दांतों की सर्जरी में स्वदेशी क्रांति

 एम्स भोपाल के मल्टी-टास्कशल्य उपकरण को पेटेंट

      भोपाल। आयातित तकनीक पर निर्भरता को कम करते हुए भोपाल के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने दंत एवं मुख शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में स्वदेशी नवाचार की नई इबारत लिखी है। संस्थान के चिकित्सकों द्वारा विकसित एक बहुउद्देश्यीय स्वदेशी शल्य उपकरण को भारत सरकार से पेटेंट मिलना न केवल चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत अभियान को जमीनी स्तर पर मजबूती देने वाला कदम भी है।

      आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में एम्स भोपाल ने स्वदेशी चिकित्सा नवाचार के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के चिकित्सकों द्वारा विकसित दंत एवं मुख शल्य चिकित्सा के लिए तैयार किया गया बहुउद्देश्यीय स्वदेशी शल्य उपकरण भारत सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से पेटेंट किया गया है। यह नवाचार दंत इम्प्लांट और माइनर ओरल सर्जरी जैसी प्रक्रियाओं को अधिक सरल, सुरक्षित और समय-कुशल बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

          इस बहुउद्देश्यीय शल्य उपकरण की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्विस-नाइफ जैसी बहु-कार्यात्मक डिजाइन है। आमतौर पर दंत सर्जरी के अलग-अलग चरणों में कई उपकरणों की जरूरत पड़ती है, जिससे प्रक्रिया जटिल और लंबी हो जाती है। यह स्वदेशी उपकरण एक ही ढांचे में कई कार्य करने में सक्षम है, जिससे सर्जरी के दौरान बार-बार उपकरण बदलने की आवश्यकता कम होती है और पूरी प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित व सुरक्षित बनती है।

      दंत इम्प्लांट जैसी जटिल मानी जाने वाली शल्य प्रक्रियाएं इस उपकरण की सहायता से अधिक सटीक और सरल हो सकेंगी। कम उपकरणों के उपयोग से त्रुटियां होने की संभावना कम होने के साथ मरीजों को कम असुविधा होगी और कम समय में सर्जरी पूरी होने से रिकवरी भी अपेक्षाकृत तेज हो सकेगी।

        इस उपकरण का कॉम्पैक्ट, हल्का और पोर्टेबल डिजाइन इसे विशेष रूप से उपयोगी बनाता है। कम स्थान घेरने की क्षमता के कारण इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। यही वजह है कि यह ग्रामीण क्षेत्रों, मोबाइल दंत इकाइयों, सीमित संसाधनों वाले क्लीनिकों और निःशुल्क शल्य शिविरों में बेहद प्रभावी साबित हो सकता है।

      एक ही उपकरण से कई प्रक्रियाएं संभव होने के कारण चिकित्सकों को महंगे आयातित उपकरणों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे उपचार की लागत में कमी, संसाधनों का बेहतर उपयोग और अधिक मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा। समय की बचत के चलते स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी व्यापक होगी।

       विशेषज्ञों का मानना है कि यह पेटेंट स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और आत्मनिर्भर भारत अभियान की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह उपलब्धि भारतीय दंत चिकित्सा प्रणाली को नई मजबूती देगी और वैश्विक स्तर पर भारत की चिकित्सा नवाचार क्षमता को पहचान दिलाएगी। आने वाले समय में यह स्वदेशी शल्य उपकरण प्रशिक्षण संस्थानों, सरकारी अस्पतालों और निजी क्लीनिकों में दंत एवं मुख शल्य चिकित्सा की कार्यप्रणाली में नए मानक स्थापित कर सकता है।

       इस स्वदेशी उपकरण के मुख्य आविष्कारक डॉ. अंशुल राय हैं। उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन में डॉ. बाबूलाल, डॉ. जितेंद्र कुमार, डॉ. ज़ेनिश भट्टी और डॉ. मोनिका राय ने सह-आविष्कारकों के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दंत शल्य चिकित्सा के दौरान आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों और चिकित्सकों के प्रतिदिन के अनुभवों को आधार बनाकर इस उपकरण की परिकल्पना और संरचना विकसित की गई।

     उल्लेखनीय है कि एम्स भोपाल निरंतर ऐसे अनुसंधान और तकनीकी प्रयासों को बढ़ावा दे रहा है, जिनका सीधा लाभ आम नागरिकों तक पहुंचे। इसी सोच के साथ विकसित यह उपकरण पूरी तरह भारतीय परिस्थितियों, संसाधनों और जरूरतों के अनुरूप तैयार किया गया है। इससे न केवल शहरी अस्पतालों में, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों और सीमित संसाधनों वाले स्वास्थ्य केंद्रों में भी बेहतर और सुलभ दंत उपचार संभव हो सकेगा।