आईआईटी इंदौर और एम्स भोपाल मिलकर विकसित कर रहे हैं......... दुनिया की पहली लो-डोज़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पोर्टेबल 3डी एक्स-रे इमेजिंग प्रणाली
आईआईटी इंदौर और एम्स भोपाल मिलकर विकसित कर रहे हैं.........
दुनिया की पहली लो-डोज़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित
पोर्टेबल 3डी एक्स-रे इमेजिंग प्रणाली
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भोपाल। दुनिया की पहली अगली पीढ़ी की एक्स-रे इमेजिंग प्रणाली विकसित करने का गौरव आई.आई.टी. इंदौर और एम्स भोपाल को मिल सकता है। एम्स भोपाल और आई.आई.टी. इंदौर मिलकर एक्स-रे इमेजिंग प्रणाली विकसित कर रहे हैं। यह स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आम नागरिकों के लिए अत्यंत लाभकारी एक बड़ी उपलब्धि होगी।
यह प्रणाली अल्ट्रा-लो रेडिएशन डोज़, एआई तकनीक, पोर्टेबिलिटी और किफायती लागत के साथ पारंपरिक सीटी स्कैन के समान रियल-टाइम त्रि-आयामी इमेज उपलब्ध कराएगी। इसका सीधा लाभ यह होगा कि मरीजों को कम रेडिएशन में अधिक सुरक्षित, तेज और सटीक जांच मिल सकेगी। यह नई तकनीक मेडिकल इमेजिंग को केवल बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं रखेगी बल्कि, उपचार की योजना बनाने, शल्य-क्रिया के दौरान चिकित्सकों को मार्गदर्शन देने और विभिन्न रोगों के भविष्य के आकलन में भी सहायक होगी। इससे गंभीर बीमारियों का इलाज पहले से अधिक सटीक और प्रभावी हो सकेगा।
इस प्रणाली का पोर्टेबल और किफायती डिज़ाइन इसे आपातकालीन और ट्रॉमा केयर सेवाओं, एम्बुलेंस, आपदा प्रतिक्रिया इकाइयों, छोटे क्लीनिकों, जिला अस्पतालों और देशभर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपयोग के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है। इससे ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों के मरीजों को भी उन्नत इमेजिंग सुविधा उनके पास ही उपलब्ध हो सकेगी, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत होगी।
प्रारंभिक चरण में यह तकनीक मैक्सिलोफेशियल इमेजिंग के लिए विकसित की जा रही है। आगे चलकर इसे पूरे शरीर की इमेजिंग तक विस्तारित किया जाएगा। यह ट्रॉमा केयर, कैंसर प्रबंधन, ऑर्थोपेडिक चोटों और पुनर्निर्माण सर्जरी जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होगी। इसकी अल्ट्रा-लो रेडिएशन डोज़ इसे पारंपरिक सीटी स्कैन की तुलना में अधिक सुरक्षित बनाती है और भारी तथा महंगे बुनियादी ढांचे की आवश्यकता को भी समाप्त करती है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की प्रतिष्ठित “फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज – 2025” योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है। यह भारत सरकार की एक दूरदर्शी पहल है, जिसकी संकल्पना भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल के नेतृत्व में की गई है। यह एक हाई-रिस्क, हाई-रिवॉर्ड कार्यक्रम है, जो वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व बायोमेडिकल नवाचारों को प्रोत्साहन देता है। इस योजना के अंतर्गत एम्स भोपाल का विजेता के रूप में चयन, उन्नत और किफायती स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान में भारत की बढ़ती वैश्विक नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। परियोजना के अंतिम उत्पाद के पूर्ण विकास के लिए ₹8 करोड़ तक का वित्तपोषण प्रदान किया गया है, साथ ही पूरे अनुसंधान काल में आईसीएमआर द्वारा निरंतर मार्गदर्शन भी दिया जाएगा।
यह ऐतिहासिक नवाचार एक सशक्त बहु-विभागीय और बहु-संस्थागत सहयोग का परिणाम है। एम्स भोपाल से इस परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. बी. एल. सोनी (सहायक प्रोफेसर, ट्रॉमा एवं आपातकालीन चिकित्सा विभाग) हैं। सह-अन्वेषकों में डॉ. अंशुल राय (प्रोफेसर, दंत चिकित्सा विभाग), डॉ. सैकत दास (अतिरिक्त प्रोफेसर, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग) तथा डॉ. सुदीप कुमार (सीनियर रेज़िडेंट, दंत चिकित्सा विभाग) शामिल हैं। आईआईटी इंदौर की ओर से डॉ. लोकेश बसवराजप्पा (बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग) और डॉ. पुनीत गुप्ता (कंप्यूटर साइंस विभाग) इस परियोजना में सहयोग कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ. बाबू लाल और डॉ. अंशुल राय के नाम कई पेटेंट दर्ज हैं और वे पूर्व में भी अनेक चिकित्सा उपकरणों का सफल विकास कर चुके हैं।


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