प्रासंगिक लेख

 

गांधीजी की सर्वधर्म प्रार्थना:

सर्वधर्म समभाव और विश्व शांति का संदेश

  • ओंकार कोसे

महात्मा गांधी की सर्वधर्म प्रार्थना सर्वधर्म समभाव और विश्व शांति  के सिद्धांत का प्रतीक है जो उन्होंने अपने जीवन में जीकर दिखाया। उन्होंने सभी धर्मों का बराबर सम्मान और मान्यता देने का सिद्धांत अपनाया उनके लिए सभी धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू थे। उन्होंने सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं आयोजित करके विभिन्न धर्मों के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास भी किया जिसमें उन्हें अपार सफलता भी मिली।

सर्वधर्म प्रार्थना क्यों करते थे: -

  धार्मिक सहिष्णुता और सौहार्द: विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच आपसी सम्मान और सहिष्णुता और सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए।

   सामाजिक एकता: सभी धर्मों को एक सूत्र में पिरोकर एकता का भाव पैदा करना।

  शांति: हिंसा को त्यागकर जनहित में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को बढ़ावा देना।

सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं में विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ मिलकर प्रार्थना करते थे। इन सभाओं में भजन, कीर्तन और प्रवचन होते थे। गांधीजी का मानना था कि सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा करना है। ईश्वर एक ही है जो सारी सृष्टि का संचालन करता है उसे सब अलग-अलग नाम से जानते है और पूजा करते हैं।

आज भी गांधीजी के विचार समाज के लिए सार्थक साबित हो रहे हैं। दुनिया भर में धार्मिक कट्टरता और हिंसा बढ़ रही है। ऐसे में गांधीजी की सर्वधर्म प्रार्थना का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

कोई गांधीजी के सर्वधर्म समभाव के विचारों से कैसे असहमत हो सकता हैं?

सभी धर्मों के धर्मावलंबी यदि अपने-अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहे और दूसरे धर्मों की निंदा करें तो शांति कैसे संभव हो सकती है? ऐसी प्रवृत्ति से तो विश्व का इतिहास रक्तरंजित रहा ही है। सर्वधर्म सम्मान और अहिंसा से विश्व में शांति हो सकती है, इस विचार से कौन असहमत हो सकता है? आधुनिक समाज में सभी देशों ने इस सिद्धांत को अपना लिया है और उन्होंने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्षता को स्थान देना शुरू कर दिया है। आज संपूर्ण विश्व मिली जुली सभ्यता और संस्कृति में जीना सीख गया है।

  गांधी जयंती, पुण्यतिथि और कई महत्वपूर्ण समारोहों व राजनीतिक, सामाजिक और संवेदनशील विषयों व घटनाओं पर पर देश भर में सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं। वे अहिंसा के पुजारी थे।  उन्होंने अपना पूरा जीवन सर्वधर्म समभाव और अहिंसा के प्रचार-प्रसार में लगा दिया परंतु फिर भी उनके जीवन का अंत भी सांप्रदायिक दंगों में शांति स्थापित करने के उनके प्रयासों के दरमियान उनके द्वारा किए जाने वाले शांति के प्रयासों के विरोध में एक कट्टर धर्मांध द्वारा उनके जीवन का अंत कर दिया। शांति के लिए हुई उनकी शहादत को याद रखने और विश्व को शांति का संदेश देने के लिए उनकी पुण्यतिथि *शहीद दिवस* के रूप में मनाई जाती है। संपूर्ण जीवन अहिंसा के लिए समर्पित करने के कारण उनके जन्मदिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इतना बड़ा सम्मान विश्व के किसी महापुरुष  को अब तक नहीं मिला है। यह भारत के लिए भी गर्व की बात है।

  गांधीजी का मानना था कि सर्वधर्म प्रार्थना से समाज में एकता और भाईचारा बढ़ेगा और ऐसा संभव हुआ भी है।

सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और सर्वधर्म समभाव गांधी जी का मानवता को सबसे बड़ा संदेश व सबसे बड़ी देन है।

