कहा जाता है कोई तीर्थ जाने की इच्छा हो, नहीं जा पाएं तो जो उस तीर्थ में होकर आएं हों, उनका दर्शन-पूजन करने से भी तीर्थ यात्रा का लाभ मिल जाता है। वर्षों से तमन्ना रही है कि नमामी देवी नर्मदे की पैदल परिक्रमा करुं, अब तक तो यह इच्छा पूरी हुई नहीं, मित्र विनोद पुरोहित हाल ही में नवंबर से शुरु की गई नर्मदा परिक्रमा 118 दिन में पूरी कर लौटे तो उनसे हुई चर्चा रोचक-रोमांचक थी। परिक्रमा करने वाले पूर्व यात्रियों की तरह विनोद भाई 3700 किमी से अधिक लम्बी और दुष्कर यात्रा में हर दिन 30 से 35 किमी तक पैदल चले, पैरों में छाले भी पड़ गए, रात में जहां रुकते तो लगता कि कल शायद ही यात्रा शुरु कर पाएं किंतु सूर्योदय के साथ ही आस्था, साहस और संकल्प की त्रिवेणी आगे चलना है की ऊर्जा पैदा कर देती थी।

सपने में मां नर्मदा ने बुलाया और ...........

वरिष्ठ पत्रकार विनोद पुरोहित ने कर ली नर्मदा परिक्रमा

118 दिन में चले 3700 किमी

 वरिष्ठ पत्रकार विनोद पुरोहित मध्यप्रदेश की जीवन रेखा पुण्य सलिला नर्मदा की पैदल परिक्रमा कर हाल ही में लौटे हैं। तीन राज्यों मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात को  जोड़ने वाला नर्मदा परिक्रमा मार्ग करीब 3700 किमी से अधिक है। विनोद पुरोहित ने 11 नवंबर को ओंकारेश्वर से परिक्रमा शुरु की और 118 दिन पैदल चलते हुए 8 मार्च को बाद वापस ओंकारेश्वर लौटे। इन 118 दिनों में हर दिन 30-35 किलोमीटर चले, भिक्षा में जो मिला खा लिया। यात्रा कष्टदायी इसलिये नहीं लगी क्योंकि आस्था हिलोरे मार रही थी। यात्रा मार्ग में माल (गांजा) बेचने वाले भी टकराए, जहां चेतावनी लिखी थी नशा नहीं करें, वहां गेरुआ वस्त्रधारी चिलम फूंकते भी मिले। शिवराज सिंह चौहान के वक्त नर्मदा के किनारे वृहद पैमाने पर पौधारोपण के दावे भी हुए थे, उस इवेंट में प्रधानमंत्री भी आमंत्रित थे। नर्मदा मैया की कृपा से शिवराज केंद्रीय मंत्री बन गए लेकिन उनके वक्त रोंपे पौधे वृक्ष बन गए हों, ऐसा परिक्रमा करने वाले पत्रकार विनोद पुरोहित को कहीं नहीं लगा।

     नर्मदा परिक्रमा की चर्चा चले और  नर्मदा सौंदर्य के विख्यात चित्रकार एवं लेखक अमृतलाल वेगड़ जी का नाम याद ना आए, यह असंभव है। उनके लिखे साहित्य ने सैकड़ों लोगों को परिक्रमा करने के लिये प्रेरित किया है। अब पुरोहित भी यात्रा वृतांत लिखेंगे जिसमें सरकार की उदासीनता के साथ ही महाराष्ट्र वाले हिस्से में सेवा करने वालों का जिक्र और अनूपपुर में बेगा जाति के रहवासियों की सरकारी उपेक्षा के उल्लेख के साथ नर्मदा मैया के प्रति अटूट आस्था से जुड़े प्रसंग भी होंगे। 

     कहा जाता है कोई तीर्थ जाने की इच्छा हो, नहीं जा पाएं तो जो उस तीर्थ में होकर आएं हों, उनका दर्शन-पूजन करने से भी तीर्थ यात्रा का लाभ मिल जाता है। वर्षों से तमन्ना रही है कि नमामी देवी नर्मदे की पैदल परिक्रमा करुं, अब तक तो यह इच्छा पूरी हुई नहीं, मित्र विनोद पुरोहित हाल ही में नवंबर से शुरु की गई नर्मदा परिक्रमा 118 दिन में पूरी कर लौटे तो उनसे हुई चर्चा रोचक-रोमांचक थी। परिक्रमा करने वाले पूर्व यात्रियों की तरह विनोद भाई 3700 किमी से अधिक लम्बी और दुष्कर यात्रा में हर दिन 30 से 35 किमी तक पैदल चले, पैरों में छाले भी पड़ गए, रात में जहां रुकते तो लगता कि कल शायद ही यात्रा शुरु कर पाएं किंतु सूर्योदय के साथ ही आस्था, साहस और संकल्प की त्रिवेणी आगे चलना है की ऊर्जा पैदा कर देती थी।

