(दूसरी किश्त) फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी : नेहरू युग के प्रतिनिधि फ़िल्मकार राज कपूर................. आलेख : जवरीमल्ल पारख
भारतीय सिनेमा के शोमैन के रूप में विख्यात अभिनेता और फिल्म निर्माता राज कपूर ने भारतीय सिनेमा के इतिहास के पन्नों में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। 2024 राज कपूर की जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया गया। राजकपूर की जन्म शताब्दी के अवसर पर इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त श्री जवरीमल्ल पारख ने आलेख फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी : नेहरू युग के प्रतिनिधि फ़िल्मकार राज कपूर ने विस्तार से लिखा है ।
प्रो. पारख ने राज कपूर की उन फ़िल्मों को अपने आलेख में स्थान दिया है जो नेहरू युग के दौरान बनी और प्रदर्शित हुई थीं। इनमें उन फ़िल्मों पर भी विचार किया गया है, जिनका निर्देशन भले ही उन्होंने न किया हो या जिसमें उन्होंने अभिनय भी न किया हो, लेकिन जिनका निर्माण उनकी प्रोडक्शन कंपनी आर.के. फ़िल्म्स ने किया था और जिसके निर्माता वे स्वयं थे। नेहरू युग के बाद के दौर में भी उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण फ़िल्में बनायी हैं, उनमें अभिनय किया है या निर्देशन किया है, लेकिन उन पर उस वैचारिकी का वैसा प्रभाव नहीं है, जो नेहरू युग की फ़िल्मों पर दिखायी देता है। इसलिए 1948 से 1960 के दौरान अभिनीत या निर्माण/निर्देशित की गई फ़िल्मों की समीक्षा दी जा रही है ।
फिल्मों में रूचि रखने वाले पाठकों को निश्चित ही यह आलेख पसंद आएगा । आलेख को किस्तों में जारी किया जा रहा है... ........ आज प्रस्तुत है दूसरी किश्त जिसमें फिल्म आग और बरसात की समीक्षा की गई है ।
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(दूसरी किश्त)
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी :
नेहरू युग के प्रतिनिधि फ़िल्मकार राज कपूर
आलेख : जवरीमल्ल पारख
आग (1948)
हिंदी सिनेमा में राज कपूर की पहचान एक शोमैन के रूप में ज़्यादा है। इसकी वजह उनकी बाद की फ़िल्में हैं, जबकि उनकी आरंभिक फ़िल्मों की पहचान इस रूप में नहीं की जा सकती। आज़ादी हासिल होने के साथ ही राज कपूर की निर्माता और निर्देशक के रूप में केरियर की शुरुआत हो गयी थी। एक निर्माता और निर्देशक के रूप में 'आग' उनकी पहली फ़िल्म थी, जो देश की आज़ादी के एक साल बाद ही प्रदर्शित हो गयी थी। 'आग' प्रेम, आजीविका और कला के त्रिकोण को पेश करने वाली फ़िल्म थी। एक ऐसे युवक की कहानी, जिसके पिता उसे वकील बनाना चाहते हैं और बेटा रंगमंच पर अपने जीवन की सार्थकता खोजना चाहता है। इसी द्वंद को फ़िल्म में साकार करने की कोशिश की गयी है। एक अर्थ में यह एक नयी उभरती पीढ़ी के नये सोच को दर्शाने वाली फ़िल्म भी है। राज कपूर की यह पहली फ़िल्म बहुत कामयाब नहीं हुई, लेकिन भावनाओं की टकराहट के साथ बाहरी और आंतरिक द्वंद की अभिव्यक्ति इस फ़िल्म में भी देखी जा सकती है। इस फ़िल्म में तीन पहले से स्थापित अभिनेत्रियों नरगिस, कामिनी कौशल और निगार सुल्ताना को उन्होंने शामिल किया था। नरगिस बाद में भी राज कपूर की कई अन्य फ़िल्मों की नायिका भी बनी। इस फ़िल्म का संगीत राम गांगुली ने दिया था, जो उनके पिता के पृथ्वी थियेटर्स से जुड़े थे। सरस्वती कुमार दीपक, बहज़ाद लखनवी और मज़रूह सुलतानपुरी ने गीत लिखे थे और कुछ गीत काफी लोकप्रिय भी हुए। बहज़ाद लखनवी का गीत ‘ज़िंदा हूं इस तरह कि ग़मे ज़िंदगी नहीं’, जिसे मुकेश ने गाया था, अब भी लोकप्रिय है। मुकेश बाद में राज कपूर की अपनी आवाज़ बन गये थे। बहज़ाद लखनवी का ही लिखा और शमशाद बेगम का गाया गीत ‘न आंखों में आंसू न होठों पे आहें, मगर एक मुद्दत हुई मुस्कराये’ और उन्हीं का लिखा और शमशाद बेगम का गाया गीत ‘काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे’ — बहज़ाद लखनवी के लिखे ये तीनों गीत काफी लोकप्रिय हुए। 'आग' कामयाब तो नहीं हुई, लेकिन एक निर्देशक के तौर पर उनकी पहचान बनने लगी थी। इस फ़िल्म से यह भी साबित हो गया था कि राज कपूर इतनी कम उम्र में भी कहानी, पटकथा, गीत और संगीत पर काफ़ी ध्यान देते थे। इस फ़िल्म की कहानी और पटकथा इंदरराज आनंद की थी।
बरसात (1949)
'आग' में जिन कलाकारों को राज कपूर ने शामिल किया था, उनमें से बहुतों को अपनी अगली फ़िल्म 'बरसात' में नहीं लिया। संगीतकार राम गांगुली को उन्होंने फिर नहीं दोहराया और उसकी जगह संगीतकारों की एक नयी जोड़ी शंकर-जयकिशन को उन्होंने अवसर दिया। यह जोड़ी लंबे समय तक राज कपूर से जुड़ी रही। इसी तरह गीतकारों में भी उन्होंने शैलेंद्र और हसरत जयपुरी को अपनी टीम में शामिल किया और ये दोनों भी लंबे समय तक राज कपूर के साथ जुड़े रहे। कथा-पटकथा में भी इस फ़िल्म में उन्होंने रामानंद सागर को अवसर दिया। लेकिन उन्हें अपनी अगली फ़िल्मों में वापस नहीं लिया और अगली फ़िल्म 'आवारा' से उन्होंने प्रगतिशील उर्दू लेखक ख्वाज़ा अहमद अब्बास को अपनी टीम में शामिल किया। 'आग' में वी एन रेड्डी सिनेमेटोग्राफर थे, बरसात में जाल मिस्त्री को लिया। लेकिन 'आवारा' में राधु करमाकर छायाकार के रूप में उनकी टीम में शामिल हुए, जो बाद में उनकी कई फ़िल्मों से जुड़े रहे।
'बरसात' के प्रदर्शन के वर्ष यानी 1949 में ही अभिनेता के रूप में राज कपूर की एक और फ़िल्म रिलीज़ हुई थी – महबूब के निर्देशन में 'अंदाज़', जिसमें नरगिस और दिलीप कुमार ने भी काम किया था। ये दोनों फ़िल्में उस साल की काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में थीं। 'बरसात' दरअसल दैहिक और आत्मिक प्रेम के बीच के द्वंद् को केंद्र में रखकर बनायी गयी फ़िल्म है। कहानी के केंद्र में दो चरित्र हैं : प्राण और गोपाल। प्राण की भूमिका राज कपूर ने निभायी थी और गोपाल की भूमिका प्रेमनाथ ने, जिन्होंने 'आग' में भी काम किया था। गोपाल के लिए प्रेम दैहिक आकर्षण और वासना का दूसरा नाम है, जबकि प्राण के लिए प्रेम एक आत्मिक संबंध का नाम है, जिसकी अनुभूति शाश्वत होती है। इस फ़िल्म में नरगिस ने एक देहाती लड़की रेशमा की भूमिका निभायी थी, जिससे प्राण प्यार करता है और नीला की भूमिका निम्मी ने निभायी थी, जिसकी तरफ गोपाल आकृष्ट है। यह निम्मी की पहली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के गीत भी काफी लोकप्रिय हुए। यह शैलेंद्र की भी पहली फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने दो गीत लिखे थे, ‘बरसात में हमसे मिले तुम’ और ‘पतली कमर है’। दोनों गीत काफ़ी लोकप्रिय हुए। फ़िल्म भी काफ़ी लोकप्रिय हुई, लेकिन राज कपूर को एक फ़िल्मकार के रूप में वास्तविक प्रतिष्ठा 'आवारा' से मिली, जो 1951 में रिलीज़ हुई और इस फ़िल्म ने उनको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बना दिया।
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