स्तन कैंसर: देर से पहचान बन रही जानलेवा

10 में 6 महिलाएं एडवांस स्टेज में पहुंच रहीं अस्पताल

एम्स भोपाल का खुलासा

भोपाल। स्तन कैंसर अब केवल बीमारी नहीं, बल्कि मौन मौत का कारण बनता जा रहा है। वर्ष 2022 में दुनिया भर में इसके 23 लाख नए मामले और 6.7 लाख मौतें दर्ज हुईं। भारत में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां समय पर जांच के अभाव में जीवित रहने की दर लगभग 66 प्रतिशत रह गई है जबकि कई विकसित देशों में स्तन कैंसर से जीवित रहने की दर 90 प्रतिशत से अधिक है। भोपाल के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में किये गए ताजा अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हर 10 में से 6 महिलाएं स्तन कैंसर के स्टेज 3 या 4 में अस्पताल पहुंच रही हैं।

      एम्स भोपाल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, देर से पहचान स्तन कैंसर से होने वाली मौतों की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है। चिकित्सा तकनीक के विस्तार के बावजूद, जागरूकता की कमी, सामाजिक संकोच और भय के चलते महिलाएं शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देती हैं और बीमारी जानलेवा मोड़ पर पहुंच जाती है।

आंकड़े जो डराते हैं

पिछले छह महीनों में एम्स भोपाल में 167 स्तन कैंसर रोगियों पर  किए गए अध्य्यन में ......

  • करीब 60 प्रतिशत महिलाएं स्टेज 3 और 4 में पाई गईं
  • केवल 32 प्रतिशत मामलों में स्टेज 2 में पहचान संभव हुई
  • प्रारंभिक अवस्था, जहां इलाज सबसे कारगर होता है, वहां पहुंच बेहद सीमित रही।

विशेषज्ञों के अनुसार, एडवांस अवस्था में पहुंचने पर इलाज लंबा, खर्चीला और कम प्रभावी हो जाता है, जिससे मृत्यु दर तेजी से बढ़ती है।

भारत क्यों पिछड़ रहा है

     वैश्विक स्तर पर स्तन कैंसर महिलाओं में सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है। 2022 में यह महिलाओं में होने वाले कुल कैंसर मामलों का हर चार में से एक रहा। विकसित देशों में जहां 90 प्रतिशत से अधिक महिलाएं बच जाती हैं, वहीं भारत में यह आंकड़ा 66 प्रतिशत और कुछ देशों में 40 प्रतिशत तक सिमट जाता है। अंतर का कारण स्पष्ट है,  समय पर जांच और इलाज तक पहुंच।

चेतावनी दे रहा भविष्य

     विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए  तो 2030 तक हर साल 27.4 लाख नए मामले और 8.75 लाख मौतें दर्ज हो सकती हैं। वहीं, सही रणनीति अपनाई जाए तो 2040 तक हर वर्ष मृत्यु दर में 2.5 प्रतिशत की कमी लाकर 25 लाख जानें बचाई जा सकती हैं।

लक्षण जिन्हें नजरअंदाज करना घातक

    डॉक्टरों के मुताबिक स्तन या बगल में बिना दर्द की गांठ, स्तन के आकार या त्वचा में बदलाव, निप्पल से स्राव या लगातार दर्द जैसे संकेतों को टालना जान पर भारी पड़ सकता है। यही लापरवाही मरीज को सीधे एडवांस स्टेज तक ले जाती है।

एम्स भोपाल की पहल

    एम्स भोपाल में स्तन कैंसर के लिए समर्पित ऑन्कोलॉजी ओटी, उन्नत जांच सुविधाएं और सर्जिकल, मेडिकल व रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट की बहुविषयक टीम कार्यरत है। यहां 40 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को नियमित स्क्रीनिंग की सलाह दी जा रही है  जबकि उच्च जोखिम वाली महिलाओं के लिए विशेष परामर्श की व्यवस्था है।

विशेषज्ञों की दो टूक

     एम्स भोपाल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के विभागाध्यक्ष एवं परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. विनय कुमार  के अनुसार अधिकांश महिलाएं तब आती हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। शुरुआती पहचान हो जाए तो स्तन कैंसर जानलेवा नहीं रहता।

एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवानन्द कर  का मानना है कि स्तन कैंसर अब केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है। जागरूकता और समय पर इलाज से हर साल लाखों जानें बच सकती हैं।