आपकी बात......... तानाशाहों की सनक से पूरे विश्व को खतरा ! ................आलेख.................. रंजन श्रीवास्तव
ट्रंप के “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” के नारे के पीछे दरअसल उनकी अति महत्वाकांक्षा छिपी हुई है और वो किसी तरह अमेरिका के संविधान में परिवर्तन करके तीसरी बार प्रेसिडेंट बनना चाहते हैं और कैसे भी हो, वे नोबेल पीस प्राइज पाना चाहते हैं। इसके बावजूद कि नोबेल पीस प्राइज विश्व में शांति के लिए प्रयास करने वालों को दिया जाता है, ना कि युद्ध और हिंसा को बढ़ावा देने वालों को।
आपकी बात.........
तानाशाहों की सनक से पूरे विश्व को खतरा
- रंजन श्रीवास्तव
विश्व में रूस- यूक्रेन, भारत-पाकिस्तान सहित कई युद्ध अपने मध्यस्थता से रुकवाने का दावा करने तथा इसके बदले नोबेल पीस प्राइज पाने में असफलता के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वयं अमेरिका को एक अनचाहे युद्ध में झोंक दिया है जिसकी वजह से पूरे विश्व में उथल पुथल का माहौल है।
ईरान पर अमेरिका और इसराइल के संयुक्त हमले तथा ईरान द्वारा अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर प्रत्युत्तर में हमले के बाद कई देश इस युद्ध के चपेट में आ गए हैं और क्रूड आयल तथा प्राकृतिक गैस का संकट झेल रहे हैं।
आर्थिक बाजार को गहरी मार पड़ी है। कई देशों खासकर मीडिल ईस्ट के देशों में दूसरे देशों से आए टूरिस्ट फंसे हुए हैं। आवागमन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अगर युद्ध लंबा खिंचा तो मंहगाई तथा खाद्य संकट की गहरी मार पड़ेगी।
ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की अमेरिकी और इसराइल द्वारा हमले में मृत्यु के बाद उनका बेटा मोजतबा खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर आसीन हो गए हैं। उसने ट्रम्प को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि अमेरिका नहीं बल्कि ईरान यह तय करेगा कि युद्ध की समाप्ति कब होगी।
मोजतबा का बयान दरअसल ट्रम्प के उस बयान के बाद आया जिसमें खामेनेई की मृत्यु के बाद ट्रम्प ने युद्ध की जल्द ही समाप्ति की घोषणा की थी।
दरअसल ट्रम्प जबसे अमेरिका के दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं तबसे उनके सनक भरे फैसलों तथा एकतरफा टैरिफ की मार से पूरे विश्व की अर्थ व्यवस्था पर संकट की स्थिति है क्योंकि भारत सहित बहुत से देशों के व्यापार की कड़ी डॉलर है। साथ ही ट्रम्प यह नहीं चाहते कि कोई भी देश विश्व व्यापार अपनी मर्जी से करे। भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील इसका नवीनतम उदाहरण है।
भारत द्वारा रूस से क्रूड आयल ख़रीदी पर रोक के बाद ही भारत यूएस डील संभव हो पाई। ईरान पर अमेरिका द्वारा हमले के बाद अमेरिका ने भारत को रूस से तेल ख़रीदने के लिए 30 दिनों का समय दिया जिसको लेकर भारत में समूचा विपक्ष सत्ता पक्ष ख़ासकर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर है कि अमेरिका कौन होता है जो भारत को किसी देश के साथ व्यापार करने की अनुमति दे।
वस्तुतः अमेरिका की बंदिशें ना सिर्फ़ विभिन्न देशों के बीच पुराने संबंधों के लिए खतरा बन रही हैं बल्कि विभिन्न देशों के आंतरिक राजनीतिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर रही हैं। उदाहरण के स्वरूप भारत और रूस के बीच दशकों पुराने संबंध रहे हैं पर अमेरिका के ट्रेड डील की बंदिशों के चलते भारत को रूस से तेल खरीदी बंद करनी पड़ी। तेल संकट की वर्तमान स्थिति में भारत को रूस के पास फिर तेल ख़रीदने जाना पड़ रहा है। प्रश्न यह है कि क्या यह तेल ख़रीदी पुराने रेट पर हो पाएगी जिस रेट पर रूस भारत को अमेरिकी बंदिशों के पूर्व तेल बेच रहा था?
