ग़णतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...... गणतंत्र से गुणतंत्र की ओर................................... विजय मनोहर तिवारी
ग़णतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं......
गणतंत्र से गुणतंत्र की ओर
- विजय मनोहर तिवारी
भारत की स्वाधीनता के संघर्ष का सुफल हमें एक महान गणतंत्र तक तो लाया मगर अब इसके बाद क्या ? किसी भी राष्ट्र के जीवन में कोई लक्ष्य अंतिम लक्ष्य नहीं होता। दासता और संघर्ष की लंबी सदियों के बाद स्वाधीन हुए भारत के गणतंत्र की यात्रा 77 साल बाद अब उस मोड़ पर है, जहाँ से केवल दो दशक बाद ही हम स्वाधीनता के सौ वर्ष मनाने वाले हैं।
हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि भारत की धरती के विनाशकारी बटवारे से हमसे ही अलग हुए दो मुल्क आज किस हाल में हैं, बचे-खुचे हम कहाँ खड़े हैं और आगे कहाँ जाना चाहते हैं?
मध्यप्रदेश की माटी में जन्में आचार्य रजनीश "डेमोक्रेसी' की जगह "मेरिटोक्रेसी' की अवधारणा पर बात करते थे। मुझे लगता है कि आजादी का अमृत महोत्सव मना चुके भारत को अब अपने गणतंत्र को गुणतंत्र की ओर ले जाने के विषय में विचार करना चाहिए। गणतंत्र तो हमें यहाँ तक ले आया है, विश्वगुरू बनने का मार्ग गुणतंत्र से ही होकर जाएगा। एक ऐसा देश, जो अपनी प्रतिभाओं को सम्मानपूर्वक काम करने का पर्यावरण उपलब्ध कराए। प्रतिभाओं का पलायन शिक्षा या रोजगार दोनों दिशाओं में रुके और सबको यहीं अकल्पनीय रूप से एक समान अवसर मिलें।
हम केवल इन्हीं सूचनाओं पर मुग्ध होते न रहें कि भारतीय दिमाग ही माइक्रोसॉफ्ट या गूगल या अमेजन पर राज कर रहे हैं। हम यह सकें कि अब किसी को इन महाकाय कंपनियों में जाने की जरूरत नहीं है बल्कि इनसे लौटकर भारत में ही वह सब करने की जरूरत है, जो वे वहाँ कर रहे हैं। आइए सब कुछ यहीं उपलब्ध है और कहीं कोई बाधा नहीं है।
हम विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाने वालों को भी यहीं रोक सकें और यहीं के उच्च शिक्षा संस्थानों को उस स्तर पर ले जा सकें, जहाँ कोई बाहर जाकर पढ़ने के बारे में दस बार सोचे। ऊपर से नीचे तक मेरिट के आधार पर ही लोग जहाँ चुने जाएँ और जो कमजोर हैं, उन्हें प्रतिस्पर्धा में आने के लिए बराबरी के स्तर पर तैयार किया जाए। शिक्षा, स्वरोजगार और नौकरियों से सारे शॉर्ट कट समाप्त करने का यही समय है। केवल मेरिट ही भारत का मंत्र हो।
सरकारी तंत्र के प्रत्येक स्तर पर, शिक्षा, व्यवसाय, कृषि और उद्योग में हर तरह के भ्रष्टाचार, भेदभाव और भय से मुक्त एक स्वच्छ सामाजिक और आर्थिक पर्यावरण की रचना ही गणतंत्र पर गुणतंत्र की नींव रखेगी। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो यह विकसित भारत के पवित्र उदघोषों के बावजूद हम सबकी सामूहिक विफलता ही होगी। नारों को हकीकत में बदलने के लिए साहसपूर्ण फैसले और उनका निष्ठापूर्वक क्रियान्वयन समयसीमा में होना आवश्यक है। भारत को अंदर-बाहर से डस रही ताकतों को समूल नष्ट करने के लिए हर संभव उपाय, जो कुछ स्तर पर पहली बार होते दिखाई भी दिए हैं।
भारत पिछले एक दशक में जिस गति से आगे जा रहा है, यह विश्वास किया जा सकता है कि एक दिन वह ऐसे क्रांतिकारी कदम अवश्य उठा पाने में सक्षम होगा, जब हम अपने आसपास एक स्वस्थ गुणतंत्र का निर्माण कर रहे होंगे।

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