खाड़ी युद्ध से उत्पन्न संकट से देश को बचा रही है कृषि

   ग्रीन के बाद एवरग्रीन रिवॉल्यूशन की जरूरत - श्री कुलकर्णी

 इंदौर (डॉ. संतोष पाटीदार)। ईरान - अमेरिका इजरायल युद्ध से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था खतरे में आ चुकी है। जीवन रक्षक और जीवन उपयोगी जरूरतों का अकाल पड़ने लगा है। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था खाद्य सुरक्षा और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के कारण मजबूत बनी हुई है। यह पहला अवसर नहीं है जब देश को भयावह संकट से खेती किसानी ने बचाया है। कोरोना में देश को कृषि उत्पादन ने बचाया। देश की लगभग 80 करोड़ आबादी को मुक्त में अनाज मिला यह देश की खेती किसानी के कारण ही संभव हो पाया। जब भी राष्ट्र पर खतरा आता है कृषि सुरक्षा कवच का काम करती है। इतना सब होने के बावजूद देश की खेती किसानी संकट में है। खूब उत्पादन हो रहा है लेकिन वह पौष्टिक या गुणकारी नहीं रहा।

       यह विचार भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री दिनेश कुलकर्णी ने एक कार्यक्रम व्यक्त करते हुए कहा कि हमने भोजन को जहरीला कर दिया है। खेती की उत्पादन क्षमता और जमीन लगातार कम होती जा रही है। देश में 80% किसानो के पास सीमित कृषि भूमि है। देश की 50% भूमि पर ही सिंचाई की सुविधा है। विकास के नाम पर कृषि भूमि का तेजी से अधिग्रहण होकर खेती किसानी तेजी से कम की जा रही है। इस दिशा में सरकार को अपनी नीतियों में आमूल चूल बदलाव करने होंगे। श्री कुलकर्णी ने कहा कि देश और देश की खेती किसानी अतीत में पूरी तरह आत्मनिर्भर थी, वर्तमान में हम विदेशों पर आश्रित होते जा रहे हैं। देश को आत्मनिर्भर बनाने के अभियान की सफलता खेती किसानी की मजबूती व आत्मनिर्भरता से ही संभव हो सकेगी।

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खांटी वरिष्ठ प्रचारक दिनेश कुलकर्णी जब भारत राष्ट्र के अतीत वर्तमान और भविष्य के कृषि परिदृश्य पर वैज्ञानिक तथ्यों के साथ मंच से धारा प्रवाह अपना संबोधन दे रहे थे, तो पूरा सभागृह " पिन ड्रॉप साइलेंस " होकर मंत्र मुग्ध भाव से सुन रहा था। आपने देश के करीब चार सौ वर्ष पूर्व की अतीत की सुनहरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के पन्ने पलटते हुए बताया कि भारत कृषि प्रधान नहीं, वरन कृषि आधारित वाणिज्य और ग्राम आधारित उद्योग व्यापार व्यवसाय के कारण दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र था। उस समय खेती का परम्परागत ज्ञान पूरी तरह विज्ञान आधारित रहा इसका उल्लेख अंग्रेजों ने अपने ब्रिटिश गजेटियर में भी किया है। वर्धा के गांधी आश्रम के प्रमुख धर्मपाल सिंह ने ब्रिटेन जाकर इन गैजेटीयर का अध्ययन किया था। अतीत में भारत की टेक्नोलॉजी दुनिया में हो रहे आविष्कारों से कहीं ज्यादा आगे थी और यह टेक्नोलॉजी ग्रामीणों के पारंपरिक वैदिक ज्ञान पर आधारित थी। आजादी के बाद 1960 के दशक में आए अकाल से उत्पन्न खाद्यान्न संकट की स्थिति से निपटने के लिए हरित क्रांति लाई गई। इससे उत्पादन तो बढ़ा लेकिन समस्याएं कहीं ज्यादा खड़ी हो गई। आधुनिक कृषि से देशी बीज से लेकर दुधारू पशुओं और बैल आदि की नस्ल हाइब्रिड प्रजातियों में बदल गई। रासायनिक उर्वरक और जहरीले कीटनाशक से खाद्यान्न जहरीला हो गया और मिट्टी मृतप्राय हो गई है। इसलिए अब ग्रीन रिवॉल्यूशन के साथ एवरग्रीन रिवॉल्यूशन की सख्त जरूरत है। यानी पर्यावरण प्रकृति आधारित खेती से ही देश की कृषि सुरक्षित रह पाएगी।