भारत के रिश्ते ईरान से भी सहज रहे हैं पर अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के बाद भारत को एक स्पष्ट रूख की बजाय एक नपा तुला संदेश देना पड़ा। ईरान और कुछ खाड़ी देशों के मध्य भी उनके पुराने संबंध प्रभावित हुए हैं।
पर इन सभी स्थितियों से परे रहते हुए ट्रम्प अपनी ही राह पर चल रहे हैं। कोर्ट द्वारा टैरिफ को ग़लत ठहराये जाने वाले फ़ैसले की भी उनको परवाह नहीं है।
ट्रंप के “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” के नारे के पीछे दरअसल उनकी अति महत्वाकांक्षा छिपी हुई है और वो किसी तरह अमेरिका के संविधान में परिवर्तन करके तीसरी बार प्रेसिडेंट बनना चाहते हैं और कैसे भी हो, वे नोबेल पीस प्राइज पाना चाहते हैं। इसके बावजूद कि नोबेल पीस प्राइज विश्व में शांति के लिए प्रयास करने वालों को दिया जाता है, ना कि युद्ध और हिंसा को बढ़ावा देने वालों को।
यह भी कहा जा रहा है कि एपस्टीन फाइल जिसमें ट्रम्प का कई बार जिक्र है और जिसने इस समय विश्व के कई नेताओं और उद्योगपतियों के अनैतिक आचरण को विश्व के सामने दिन की रोशनी में ला दिया है, को चर्चा से बाहर करने के लिए ट्रम्प ने युद्ध का रास्ता अपनाया है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जो ट्रम्प की ही तरह अंदर से तानाशाह हैं, यूक्रेन का अस्तित्व ख़त्म करने पर आमादा हैं। चुनाव और लोकतंत्र के आवरण में सत्ता को बलपूर्वक हासिल करने की उनकी प्रवृत्ति अब विश्व के सामने है। उनके राजनीतिक विरोधी अचानक प्लेन या हेलीकॉप्टर क्रैश का अचानक कैसे शिकार होते हैं या जेल के सलाखों के पीछे कैसे पहुँचा दिए जाते हैं ? इस पर सैकड़ों मीम्स बन चुके हैं।
चीन, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, उत्तरी कोरिया, ईरान, इराक़, सीरिया तथा कई अन्य देशों में भी लोकतंत्र की बात करना ही बेमानी है। धार्मिक मदांधता को हथियार बनाकर कई कुछ समूह विश्व के एक बड़े भूभाग पर सत्ता पर कब्जा बनाए हुए हैं। बांग्लादेश इसका नवीनतम उदाहरण है। ऐसे देशों में मानव अधिकारों का दमन खुलेआम हो रहा है।
तानाशाहों की सत्ता को कब्जा करने की प्रवृत्ति सदियों से रही है पर चिंता की बात यह है कि विश्व के जिन हिस्सों में लोकतांत्रिक व्यवस्था समय समय पर स्थापित की गई वहाँ के लोकतंत्र को भी कुछ व्यक्तियों या समूहों की तानाशाही प्रवृत्ति उसको हड़प कर जाना चाहती है। यह मानव सभ्यता के लिए चिंता की बात है.
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श्री रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स और फ्री प्रेस, भोपाल के साथ अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद इन दिनों भोपाल में निवास और सामयिक मुद्दों व राजनीति पर नियमित स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क.. 94253-51688, ईमेल - ranjansrivastava1@gmail.com

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