76 वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई… शुभकामनाएं....... विशेष आलेख... क्या संविधान देश की सामाजिक चुनौतियों का समाधान करने में असफल रहा है ? ओंकार कोसे
76 वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई… शुभकामनाएं.......
विशेष आलेख...
क्या संविधान देश की सामाजिक चुनौतियों का
समाधान करने में असफल रहा है ?
- ओंकार कोसे
आजाद भारत में अक्सर संविधान को लेकर यह विमर्श चलते रहता है कि क्या संविधान देश की सामाजिक चुनौतियों को पूरा करने में सफल रहा है या नहीं है? कई विद्वान यह मानते हैं कि भारत के संविधान ने संविधान निर्माताओं के जो मूल लक्ष्य थे, उस लक्ष्य को हासिल करने में सफलता हासिल की है। देश की एकता और अखंडता बनाए रखने में संविधान का बहुत बड़ा योगदान है। देश में जो अभूतपूर्व प्रगति हुई है उसमें संविधान का ही योगदान है परंतु कुछ लोग ऐसा मानते हैं की संविधान अपने मूल लक्ष्य को हासिल करने में सफल नहीं रहा है । भी एक विडंबना ही है, हालांकि इसमें सच्चाई नहीं है। यह सब जानते हैं । भारतीय संविधान ने देश की सामाजिक संरचना में कई सकारात्मक बदलाव लाए हैं और कई सामाजिक समस्याओं का समाधान ढूंढने का मार्ग प्रशस्त किया है।
आईए... समझने का प्रयास करते हैं कि संविधान ने हमें क्या-क्या दिया है:
समानता का सिद्धांत: संविधान ने सभी नागरिकों के लिए समानता का सिद्धांत स्थापित किया है, जिसने जाति, धर्म, लिंग और अन्य आधारों पर भेदभाव को कम करने में मदद की है।
मौलिक अधिकार: संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों ने लोगों को समानता, स्वतंत्रता और न्याय प्राप्त करने में सक्षम बनाया है।
राज्य के नीति निर्देशक तत्व: संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्व शामिल हैं, जिनका उद्देश्य सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।
सामाजिक न्याय: संविधान में सामाजिक न्याय और समानता को सुनिश्चित करने के लिए कई प्रावधान किए।
अल्पसंख्यकों के अधिकार: अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी संविधान में प्रावधान किए है।
धर्मनिरपेक्षता: भारत संविधान के तहत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म में आस्था और विश्वास रखने या न रखने की पूरी स्वतंत्रता है।
भारत का संविधान दुनिया के सबसे लंबे लिखित संविधानों में से एक है जिसके कारण इसके प्रावधानों को लागू करने में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती जा सकती है।
लोकतंत्र के तीन स्तंभ: विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं। इनके बीच में शक्तियों का पृथक्करण, संतुलन और स्वायत्तता की व्यवस्था है जो देश के कुशल संचालन में सहायक है ।
इसे बनाने में बहुत मेहनत और सोच-विचार किया गया था इसलिए यह एक सफल लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में दुनिया के समक्ष सशक्त रूप से खड़ा है।
लोकतंत्र की स्थापना: भारत ने एक सफल लोकतंत्र के रूप में विकसित हुआ है। यहां नियमित चुनाव होते हैं और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी होता रहा है।
विविधता में एकता: भारत एक बहुत ही विविधताओं वाला देश है, फिर भी संविधान ने सभी को एक सूत्र में बांधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
चंहुमुखी विकास: भारत ने आजादी के बाद सभी क्षेत्रों में चंहुमुखी विकास किया है जिसकी मिसाल दुनिया में नहीं है। भारत के साथ आजाद हुए कई देश विखंडित हो गए, कई देशों में तानाशाही आ गई और कई देश गरीबी के गर्त में समा गए। अराजकता के माहौल में आज भी जी रहे हैं। उसकी तुलना में भारत एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में उभरा है। विज्ञान और तकनीकी के साथ - साथ सेवा, व्यापार, पर्यटन आदि के क्षेत्रों में भी भारत ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। यह सब एक उत्कृष्ट संविधान की देन ही कही जा सकती है।
भारत का संविधान निश्चित रूप से एक सफल व सजीव दस्तावेज है। इसने भारत को एक सफल लोकतांत्रिक देश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन अभी भी कई चुनौतियाँ हैं जिनका सामना करना बाकी है। ऐसा सभी लोकतांत्रिक और गैर लोकतांत्रिक देशों के साथ होता है।
देश के समक्ष सामाजिक चुनौतियां:
सामाजिक असमानता: भारत में अभी भी सामाजिक असमानता की समस्या व्याप्त है। जातिवाद, लिंग भेदभाव और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं परंतु निश्चित रूप से आजादी के पहले की तुलना में इसमें बहुत सुधार हुआ है । अन्य देशों की तुलना में भी हमारे देश की स्थिति बहुत अच्छी है।
गरीबी: भारत में गरीबी की समस्या एक बड़ी चुनौती है परंतु देश अब विकासशील देशों की श्रेणी से निकलकर विकसित देशों की श्रेणी में आने की स्थिति में है। आज भारत विश्व की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था में शामिल हो चुका है और कुछ ही वर्षों में यह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिश अमेन आगे बढ़ रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना अभी भी एक चुनौती जरूर है लेकिन गरीब और विकासशील देशों की तुलना में हमारे देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। कई देशों से विद्यार्थी हमारे देश में पढ़ने आते हैं और हमारे आधुनिक चिकित्सालयों में किफायती और अच्छा इलाज करवाने के लिए विकसित देशों के मरीज भी आते हैं। हमारी शिक्षा और स्वास्थ्य की संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर की बन चुकी है।
संविधान एक दस्तावेज है और केवल इसके द्वारा समाज में बदलाव लाना संभव नहीं है। संविधान को लागू करने और सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए सरकारों, नागरिक समाज और लोगों के सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता होती है।
संविधान की सफलता के लिए लोगों को अपने संविधानिक अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक होना चाहिए।
राजनेताओं को संविधान का ईमानदारी से पालन करना चाहिए और देश के हित में काम करना चाहिए।
न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए।
समाज में संविधान के प्रति जागरूकता लाकर ही हम संविधान के आदर्शों को साकार कर सकते हैं।
भारत का संविधान एक जीवित दस्तावेज है और समय के साथ - साथ इसमें संशोधन होते रहे है और होते रहेंगे। लेकिन यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम इस संविधान को उसके मूल स्वरूप में मजबूत बनाए रखें और इसके आदर्शों को पूरा करने के लिए मिलकर काम करें।
संविधान निर्माण के पश्चात संविधान की सफलता और असफलता के बारे में डॉक्टर आंबेडकर ने कहा था कि - “एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने और करवाने वाले लोग अच्छे हों। संविधान की प्रभावशीलता पूरी तरह उसकी प्रकृति पर निर्भर नहीं है। संविधान केवल राज्य के अंगों – जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – का प्रावधान कर सकता है। राज्य के इन अंगों का संचालन जिन तत्वों पर निर्भर है, वे हैं जनता और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के साधन के रूप में उनके द्वारा गठित राजनीतिक दल।”
इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि संविधान देश की सामाजिक चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने में पूरी तरह से सफल रहा है, असफल रहने की कोई वजह हमें नजर नहीं आती है।
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-ओंकार कोसे
सेवानिवृत्त वरिष्ठ अनुवादक, राजकोट मंडल( पश्चिम रेलवे)

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