      श्री कुलकर्णी ने कहा कि वर्तमान वैश्विक टैरिफ वॉर और युद्ध जैसे हालातों के कारण विश्व अर्थव्यवस्था अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में भारतीय कृषि न केवल देश की खाद्य सुरक्षा, बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था को स्थिर और मजबूत बनाए रखने की क्षमता रखती है। उन्होंने बताया कि कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है,  देश के जीडीपी में कृषि का  योगदान लगभग एक चौथाई यानी 25% से अधिक है। देश में 50% से अधिक रोजगार कृषि क्षेत्र में है लगभग 50 % आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है।  कृषि निर्यात ₹4.4 लाख करोड़ (≈ 52 बिलियन डॉलर) तक पहुंच चुका है।

      श्री कुलकर्णी ने कहा कि वैश्विक संकट के समय कृषि क्षेत्र भारत के लिए सुरक्षा कवच (Economic Shock Absorber)” की भूमिका निभाता है। जब उद्योग और सेवा क्षेत्र प्रभावित होते हैं, तब कृषि उत्पादन, ग्रामीण मांग और खाद्यान्न उपलब्धता देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखते हैं। साथ ही, कृषि निर्यात विदेशी मुद्रा अर्जन कर आर्थिक संतुलन को मजबूती देता है।

     अपने उद्बोधन में श्री कुलकर्णी ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में टैरिफ वॉर एवं भौतिक युद्धों के चलते भारत पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में भारत को नवयुगीन कृषि के लिए अपने वैदिक ज्ञान की ओर पुनः अग्रसर होना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्राचीन भारत में कृषि वाणिज्य का अभिन्न हिस्सा थी और उस समय गौ कृपा वाणिज्यमजैसी समन्वित प्रणाली प्रचलित थी।

      उन्होंने वर्तमान कृषि व्यवस्था की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला, जिनमें नवयुवकों का खेती से विमुख होना, भूमि की उर्वरता में गिरावट, ऑर्गेनिक कार्बन की कमी तथा खाद्यान्नों के पोषण स्तर में गिरावट शामिल हैं। उन्होंने ग्रीन रिवोल्यूशन से आगे बढ़कर एवरग्रीन रिवोल्यूशन की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया।

       “विकसित भारत 2047” के दृष्टिकोण को साझा करते हुए उन्होंने कृषि को इसकी आधारशिला बताया और कहा कि आने वाले समय में केवल खाद्यान्न उत्पादन ही नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना होगा। उन्होंने कृषि मित्र कृषकएवं गौ कृपा वाणिज्यमको पुनः स्थापित करने पर बल दिया।

     कार्यक्रम में द्वितीय वक्ता के रूप में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डा. जयन्तीलाल भंडारी ने भारत की कृषि यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि 1960 के दशक में जहां भारत को अकाल के कारण खाद्यान्न आयात करना पड़ता था, वहीं आज भारत एक प्रमुख निर्यातक देश बन चुका है। उन्होंने बताया कि 1947 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन लगभग 82 मिलियन टन था, जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर लगभग 357.7 मिलियन टन हो गया है।

      इस अवसर पर राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्री पालीवाल, क्षेत्रीय संगठन मंत्री श्री महेश चौधरी, प्रांत संगठन मंत्री श्री अतुल माहेश्वरी, प्रांत सह संगठन मंत्री श्री दिनेश शर्मा, प्रांत अध्यक्ष श्री लक्ष्मीनारायण पटेल तथा जिला अध्यक्ष श्री राजेन्द्र पाटीदार सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।