नई दिल्ली: वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारतीय रुपये पर दबाव जारी, साल के अंत तक 95 के स्तर पर रहने का अनुमान

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में छाई अस्थिरता का सीधा असर भारतीय मुद्रा पर पड़ता दिखाई दे रहा है। फिच समूह की प्रमुख कंपनी बीएमआई की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95 रुपये के दायरे में स्थिर रह सकता है। वर्तमान में रुपया 95.20 के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा है, जो इसकी कमजोरी को दर्शाता है। विशेष रूप से मार्च और अप्रैल के दौरान भारतीय मुद्रा के मूल्य में चार प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष और ऊर्जा कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव माना जा रहा है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए वैश्विक संघर्षों का असर रुपये की मजबूती पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप और गिरावट को नियंत्रित करने की रणनीति

यद्यपि रुपये पर दबाव बना हुआ है, लेकिन बीएमआई की रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि भारतीय रिजर्व बैंक इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएगा। बाजार के जानकारों का मानना है कि विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही मुनाफे की निकासी और पूंजी के बहिर्वाह को रोकने के लिए केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। हालांकि पिछले 12 महीनों में रुपये में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो साल 2022 के दौर की याद दिलाती है, लेकिन वर्तमान में रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। यह भंडार करीब सात महीने के आयात खर्च को कवर करने में सक्षम है, जिसका उपयोग आने वाले समय में बाजार की घबराहट को कम करने और रुपये की विनिमय दर को स्थिर रखने के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

ऊर्जा आयात और खाड़ी देशों से आने वाले धन पर संकट के बादल

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा आयात पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, क्योंकि कुल आयात का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा केवल ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा है। रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि खाड़ी देशों में युद्ध की स्थिति लंबी खिंचती है, तो वहां काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन यानी रेमिटेंस में भी बड़ी कमी आ सकती है। भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से ही आता है, जो देश की जीडीपी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि वहां रहने वाले भारतीयों की आय प्रभावित होती है, तो इससे भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, जिससे रुपये की स्थिति और अधिक नाजुक होने की संभावना बनी रहेगी।

जीडीपी वृद्धि के सकारात्मक अनुमान और विदेशी निवेशकों का रुख

आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारत की विकास दर को लेकर सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रह सकती है, जबकि महंगाई दर के 3.4 प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना है। हालांकि, वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशकों के बीच 'जोखिम से बचने' की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिसके चलते मार्च 2026 में भारत से 13.4 अरब डॉलर की भारी पूंजी निकासी देखी गई। यह महामारी के बाद का सबसे बड़ा मासिक आउटफ्लो है, जो यह दर्शाता है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा फिलहाल डगमगाया हुआ है। आने वाले महीनों में भारतीय बाजार की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक राजनीति किस दिशा में मुड़ती है और घरेलू स्तर पर रिजर्व बैंक इन बाहरी झटकों से निपटने के लिए क्या कदम उठाता है।