माता शीतला और श्री हनुमान का फलाधिवास
माता शीतला और श्री हनुमान का फलाधिवास
राज सम्राट नगर में इन दिनों भक्तिमय वातावरण है तथा आसपास की कालोनियों के श्रद्धालु भी श्रीराम कथा का श्रवण कर पुण्य के सहभागी बन रहे हैं। श्रीराम कथा के साथ – साथ ही भूतेश्वर शिव मंदिर में माता शीतला और हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा के पूर्व किये जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के तहत अधिवास की प्रक्रिया श्रद्धा और विधि विधान से की जा रही है। ओरछा धाम से पधारे यज्ञ आचार्य श्री अमित तिवारी और उनके सहयोगी मंत्रोच्चार तथा विधि विधान से अधिवास अनुष्ठान कर रहे हैं। विगत 28 मार्च से शुरू हुए इस अधिवास अनुष्ठान के तहत आज माता शीतला और हनुमान जी की मूर्ति का फलाधिवास किया गया। इस अवसर पर राज सम्राट नगर के बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे जिन्होंने अधिवास की धार्मिक प्रक्रिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ भागीदारी की।

अधिवास के इसी क्रम में बुधवार, 01 अप्रेल को औषधि-सशस्त्रधारा स्नान कराया जाएगा। कल 01 अप्रेल को ही माता शीतला और हनुमान जी की मूर्ति का नगर भ्रमण एवं शयानाधिवास अनुश्ठान सम्पन्न कराया जायेगा । रामकथा और अधिवास अनुष्ठान के मुख्य यजमान द्वय श्री कुशवाह और श्री ठाकुर ने कालोनी के सभी श्रद्धालुओं से इस पुण्य अवसर का लाभ उठाने का अनुरोध किया है।
मूर्ति स्थापना के पहले अधिवास और
संस्कारों की वैज्ञानिक-आध्यात्मिक परम्परा
मंदिरों में हनुमान जी, माता शीतला अथवा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना (प्राण-प्रतिष्ठा) केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से पहले अन्नाधिवास, जलाधिवास, पुष्पाधिवास, फलाधिवास, औषधि-सशस्त्रधारा स्नान तथा शयनाधिवास जैसे संस्कार सम्पन्न किए जाते हैं, मूर्ति को दिव्य चेतना के योग्य बनाने की तैयारी का अभिन्न हिस्सा हैं।
“अधिवास” का शाब्दिक अर्थ है—किसी वस्तु में दिव्य शक्ति का निवास कराना। जब किसी मूर्ति को प्राण-प्रतिष्ठा के लिए तैयार किया जाता है, तब उसे केवल भौतिक रूप से नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा स्तर पर भी शुद्ध और संस्कारित किया जाता है। यह संपूर्ण प्रक्रिया मूर्ति को पंचतत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से जोड़कर उसे एक साधारण पत्थर या धातु की आकृति से उठाकर “देव स्वरूप” में रूपांतरित करने का माध्यम बनती है।
इस क्रम में अन्नाधिवास का विशेष महत्व है। इसमें मूर्ति को चावल, गेहूं जैसे अन्न में स्थापित किया जाता है। भारतीय परंपरा में अन्न को जीवन और पोषण का मूल आधार माना गया है। यह संस्कार मूर्ति में स्थिरता, पोषण और जीवनशक्ति के संचार का प्रतीक है। इसके बाद जलाधिवास किया जाता है, जिसमें मूर्ति को पवित्र जल में रखा जाता है। जल शुद्धि और पवित्रता का प्रतीक है, और इस प्रक्रिया के माध्यम से मूर्ति की बाहरी एवं आंतरिक अशुद्धियों का निवारण किया जाता है।
पुष्पाधिवास के अंतर्गत मूर्ति को सुगंधित और पवित्र फूलों से आच्छादित किया जाता है। फूल भक्ति, सौंदर्य और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक होते हैं। इस संस्कार से मूर्ति में सौम्यता और दिव्य आभा का विकास होता है। इसके पश्चात फलाधिवास सम्पन्न किया जाता है, जिसमें मूर्ति को विभिन्न फलों के मध्य रखा जाता है। फल समृद्धि, पूर्णता और कर्मफल के प्रतीक हैं और इस प्रक्रिया के माध्यम से जीवन में शुभता और सम्पन्नता की कामना की जाती है।
इन अधिवासों के अतिरिक्त औषधि-सशस्त्रधारा स्नान का भी विशेष महत्व है। इसमें जड़ी-बूटियों, गंधद्रव्यों और औषधीय तत्वों से युक्त जल की निरंतर धारा मूर्ति पर प्रवाहित की जाती है। यह केवल बाहरी शुद्धि नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा की शुद्धि और वातावरण के पवित्रीकरण का भी माध्यम है। औषधियाँ आरोग्य, शांति और जीवनशक्ति की प्रतीक हैं, इसलिए इस स्नान के माध्यम से मूर्ति में स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। विशेष रूप से माता शीतला की स्थापना में यह प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि वे रोग-निवारण और आरोग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं।
शयनाधिवास इस संपूर्ण प्रक्रिया का एक अत्यंत भावनात्मक और प्रतीकात्मक चरण है। इसमें मूर्ति को शैया पर विश्राम कराया जाता है। यह दर्शाता है कि देवता को एक सजीव सत्ता के रूप में स्वीकार किया जा रहा है, जिनकी सेवा, विश्राम और सम्मान आवश्यक है। यह संस्कार मूर्ति में सजीवता, संवेदनशीलता और चेतना के भाव को स्थापित करता है।
इन सभी संस्कारों का समग्र उद्देश्य मूर्ति को शुद्ध करना, उसमें ऊर्जा का संचार करना और उसे दिव्य चेतना के लिए पात्र बनाना है। जब यह संपूर्ण प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है, तब प्राण-प्रतिष्ठा का अनुष्ठान किया जाता है, जिसमें मंत्रों और विधिविधान के माध्यम से देवता की चेतना को मूर्ति में स्थापित किया जाता है। इसके पश्चात वह मूर्ति केवल एक प्रतीक नहीं रह जाती, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए सजीव आराध्य का रूप धारण कर लेती है।
अन्नाधिवास, जलाधिवास, पुष्पाधिवास, फलाधिवास, औषधि-सशस्त्रधारा स्नान और शयनाधिवास जैसी प्रक्रियाएँ केवल धार्मिक और परंपरागत अनुष्ठान नहीं, बल्कि अत्यंत गहन आध्यात्मिक विज्ञान का हिस्सा हैं। यही कारण है कि इनके बिना प्राण-प्रतिष्ठा को पूर्ण और प्रभावी नहीं माना जाता। (साभार)

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