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श्रमिक दिवस :  शिकागो के श्रमिक शहीदों का पुण्य स्मरण

  • ओंकार कोसे 

विश्व इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो केवल अपने समय को नहीं बदलतीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय, अधिकार और मानव गरिमा का मार्ग प्रशस्त करती हैं। अमेरिका के शिकागो शहर में वर्ष 1886 में घटित हेमार्केट कांडऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसने दुनिया भर के श्रमिक आंदोलनों को नई चेतना दी। आज अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर उन अमर शहीदों को स्मरण करना मानवता के संघर्ष को प्रणाम करने जैसा है।

शोषण के विरुद्ध उठी आवाज

औद्योगिक क्रांति के दौर में शिकागो अमेरिका का बड़ा औद्योगिक केंद्र बन चुका था। कारखानों में मजदूरों से प्रतिदिन 14 से 16 घंटे तक कठिन श्रम कराया जाता था। वेतन बेहद कम था, सुरक्षा के साधनों का अभाव था और बाल श्रम आम बात थी। मजदूरों को इंसान नहीं, मशीन समझा जाता था।

इन्हीं अमानवीय परिस्थितियों के विरोध में श्रमिक संगठनों ने आठ घंटे कार्यदिवस की मांग उठाई। उनका स्पष्ट संदेश था
आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपने जीवन व परिवार के लिए।

1 मई 1886 : संघर्ष की शुरुआत

1 मई 1886 को अमेरिका भर में लगभग साढ़े तीन लाख मजदूर हड़ताल पर उतर आए। अकेले शिकागो में 40 हजार से अधिक श्रमिक सड़कों पर थे। यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन पूंजीपतियों और प्रशासन को यह जनशक्ति असहज कर रही थी।

3 मई : दमन की गोली

3 मई को शिकागो की मैककॉर्मिक मशीन कंपनी के बाहर हड़ताली मजदूरों और काम पर लौटने वालों के बीच तनाव हुआ। पुलिस ने भीड़ पर गोली चला दी, जिसमें दो मजदूर मारे गए। इस घटना ने पूरे शहर में रोष भर दिया।

4 मई : हेमार्केट की त्रासदी

पुलिस अत्याचार के विरोध में 4 मई को हेमार्केट स्क्वायर में सभा बुलाई गई। सभा शांतिपूर्वक समाप्त होने ही वाली थी कि पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने का आदेश दिया। तभी एक अज्ञात व्यक्ति ने पुलिस की ओर बम फेंक दिया। इसके बाद पुलिस ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस हिंसा में सात पुलिसकर्मी और कई नागरिक मारे गए, दर्जनों घायल हुए।

न्याय नहीं, प्रतिशोध हुआ

घटना के बाद आठ श्रमिक नेताओं को बिना ठोस प्रमाण गिरफ्तार किया गया। यह कभी सिद्ध नहीं हुआ कि बम किसने फेंका, फिर भी अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा दिया। 11 नवंबर 1887 को चार नेताओंअल्बर्ट पार्सन्स, अगस्त स्पाइस, एडोल्फ फिशर और जॉर्ज एंगेलको फांसी दे दी गई।

फांसी से पहले अगस्त स्पाइस ने कहा था
एक समय आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से अधिक शक्तिशाली होगी जिन्हें आप आज दबा रहे हैं।

इतिहास ने सिद्ध किया कि उनका यह कथन सत्य था।

शहादत, जिसने दुनिया बदल दी

हेमार्केट के शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। 1889 में दूसरी इंटरनेशनल ने 1 मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस घोषित किया। आगे चलकर दुनिया के अनेक देशों ने आठ घंटे कार्यदिवस, न्यूनतम मजदूरी, श्रमिक सुरक्षा और ट्रेड यूनियन अधिकारों को मान्यता दी।

1893 में इलिनोइस के गवर्नर जॉन पीटर ऑल्टगेल्ड ने स्वीकार किया कि इन नेताओं को निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिली थी और वे न्यायिक अन्याय के शिकार हुए थे।

आज भी उतनी ही प्रासंगिक सीख

आज तकनीक, ठेका प्रथा और अस्थायी रोजगार के युग में श्रमिकों की चुनौतियाँ बदल गई हैं, लेकिन संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। हेमार्केट के शहीद आज भी हमें सिखाते हैं

  • अधिकार मांगने से नहीं, संगठित संघर्ष से मिलते हैं।
  • श्रम का सम्मान हर सभ्य समाज की बुनियाद है।
  • अन्याय चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, सत्य अंततः विजयी होता है।
  • सामाजिक परिवर्तन के लिए पीढ़ियों का धैर्य और समर्पण चाहिए।

भारत के लिए संदेश

भारत जैसे श्रमप्रधान देश में यह स्मरण और भी आवश्यक है कि मजदूर केवल उत्पादन का साधन नहीं, राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। खेत, कारखाने, सड़क, भवन, परिवहन और सेवा क्षेत्रहर जगह श्रमिकों का पसीना विकास की नींव बनता है। यदि श्रमिक सुरक्षित, सम्मानित और संतुष्ट होंगे, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा।

       शिकागो के शहीदों की शहादत केवल चार व्यक्तियों की मृत्यु नहीं थी, बल्कि मानव गरिमा की विजय थी। उन्होंने अपने प्राण देकर दुनिया को सिखाया कि श्रम का सम्मान होना चाहिए और हर व्यक्ति को न्यायपूर्ण जीवन का अधिकार है।

     आज श्रमिक दिवस पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम श्रमिकों को अधिकार, सुरक्षा, सम्मान और बेहतर जीवन देने का संकल्प लें।

“8 घंटे के अधिकार की यह लड़ाई हमें याद दिलाती है कि इतिहास में सबसे बड़े परिवर्तन अक्सर मजदूरों के पसीने और बलिदान से लिखे गए हैं।

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श्री ओंकर कोसे पश्चिम रेलवे के रतलाम मंडल में राजभाषा विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद भोपाल में निवास कर रहे हैं । वे समसामियक विषयों पर निरंतर लेखन कर रहे हैं।