सपने आते थे नदी के किनारे घूमते रहने के 

विनोद भाई से जब पूछा कि यकायक परिक्रमा करने का मन कैसे बन गया, उनका कहना था मैं तो अमर उजाला के कंटेंट एडिटर के रूप में घर से ही काम कर रहा था। एक बार कानपुर ऑफिस में आईं साध्वी भारती ठाकुर ने परिक्रमा से जुड़े अपने प्रसंग सुनाए तो लगा कि परिक्रमा करना चाहिए। 

- सपने में कई बार ऐसा लगता था कि मान नर्मादा बुला रही है। सपने में ही नदी किनारे घूमता रहता था।

- नवंबर में जब तय कर लिया कि परिक्रमा करना है तो ओंकारेश्वर पहुंच गए। पहले साथ में पत्रकार मित्र आलोक ठक्कर भी जाने वाले थे लेकिन माई का बुलावा नहीं आया तो उनका जाना टल गया। 

- विनोद जी अकेले ही गए, अपनी इस परिक्रमा का सारा श्रेय वो पत्नी अर्चना को देते हैं। वो तो नहीं गईं लेकिन उनकी सहर्ष मंजूरी से ही वे बेधड़क जा पाए। 

यहां से वे वाहन से ओंकारेश्वर पहुंचे। वहां दर्शन-पूजन किया। यहीं से परिक्रमा शुरु होती है, पैदल यात्रियों को संकल्प दिलाया जाता है। 

संकल्प यही कि परिक्रमा के दौरान बाल नहीं काटेंगे, नाखून नहीं काटेंगे, ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे, नशा नहीं करेंगे।

-   सूर्योदय से परिक्रमा मार्ग पर चलेंगे और सूर्यास्त से पहले तक जहां पहुंचेंगे, वहीं रात्रि विश्राम के लिए रुक जाएंगे। वहां किसी का झोपड़ा हो या पंचायत भवन वही आश्रय स्थल रहेगा। 

-   सात्विक भोजन में जो मिल जाए वही खाएंगे, दाल-रोटी, खिचड़ी आदि। 

पूरे परिक्रमा मार्ग में पैसे से कुछ खरीदेंगे नहीं, हाथ फैलाकर भिक्षा में जो, जैसा मिल जाएगा वो ही खाएंगे। 

-   इस परिक्रमा को आसानी से करने का सार कवि नीरज की दो पंक्तियों में है- जितना कम सामान होगा, सफर उतना आसान होगा। 

परिक्रमा करने वाले अपने साथ एक डंडा- सिर की ऊंचाई जितना- एक स्टील का डिब्बा (कमंडल), कंधों पर टांगा जा सके ऐसा पिट्ठू बेग- जिसमें ओढ़ने-बिछाने की चादर आदि रहती है- सिर को गर्मी से बचाने के लिए पंछा, बस इतना सामान लेकर चलते हैं। 

अमेरिका में कार्यरत बेटे के बेग में चादर-कपड़े ले रखे थे। परिक्रमा में कंधे पर लटके इस थैला से अनुभूति होती रही कि बेटा भी साथ चल रहा है।

बहते रहो नर्मदा मैया की तरह 

    वो जो कहावत है संतोषी, सदा सुखी-कुछ ऐसी ही दिनचर्या हो गई है पुरोहित जी की। जैसे नर्मदा मैया बिना किसी से राग द्वेष, अपेक्षा के निर्बाध गति से बहती रहती है- परिक्रमा में मोह-माया से विरक्ति ने उनकी दिनचर्या भी बदल दी है। परिक्रमा से पहले उनका वजन 90 किलो था जो घट कर 70 किलो हो गया है। 

     मप्र, महाराष्ट्र और गुजरात इन तीन राज्यों को जोड़ने वाले परिक्रमा मार्ग में कई विश्राम स्थलों पर जहां नशा करना मना है, जैसी चेतावनी लिखी थीं, वही गेरुआ वस्त्रधारी चिलम फूंकते मिले। यही नहीं, यात्रियों के आसपास मंडराने वाले बाइक सवार यह भी पूछते रहते थे - माल ( गांजा) चाहिए क्या ? महाराष्ट्र के परिक्रमा क्षेत्र में वहां के सेठों-ज्वेलर्स ने विश्राम स्थल बना रखे हैं जहां उनके कर्मचारी परिक्रमावासियों की सेवा करते हैं लेकिन इन सेठों का उद्देश्य रिद्धी-सिद्धी से अधिक प्रसिद्धी पाना और अपनी कमाई को सीएसआर फंड के जरिये उजला करना भी रहता है। 

 पत्रकारों और राजनेताओं की नर्मदा परिक्रमा

    इंदौर के जिन पत्रकार मित्रों ने नर्मदा परिक्रमा हाल ही में की है उनमें ओम द्विवेदी, किरण वाईकर और विनोद पुरोहित के नाम मुझे याद हैं। किरण भाई तो अब वाहन से परिक्रमा करवाने की व्यवस्था भी करने लगे हैं। 