महात्मा गांधी ने हिंसा और सर्वधर्म समभाव दोनों ही विषयों पर गहराई से चिंतन किया है। उनके अनुसार हिंसा और सर्वधर्म समभाव एक दूसरे के विरोधी हैं। उन्होंने सत्य और अहिंसा को जीवन का मूलमंत्र माना और उनका मानना था कि सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा करना ही है।

 हिंसा नहीं अहिंसा का मार्ग: गांधी जी ने अहिंसा को न केवल एक दर्शन, बल्कि एक शक्तिशाली हथियार माना। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा के मार्ग को अपनाकर दुनिया को दिखाया कि बिना हिंसा के भी बड़े से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। गुलामी से मुक्ति और लोकतंत्र की स्थापना के लिए कई देशों के नेताओं ने इस सिद्धांत को यू ही नहीं अपनाया है। यह उनके प्रति विश्व समुदाय की सबसे बड़ी मान्यता और श्रद्धांजलि है।

  सत्याग्रह: उन्होंने सत्याग्रह नामक एक अहिंसक विरोध का साधन विकसित किया, जिसके माध्यम से अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है और उन्होंने इसे अपने जीवन में अपनाया और सफल करके दिखाया। वर्तमान समय में राजनीतिक नेता और समाजसेवी वर्ग इस साधन का उपयोग करके अपने आंदोलनों और मिशनरी कार्यों को सफल बनाने में प्रयोग कर रहे हैं।

  अहिंसा के लिए हृदय परिवर्तन: गांधी जी का मानना था कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। हिंसा समाज के व्यापक हित में नहीं है। इसके बजाय, हमें लोगों के हृदय में परिवर्तन लाना होगा। यह सत्य अहिंसा और सत्याग्रह से संभव हो सकता हैं। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को एक साथ लाने के लिए अपने आश्रमों में नियमित रूप से तथा आंदोलनों में सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं आयोजित कीं।

दुनिया यह मानती है कि गांधीजी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। दुनिया भर में धार्मिक कट्टरता और हिंसा बढ़ रही है। ऐसे में गांधीजी की शिक्षा हमें सामाजिक एकता और सहअस्तित्व की भावना जगाने, सामाजिक सौहार्द और शांति स्थापित करने का मार्ग दिखाती है।

उनकी दो मशहूर सर्वधर्म समभाव की प्रार्थनाएं हैं जिनका विश्व भर में पाठ करके उन्हें याद किया जाता है, उनसे प्रेरणा ली जाती है।

1.

रघुपति राघव राजा राम:-

 

रघुपति राघव राजा राम

पतित पावन सीताराम

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम

सबको सन्मति दे भगवान

रघुपति राघव राजा राम

पतित पावन सीताराम।।

2.

वैष्णव जन तो तेने कहिये:-

वैष्णव जन तो तेने कहिये,

जे पीर परायी जाणे रे ।

पर दुःखे उपकार करे तो ये,

मन अभिमान न आणे रे ॥

सकल लोकमां सहुने वंदे,

निंदा न करे केनी रे ।

वाच काछ मन निश्चळ राखे,

धन धन जननी तेनी रे ॥

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी,

परस्त्री जेने मात रे ।

जिह्वा थकी असत्य न बोले,

परधन नव झाले हाथ रे ॥

मोह माया व्यापे नहि जेने,

दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे ।

रामनाम शुं ताली रे लागी,

सकल तीरथ तेना तनमां रे ॥

वणलोभी ने कपटरहित छे,

काम क्रोध निवार्या रे ।

भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां,

कुल एकोतेर तार्या रे ॥

सर्वधर्म समभाव और अहिंसा के प्रवर्तक मानवता के पुजारी महात्मा गांधी के शहीदी दिवस पर हार्दिक श्रद्धांजलि।

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             -ओंकार कोसे, स्वतंत्र लेखक 

 

न्यूज़ सोर्स : ओंकार कोसे