रथा लोकनृत्य और उत्सव का रूप लेने लगी, जिसे आज डगैली पर्व कहा जाता है।
डगैली शब्द का संबंध डग यानी चलने या घूमने से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस पर्व की रात डायनें गांव में डग भरती हैं और लोग सामूहिक नृत्य-गीतों के जरिए उन्हें भगाते हैं। डगैली पर्व में डायन का रूप धारण करने के लिए कहीं चेहरे पर कालिख लगाई जाती है तो कहीं डरावने मुखौटे पहने जाते हैं। कांगड़ा और मंडी क्षेत्र में इसे मुखौटों के साथ तो कुल्लू और चंबा में यह लोकगीत और घर-घर टोली के जाने की परंपरा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व शिमला, सिरमौर और सोलन जैसे शहरी इलाकों में भी मनाया जाता है। लद्दाख़, नेपाल और सिक्किम में भी इस तरह के आयोजन होते हैं। आजकल कुछ स्थानों पर प्रतीकात्मक रूप से डायन का पुतला भी जलाया जाता है।
डगैली पर्व में गाए जाने वाले गीतों में अक्सर डायन के स्वभाव, उसकी शरारतों और उससे मुक्ति पाने के उपायों का जिक्र होता है। यह कुछ - कुछ मैदानी इलाकों में दीपावली के बाद भाईदूज के दिन बुराई के प्रतीक चुगलखोर की पिटाई जैसा पर्व है। यहां भी डायन या बुराई से बचने के लिए दरवाजों पर कांटे लगाए जाते हैं, हाथ में मंत्र शक्ति वाले कलावे या रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं।
डगैली पर्व का असली महत्व इसकी सामूहिकता है। पूरा गांव एक साथ मिलकर नृत्य करता है, गीत गाता है और भोज का आनंद उठाता है। इससे लोगों में आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना मजबूत होती है। वहीं, धार्मिक दृष्टि से देखें तो डगैली पर्व गांव को बुरी शक्तियों से बचाने का सामूहिक प्रयास है।
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श्री संजीव शर्मा पत्र सूचना कार्यालय, शिमला में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। पर्यटन में विशेष रूचि रखने वाले संजीव की हाल ही में दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जो काफी चर्चित रहीं। विभागीय जिम्मेदारी का निर्वाह करने के बाद संस्कृति, पर्यटन आदि विषयों पर लिख रहे हैं।

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