आपकी बात......... हे वीआईपी, मत आइए... लोग मर जाते हैं .............................. आलेख...................... रंजन श्रीवास्तव
पत्रकार दीपक सोनी की मौत सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस सोच पर सवाल है जिसमें सत्ता की चमक आम आदमी की सांसों से ज्यादा कीमती हो जाती है। अगर किसी घायल व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मरना पड़े क्योंकि एंबुलेंस "वीआईपी ड्यूटी" में थी, तो यह साफ संकेत है कि हमारे यहां लोकतंत्र से ज्यादा वीआईपी संस्कृति हावी है।
आपकी बात.........
हे वीआईपी, मत आइए... लोग मर जाते हैं
- रंजन श्रीवास्तव
यह शीर्षक पढ़कर भले कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लगे, लेकिन रायसेन में जो हुआ उसने कम से कम यही संदेश दिया है। अगर 11 अप्रैल को वहां वीआईपी कार्यक्रम नहीं होता, तो संभव है कि पत्रकार दीपक सोनी आज जीवित होते। उनकी मौत सिर्फ एक सड़क दुर्घटना का नतीजा नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था की देन थी जिसमें आम आदमी की जान से ज्यादा अहमियत वीआईपी प्रोटोकॉल को दी जाती है।
सांची निवासी दीपक सोनी पेशे से पत्रकार थे। वह रायसेन के दशहरा मैदान में आयोजित "उन्नत कृषि महोत्सव-2026" के कवरेज के लिए जा रहे थे। कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री मोहन यादव शामिल थे। रास्ते में दीपक दुर्घटना का शिकार हो गए। लेकिन असली त्रासदी दुर्घटना नहीं, उसके बाद शुरू हुई।
घायल दीपक के परिजनों और साथियों ने एंबुलेंस के लिए जिला अस्पताल और 108 सेवा से संपर्क किया। जवाब मिला कि सभी एंबुलेंस वीआईपी ड्यूटी में लगी हैं। यानी उस समय जिले की पूरी आपात चिकित्सा व्यवस्था आम जनता के लिए नहीं बल्कि वीआईपी सेवा के लिए काम कर रही थी। नतीजा यह हुआ कि करीब तीन घंटे बाद उन्हें निजी वाहन से भोपाल ले जाया गया। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दीपक की जान नहीं बच सकी।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है। यह उस संवेदनहीन व्यवस्था का चेहरा है जिसमें जीवन बचाने वाले संसाधन तक सत्ता की सेवा में झोंक दिए जाते हैं। एंबुलेंस समय पर न मिलने की घटनाएं देश में नई नहीं हैं, लेकिन यह कम ही सुनने में आता है कि किसी जिले की सारी एंबुलेंस इसलिए नदारत हों क्योंकि वे वीआईपी ड्यूटी में लगी हों। अगर ऐसा हुआ है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर प्रशासनिक विफलता है। यह शर्मनाक है पूरी व्यवस्था के लिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सभी एंबुलेंस वीआईपी ड्यूटी में भेजी जा रही थीं, तब क्या किसी अधिकारी ने यह नहीं सोचा कि इमरजेंसी आई तब क्या होगा? क्या किसी ने वैकल्पिक प्लान नहीं बनाया? क्या आसपास के जिलों से अतिरिक्त एंबुलेंस नहीं बुलाई जा सकती थीं? थोड़ी समझदारी दिखाई जाती तो वीआईपी कार्यक्रम भी हो जाता और आम लोगों की चिकित्सा सुविधा भी प्रभावित नहीं होती।
असल समस्या यही है कि हमारे सिस्टम में बहुत से अधिकारी सिर्फ आदेश मानना जानते हैं, हालात को समझना ही नहीं चाहते। उनमें निर्णय लेने का साहस कम और उच्च अधिकारियों और राजनीतिक आकाओं को खुश रखने की चिंता ज्यादा होती है। वीआईपी दौरे के समय पूरा प्रशासन इस कोशिश में लगा रहता है कि मंच, सुरक्षा, स्वागत और प्रोटोकॉल में कोई कमी न रह जाए। आम आदमी की जरूरतें पीछे छूट जाती हैं।
जिला कलेक्टर की जिम्मेदारी सिर्फ यह नहीं होती कि कार्यक्रम बिना गड़बड़ी के निपट जाए। यह भी उनकी जिम्मेदारी है कि वीआईपी कार्यक्रम के दौरान जनता की जरूरी सेवाएं प्रभावित न हों। खासकर स्वास्थ्य जैसी इमरजेंसी सेवाओं के लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए। अगर रायसेन में ऐसा नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी सिर्फ निचले अधिकारियों की नहीं, शीर्ष जिला प्रशासन की भी है।
अब घटना के बाद वही पुराना सरकारी क्रम शुरू हो गया है। जांच होगी। कार्रवाई होगी। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री नरेंद्र पटेल ने भी यही कहा। लेकिन जब सिविल सर्जन खुद मान रहे हैं कि सभी एंबुलेंस वीआईपी ड्यूटी में लगी थीं, तो फिर जांच किस बात की? इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिए?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस कार्यक्रम के लिए इतनी व्यवस्था की गई, उसी मंच से जनता के हित और विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अगर किसानों की जिंदगी नहीं बदल पाए तो मंत्री रहने का क्या फायदा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। लेकिन उसी दिन, उसी जिले में, उसी कार्यक्रम के दौरान एक घायल व्यक्ति को समय पर एंबुलेंस नहीं मिल सकी। भाषण और हकीकत के बीच फर्क इससे ज्यादा साफ शायद ही हो सकता है।
यह घटना सिर्फ दीपक सोनी की मौत नहीं है। यह उस वीआईपी संस्कृति का उदाहरण है जिसमें नेता के दौरे पर सड़कें खाली करा दी जाती हैं, ट्रैफिक रोक दिया जाता है, पूरा प्रशासन अलर्ट हो जाता है और जनता की सुविधाएं पीछे चली जाती हैं।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का सम्मान जरूरी है, लेकिन अगर उनका सम्मान आम आदमी की जान पर भारी पड़ने लगे तो यह खतरनाक स्थिति है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं, मालिक नहीं। लेकिन हमारे यहां तस्वीर अक्सर उलटी दिखती है। ऐसा लगता है मानो पूरी व्यवस्था जनता के लिए नहीं, नेताओं की सुविधा के लिए चल रही हैं।
दीपक सोनी की मौत सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस सोच पर सवाल है जिसमें सत्ता की चमक आम आदमी की सांसों से ज्यादा कीमती हो जाती है। अगर किसी घायल व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मरना पड़े क्योंकि एंबुलेंस "वीआईपी ड्यूटी" में थी, तो यह साफ संकेत है कि हमारे यहां लोकतंत्र से ज्यादा वीआईपी संस्कृति हावी है। और अगर किसी वीआईपी कार्यक्रम की कीमत एक नागरिक की जान बन जाए, तो लोगों का यह कहना गलत नहीं होगा कि "हे वीआईपी, मत आइए... लोग मर जाते हैं।"
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श्री रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स और फ्री प्रेस, भोपाल के साथ अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद इन दिनों भोपाल में निवास और सामयिक मुद्दों व राजनीति पर नियमित स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क.. 94253-51688, ईमेल - ranjansrivastava1@gmail.com
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