उज्जैन में जन औषधि केंद्र पर मिलने वाली

सस्ती दवा अब सिस्टमकी बीमारियों की शिकार

उज्जैन ..(विशेष प्रतिनिधि) ।   राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) की सरकार ने विशेषकर गरीबों को इलाज के दौरान सस्ती दवाईयां उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों की शुरूआत की थी जिसका बड़ी संख्या में मरीज लाभ उठा रहे हैंलेकिन जब गरीबों को दी जाने वाली  राहत ही फाइलों में उलझ जाए, तो गरीब क्या करें और कहां गुहार लगाएं ?" कुछ ऐसा ही उज्जैन में हो रहा है। उज्जैन के चरक अस्पताल में भारत सरकार की बहुप्रचारित प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजनाका केंद्र डेढ़ महीने से बंद पड़ा है। यह वही केंद्र है, जहां 50 से 90 प्रतिशत तक सस्ती दवाएं मिलती थीं। पर अब यहां ताले लटके हैं  और मरीज... निजी मेडिकल स्टोर के बाहर लाइन में खड़े दिखाई देते हैं।

   जब जन औषधि केंद्र बंद होने की वजह पूछो तो जवाब मिलता है  "फाइल कलेक्टर साहब के पास है।"  इस देश में जब कोई फाइल कलेक्टर की टेबल पर पहुंचती है, तो समझिए वह टेबल नहीं, हिमालय की चोटी बन जाती है, जहां पहुंचने में गरीब की सांसें चढ़ जाती है।

गरीबों की उम्मीदों पर लगा प्रशासनिक ताला

    उज्जैन के चरक अस्पताल का यह जन औषधि केंद्र उज्जैन की बड़ी जनसंख्या के लिए संजीवनी जैसा था। बीपी, शुगर, टीबी, हृदय रोग, किडनी संबंधी दवाओं से लेकर जरूरी एंटीबायोटिक्स तक यहां रियायती कीमत में उपलब्ध थीं। लेकिन डेढ़ महीने से मरीज यहां रोज आते हैं, ताले देखकर लौट जाते हैं। कोई 20 रुपये की गोली लेने आता है, तो बाजार में वही दवा 120 की मिलती है।

गरीब क्या करे बीमारी से लड़े या महंगाई से?

चरक अस्पताल का यह केंद्र रेड क्रॉस सोसाइटी द्वारा संचालित होता है, और सोसाइटी के अध्यक्ष हैं स्वयं जिला कलेक्टर। केंद्र बंद है क्योंकि उसकी फाइल निर्णय के लिए कलेक्टर के पास भेजी गई है। परंतु निर्णय कब होगा यह ना मरीज को पता है, ना अस्पताल प्रबंधन को।

ना कोई तिथि, ना कोई समय सीमा बस प्रतीक्षा और पीड़ा।

 

नीतियों में "जन", पर ज़मीन पर "जनहित" कहां?

    जन औषधि केंद्र बंद होने का सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जो ₹500 पेंशन में ₹300 की दवा नहीं खरीद सकते, वे सरकारी अस्पताल में इलाज तो पा लेते हैं, लेकिन बाजार से दवा नहीं खरीद पाते। मरीज रोजाना अपनी बीमारी को, सिस्टम के इंतज़ार से ज्यादा झेल रहे हैं। योजना का नाम "जन औषधि" है, लेकिन फिलहाल "जन" औषधि के बिना तड़प रहा है।

दवा नहीं है, पर सरकारी तर्क पर्याप्त हैं

 बीमार जनता पूछ रही है:  “बीमारी का इलाज पहले हो या फाइल का?”  क्या सिस्टम का जवाबदारी से कोई रिश्ता नहीं बचा है?

क्या किसी योजना का क्रियान्वयन किसी एक अधिकारी की मेज पर टिका रहेगा? क्या गरीब की दवा, केवल उद्घाटन और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह जाएगी?

क्योंकि सच्चाई ये है कि

"जब तक फाइल चलेगी, तब तक दवा नहीं मिलेगी

और जब दवा मिलनी शुरू होगी, तब तक मरीज ही ना बचे, तो क्या होगा?" सरकार, प्रशासन और ज़िम्मेदार अधिकारी से अपील है जन औषधि केंद्र को जल्द से जल्द पुनः प्रारंभ किया जाए। क्योंकि सस्ती दवा सिर्फ सुविधा नहीं, गरीब बीमारों की ज़रूरत है।