सुपर लीग में इंदौर:

पुरस्कार या रणनीतिक परित्याग?

  • सीए (डॉ.)गौतम कोठारी

इंदौर,  एक ऐसा नाम जो पिछले सात वर्षों से स्वच्छता की पहचान बन चुका है। न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे भारत को यह गर्व था कि भारत का सबसे स्वच्छ शहरकोई महानगर नहीं, बल्कि मध्यभारत का यह अनुशासित, नागरिक-जागरूक नगर इंदौर है।

लेकिन हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा घोषित सुपर लीगकी अवधारणा ने यह गौरव एक नए प्रश्न के घेरे में दिया है।

 

सरकारी परिभाषा कहती है:

सुपर लीगवे शहर हैं जिन्होंने वर्षों तक श्रेष्ठता बनाए रखी है, अब उन्हें मार्गदर्शक की भूमिका में रखा जाएगा।

 

सुनने में यह सम्मानजनक निर्णय लगता है। लेकिन इसकी गहराई में झाँकने पर जो तथ्य उभरते हैं, वे कहीं अधिक रणनीतिक और संदिग्ध प्रतीत होते हैं।

 

रैंकिंग से बाहर, पुरस्कारों से वंचित?

इंदौर अब स्वच्छता रैंकिंग की दौड़ से बाहर है। इसका मतलब यह हुआ कि वह अब न तो भारत का नंबर 1 शहरकहलाएगा, न ही उस रैंक के साथ मिलने वाली प्रशंसा राशि, केंद्रीय अनुदान या CSR प्राथमिकता का पात्र रहेगा।

यह निर्णय एक प्रतीकात्मक सम्मानकी तरह प्रस्तुत किया गया है, जबकि वास्तव में इसे प्रशासनिक परित्याग भी कहा जा सकता है।

 

नीति या नियति?

इसे दो तरह से देखा जा सकता है:

 1. सरकार की दृष्टि से:

    इंदौर जैसे शहर अब इतने सक्षम हो चुके हैं कि उन्हें रैंकिंग की प्रतिस्पर्धा में बनाए रखना व्यर्थ है। वे अब मॉडल बनकर दूसरे शहरों को मार्गदर्शन देंगे।

 2. जनदृष्टि से:

    क्या यह श्रेष्ठ को हाशिए पर डालने की एक चतुर रणनीति नहीं है?

क्या यह उस शहर को मंच से नीचे उतारने का प्रयास नहीं, जिसने बार-बार अपने सामर्थ्य से सबको चौंकाया है?

 

इसे सम्मान के आवरण में छुपी नीतिगत दूरीभी कहा जा सकता है।

 

राजनीतिक दृष्टि से पढ़ें तो

 • जब केंद्र से मिलने वाली पहचान, पुरस्कार और प्राथमिकता हटाई जाती है, तो प्रशासनिक बोझ राज्य और स्थानीय निकायों पर शिफ्ट हो जाता है।

 • इससे श्रेय और प्रभाव की दिशा भी बदलती है संभवतः केंद्र सरकार यही चाहती हो?

 

इंदौर को चुप नहीं रहना चाहिए

स्वच्छता सिर्फ़ रैंकिंग नहीं, एक जन-आन्दोलन है जिसमें इंदौर की जनता, निगम और स्वयंसेवी संस्थाएँ वर्षों से दिन-रात जुटी हैं।

 

उन्हें यह जानने और पूछने का अधिकार है:

 • सुपर लीग में शामिल करने से क्या इंदौर को अतिरिक्त संसाधन, नीति समर्थन या प्रोत्साहन मिलेगा?

 • अगर नहीं, तो क्या यह एक सजावटी उपाधि देकर इंदौर को स्वच्छता अभियान की राजनीतिक पंक्ति से बाहर कर देना नहीं है?

सुपर लीगकी अवधारणा, यदि पारदर्शी और संसाधनयुक्त न हो, तो यह एक प्रशासनिक श्रेय हरण जैसा प्रतीत होता है।

इंदौर को उसके प्रदर्शन के लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि सतत सहयोग और सम्मान मिलना चाहिए।

सम्मान वही सच्चा है, जो दायित्वों के साथ संसाधन भी दे। वरना वह सम्मान नहीं, “सामर्थ्य का निष्कासनहै।

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डा. गौतम कोठारी इंडोर के प्रतिष्ठित जागरूक नागरिक हैं और इंदौर के विकास से जुड़े प्रत्येक कार्य में वे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। पेशे से सी.ए. हैं, साथ ही मध्यप्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष भी हैं। वे जन सरोकार से सम्बंधित विषयों पर नियमित लेखन कर रहे हैं। इसके अलावा उनकी पहचान एक नीति विश्लेषक के रूप में भी है।

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न्यूज़ सोर्स : डा. संतोष पाटीदार , इंदौर