विश्व जल दिवस: आंकड़े बता रहे हैं जल संकट की भयावह सच्चाई
कृषि क्षेत्र, जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जल संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। देश में कुल जल उपयोग का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा कृषि में ही व्यय होता है, फिर भी केवल लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित है, जबकि शेष खेती मानसून पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार भारत में लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई भूजल पर आधारित है। यही कारण है कि भूजल स्तर में गिरावट सीधे कृषि उत्पादन और किसानों की आजीविका को प्रभावित करती है।
विश्व जल दिवस:
आंकड़े बता रहे हैं जल संकट की भयावह सच्चाई
हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है, जो हमें यह स्मरण कराता है कि जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का मूल आधार है। पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से आच्छादित है, किंतु इसमें से करीब 97.5 प्रतिशत जल खारा है और मानव उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है। मात्र 2.5 प्रतिशत मीठा जल उपलब्ध है, जिसमें से भी लगभग 68 प्रतिशत ग्लेशियरों और बर्फ में तथा करीब 30 प्रतिशत भूजल के रूप में सुरक्षित है। वास्तविकता यह है कि मानव उपयोग के लिए उपलब्ध जल कुल जल का 1 प्रतिशत से भी कम है। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी यहां निवास करती है, जबकि जल संसाधनों में इसकी हिस्सेदारी केवल 4 प्रतिशत है।
तेजी से बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने जल की मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 60 करोड़ लोग जल संकट का सामना कर रहे हैं और हर वर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु असुरक्षित पेयजल के कारण हो जाती है। देश के अनेक हिस्सों में आज भी स्वच्छ पेयजल की नियमित उपलब्धता एक बड़ी समस्या बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं और बच्चे प्रतिदिन 2 से 5 किलोमीटर तक पानी लाने के लिए चलते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में भी जल आपूर्ति असमान रूप से वितरित है। जल स्रोतों का प्रदूषण इस संकट को और गंभीर बना रहा है। भारत के लगभग 70 प्रतिशत सतही जल स्रोत प्रदूषित हो चुके हैं और उत्पन्न होने वाले सीवेज का केवल 30 से 35 प्रतिशत ही शुद्ध किया जाता है, शेष सीधे नदियों और झीलों में प्रवाहित हो जाता है।
कृषि क्षेत्र, जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जल संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। देश में कुल जल उपयोग का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा कृषि में ही व्यय होता है, फिर भी केवल लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित है, जबकि शेष खेती मानसून पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार भारत में लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई भूजल पर आधारित है। यही कारण है कि भूजल स्तर में गिरावट सीधे कृषि उत्पादन और किसानों की आजीविका को प्रभावित करती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोग करने वाला देश है, जहां प्रतिवर्ष लगभग 250 से 260 अरब घन मीटर भूजल का दोहन किया जाता है, जो अमेरिका और चीन के संयुक्त उपयोग से भी अधिक है। देश के 700 से अधिक जिलों में से लगभग 256 जिले ‘अत्यधिक दोहन’ की श्रेणी में आ चुके हैं। कई बड़े शहरों जैसे दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है और अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत में जल की मांग उपलब्ध संसाधनों से दोगुनी हो सकती है।
जल संकट के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें अत्यधिक जल दोहन, पारंपरिक सिंचाई पद्धतियों में पानी की बर्बादी, वर्षा जल संचयन की कमी, वनों की कटाई और अनियोजित शहरीकरण प्रमुख हैं। भारत में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1100 मिलीमीटर होती है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा बिना उपयोग के बह जाता है, क्योंकि हम वर्षा जल के संचयन और संरक्षण की समुचित व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। कंक्रीट के बढ़ते विस्तार ने भी जल के प्राकृतिक रिसाव को कम कर दिया है, जिससे भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
हालांकि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन इसके समाधान भी उपलब्ध हैं। वर्षा जल संचयन को व्यापक रूप से अपनाकर भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है। यदि शहरी क्षेत्रों के केवल 20 प्रतिशत घरों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग लागू हो जाए, तो जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसी प्रकार ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों के उपयोग से 30 से 70 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है, साथ ही कृषि उत्पादन में भी वृद्धि होती है। अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग की दिशा में भी भारत को गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान में देश में 20 प्रतिशत से भी कम अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण होता है, जबकि इज़राइल जैसे देश 80 से 85 प्रतिशत तक जल का पुन: उपयोग कर रहे हैं। वृक्षारोपण भी जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि पेड़ न केवल वर्षा को आकर्षित करते हैं, बल्कि मिट्टी की नमी बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।
जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, जैसे जल जीवन मिशन, जिसका उद्देश्य हर घर तक नल से जल पहुंचाना है, और अटल भूजल योजना, जो भूजल स्तर को सुधारने पर केंद्रित है। इसके अलावा नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से नदियों की सफाई का कार्य भी किया जा रहा है। हालांकि इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं, लेकिन जल संकट की गंभीरता को देखते हुए समाज के हर वर्ग की भागीदारी अनिवार्य है।
भविष्य की दृष्टि से देखें तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। विश्व बैंक के अनुसार जल संकट के कारण भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, जबकि वर्ष 2050 तक विश्व की लगभग 40 प्रतिशत आबादी जल संकट से प्रभावित क्षेत्रों में रहने को मजबूर हो सकती है। यह स्पष्ट संकेत है कि यदि हमने अभी से जल संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनाया, तो आने वाले समय में जल के लिए संघर्ष एक कठोर वास्तविकता बन सकता है।
विश्व जल दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम आत्ममंथन करें और जल के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें। जल सीमित है, लेकिन इसका महत्व असीम है। हमें यह समझना होगा कि जल की हर बूंद अनमोल है और इसका संरक्षण ही हमारे भविष्य की सुरक्षा है। यदि हम आज सचेत होकर जल बचाने का संकल्प लेते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य दे सकते हैं। (साभार)

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