आलेख.......

 

नए भाजपा अध्यक्ष के सामने

सतह पर चुनौती नहीं, अंदर खलबली

 

  •  श्याम यादव
  •  

    भाजपा को अपना नया अध्यक्ष मिल गया। इसके साथ ही प्रदेश की राजनीति में एक इलाके की दखलअंदाजी शुरू हो गई। कहने को तो आने वाले तीन साल तक भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष को न तो विधानसभा चुनाव का सामना करना पड़ेगा और न लोकसभा चुनाव की कोई चिंता रहेगी। वे बेफिक्र होकर पार्टी को मजबूती प्रदान करते रहेंगे। इसका यह आशय यह नहीं लगाया जा सकता कि उनका तीन साल का कार्यकाल आसानी से कट जाएगा।

 

 

      हेमंत खंडेलवाल को आने वाले समय में कई ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जो अनसोची होगी। उन्हें पार्टी के भीतर और  पार्टी  के साथ सरकार का सामंजस्य बैठाने की चुनौती से रूबरू होना पड़ेगा। यही उनकी सफलता की कसौटी होगी।

      प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद पर हेमंत खंडेलवाल की नियुक्ति से भाजपा के कई दावेदार अचंभित हुए हों, ऐसा नहीं हुआ। भाजपा ने इस बार कोई चौंकाने वाला कदम नहीं उठाया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पसंद के अनुरूप ही हेमंत खंडेलवाल का चयन हुआ। लेकिन, इसमें हेमंत खंडेलवाल की राष्ट्रीय स्वयं सेवक की पृष्ठभूमि ज्यादा कारगर रही। कुल मिलाकर डॉ. मोहन यादव की तरह ही आर.एस.एस. ने अपने  नर्सरी से निकले एक और पौधे को राजनीति में वृक्ष के रूप में स्थापित कर दिया। 

      चूंकि राज्य विधान सभा के  चुनाव 2028 में होंगे और लोकसभा के 2029 में यानी  भाजपा के अध्यक्ष के अपने कार्यकाल में हेमंत खंडेलवाल के सामने कोई बड़ी चुनावी चुनौती नहीं होगी। लेकिन, पार्टी में आंतरिक  संगठन को एकजुट रखने के साथ पार्टी के आदिवासी वोट बैंक को संभाले रखने की चुनौती भी सामने होगी। आदिवासी वोटों पर कांग्रेस की नजर अभी से है और वह इन्हें अपनी ओर खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। छोटी - छोटी घटनाओं को पूरे आदिवासी वर्ग की नाराज़गी बताकर सरकार  को घेरने की कोशिश करती रहेगी। 

     पार्टी और सरकार से  अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति, जन जाति और मुस्लिम वर्ग की भी अपेक्षाएं होगी जो उनके सामने होंगी। इन सबके अलावा असल चुनौती तो भाजपा की ही होगी। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ और बाद में कांग्रेस से कई बड़े-छोटे नेताओ ने भाजपा का दमन थामा था। इनमें से कुछ तो पार्टी में घुल-मिल गए, कई मंत्री पद पर भी है। लेकिन, कुछ तो अभी भी अलग-थलग हैं। कोई पद नहीं मिलने पर वे उलझन में हैं। भाजपाई भी असहज है, क्योंकि, वे इन्हें नेता के रूप में स्वीकार नहीं हैं। क्योंकि, इन नेताओं के भाजपा में आने से  भाजपा के अनेक वर्षों से जुड़े नेताओ की दावेदारी खत्म होती दिखाई देने लगी। ऐसे में पुराने नेताओं को साथ लेकर चलना और कांग्रेस से आए नेताओं को भी जोड़कर रखना चुनौती होगी।

     इसके अलावा  शिवराज सिंह चौहान के समय निगम, मंडल और बोर्डों में की गई नियुक्ति को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भंग कर दिया था। अभी भी निगम, मंडल और बोर्डों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष नहीं हैं। इन पदों पर नियुक्तियों में नेताओं को समायोजित करना भी चुनौती होगी। जिन नेताओं की दावेदारी विधानसभा में थी, उन्हें टिकिट नहीं मिलने से वे भी इन पदों के लिए दावेदार होंगे।

......................000......................

  Shyam Yadav .jpg

वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम यादव लम्बे समय तक भारत संचार निगम लिमिटेड,  इंदौर में जन सम्पर्क अधिकारी का दायित्व निभाते रहे हैं। सेवानिवृत्त होने के पश्चात वे राजनीति और समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। साहित्यानुरागी श्री यादव कहानी और  व्यंग्य लेखन में भी सिद्धस्त हैं।  

न्यूज़ सोर्स : श्याम यादव