     राजनेताओं की बात करें तो पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह पत्नी अमृता राय के साथ 2017-18 में 192 दिनों में लगभग 3,300 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा कर चुके हैं। यात्रा सम्पन्न करने के बाद इंदौर की ही एक पंचतारा होटल में दिग्विजय सिंह ने यात्रा के संस्मरण भी सुनाए थे। अमृता राय ने अपनी इस परिक्रमा पर किताब लिखने की घोषणा भी की थी लेकिन वो तो अब तक किताब लिख नहीं पाईं, इस परिक्रमा का अदृश्य आशीर्वाद दिग्विजय सिंह को यह मिला था कि मप्र में कमलनाथ के नेतृत्व में बनी (18 महीने चली) कांग्रेस सरकार में दिग्विजय सिंह की यह परिक्रमा लाभदायक रही थी। 

     भाजपा की मोहन यादव सरकार में पंचायत-ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल भी नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। इस विभाग के मंत्री होने से परिक्रमावासियों को यह लाभ मिला है कि यात्रा मार्ग में जितने भी पंचायत भवन आते हैं, उनमें परिक्रमावासियों को विश्राम स्थल की सुविधा मिल गई है। किसान मोर्चा के प्रदेश मंत्री राजीव पटेल और टीवी अभिनेता-नेता विक्रम मस्ताल (बुधनी विधानसभा सीट से शिवराज सिंह के खिलाफ कांग्रेस से चुनाव लड़ा और पराजित हुए थे) भी नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। 

    प्रशासनिक अधिकारियों की बात करें तो इसी साल फरवरी में रिटायर हुए मप्र के पूर्व गृह सचिव- लेखक ओम प्रकाश श्रीवास्तव भी पत्नी भारती के साथ परिक्रमा कर रहे हैं। ओपी श्रीवास्तव ने कोठी बाजार नर्मदापुरम में देह विदेह आश्रम स्थापित कर रखा है, जिसमें नर्मदा परिक्रमावासियों की ठहरने एवं भोजन व्यवस्था होती है। उन्हें पिछले 17 वर्षो से मां नर्मदा के समीप प्रशासनिक सेवा का अवसर मिला, तभी उन्होने संकल्प लिया कि सेवानिवृत्त होने के बाद मां नर्मदा की पैदल परिक्रमा करेगें।

श्रीवास्तव का कहना है मां नर्मदा की परिक्रमा बड़ी पौराणिक है। व्यक्ति आत्म कल्याण और आध्यात्मिक प्रगति के लिए परिक्रमा करते है। हम सेवानिवृत्त होते ही वानप्रस्थ में प्रवेश कर गये, हमें श्रीमद्भागवत जी से बडी प्रेरणा मिलती है। परिक्रमावासी उनकी पत्नी भारती श्रीवास्तव ने कहा कि मां नर्मदा की पैदल परिक्रमा से बडी सुखद अनुभूति हो रही है। नर्मदा परिक्रमा वासियों के प्रति लोगों के मन में बडी श्रद्धा एवं सेवा देखने को मिल रही है । उन्होंने कहा कि अंधविश्वास आडंबर चमत्कार से दूर रहे। हमको स्वयं अपना उद्धार करना है।

नहीं दिखे पूर्व सीएम के वक्त लगाए लाखों पौधे 

   अपने पूरे शासन के दौरान नर्मदा मैया का गुणगान करने वाले शिवराज सिंह चौहान ने परिक्रमा मार्ग पर करोड़ों की संख्या में पौधे लगाने का अभियान चलाया था। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह भले ही अभी भी दिन की शुरुआत पौधारोपण से कर रहे हों लेकिन परिक्रमा मार्ग पर रोपे वो करोड़ों पौधे, पेड़ के रूप में कहीं नजर नहीं आए पुरोहित को। 

    बड़वानी के आगे शूलपाणी के घने जंगल में बसे आदिवासी परिवार पहले भले ही यात्रियों के साथ लूटपाट के कारण बदनाम रहे हों लेकिन नर्मदा मैया ने इनका हृदय परिवर्तन कर दिया है। अब ये आदिवासी इन यात्रियों के लिये भोजन का इंतजाम करते हैं, भले ही इन्हें पानी तीन से पांच किलोमीटर दूरी से लाना पड़ता हो या परिवार की गर्भवती महिला को खटिया पर डाल कर पांच-दस किमी दूर अस्पताल ले जाना पड़ता हो। मप्र सरकार लाड़ली बहनों कि बेहतरी के लिए जितनी योजनाएं चला रही हैं, उन सब का लाभ परिक्रमा मार्ग वाले आदिवासी बहुल गांवों में अब तक भी नहीं पहुंचा है। (कीर्ति राणा इंदौर।) 

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वरिष्ठ पत्रकार श्री कीर्ति राणा, इंदौर