भारत के प्रतिष्ठित माखनलाल पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरू श्री विजय मनोहर तिवारी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा.... मीडिया के विद्यार्थियों को सबसे जरूरी है कि वे अपने भविष्य की तैयारी के साथ-साथ भारत के अतीत में भी ताकझाँक करें। देखें कि किन थपेड़ों से होकर 1947 में आकर दो टुकड़ों में तोड़े गए इस देश की नियति क्या है? भारत के हिस्से में थोपी गई अकथनीय पीड़ाओं का संज्ञान, क्योंकि तभी आप यह समझ पाएंगे कि यह देश आपसे-हमसे क्या अपेक्षा करता है? आप भी पढ़िए.. सम्बोधन के मुख्य अंश

 

वो विद्यार्थी मैं ही हूँ

 

  • विजय मनोहर तिवारी 

      विश्वविद्यालयों की भूमिका हमारे जीवन में कितनी है? एक डिग्री से अधिक कहाँ है? एक डिग्री का मोल भी कितना है? एक नौकरी के द्वार तक छोड़ने वाला गेट पास है वह। उससे ज्यादा नहीं। मगर क्या मीडिया के कोर्सों में आना केवल इस उद्देश्य के लिए है? पत्रकारिता विश्वविद्यालय की भूमिका केवल डिग्री देने तक सीमित नहीं है। यहाँ 360 डिग्री पर दुनिया को देखने की दृष्टि मिलती है। इसीलिए यह दूसरे विश्वविद्यालयों से विशिष्ट है।

    आप हर दिन जो भी करते हैं, लिखते हैं, बोलते हैं। ऐसे हर क्रियाकलाप ही धीरे-धीरे हमारा निर्माण करते हैं। इसलिए कुछ भी करने, बोलने या लिखने के पहले दस बार सोचें। अपने माता-पिता का चेहरा याद रखें। वे क्या सोचते होंगे आपके बारे में? वे अपने गाँव-कस्बों में किस विश्वास से भरे होंगे। हर दिन ऐसा बीते कि उनका विश्वास खंडित न होने पाए।

    यह पत्रकारिता विश्वविद्यालय है। यहाँ हमारा आचरण इसकी विशिष्टता के अनुरूप मर्यादित हो। यहाँ इमारतों के नाम तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला यूँ ही नहीं रखे गए होंगे। तक्षशिला नष्ट नहीं हुआ, यही है, चाणक्य भी यहीं हैं। अपने भीतर के चंद्रगुप्त की खोज करने का यह समय है। नालंदा कहीं बख्तियार खिलजी ने जला दिया होगा। लेकिन नालंदा यहाँ जीवंत है, जहाँ 45 हजार पुस्तकें आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं। विक्रमशिला भी यहीं है। अपने अतीत के वैभव को याद कीजिए और अपना वर्तमान गढ़िए ताकि भविष्य मजबूत हो। अगले 20 साल हम सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। यही वह समय है जब आपके कॅरिअर उड़ान भर रहे होंगे और 2047 में भारत अपनी स्वाधीनता के सौ साल मनाएगा। यह भारत के पुननिर्माण का समय है। 

     हमारी उस सौभाग्यवान पीढ़ी के लिए जो स्वाधीनता के बाद पैदा हुई, 15 अगस्त 1947 का अर्थ क्या है? आज की युवा पीढ़ी इस दिन से क्या समझती है, क्या हुआ था उस दिन और उसके क्या अर्थ हैं? गहरे अंधकार को भीतर उतारे बिना प्रकाश की एक मामूली किरण का मूल्य कोई क्या समझेगा? वह उसे यूँ ही मिल गया, मुफ्त का माल है। इसलिए मैं कहता हूँ कि भारत के हजार-बारह सौ वर्ष के पीड़ादायी इतिहास को जाने-पढ़े बिना भारत की आजादी के अर्थ को समझना असंभव है। फिर वह एक तारीख है, जिस दिन भारत आजाद हो गया था। अंग्रेज चले गए थे। कुर्सियाँ दे गए थे।

     मीडिया के विद्यार्थियों को सबसे जरूरी है कि वे अपने भविष्य की तैयारी के साथ-साथ भारत के अतीत में भी ताकझाँक करें। देखें कि किन थपेड़ों से होकर 1947 तक आकर दो टुकड़ों में तोड़े गए इस देश की नियति क्या है? यूँ तो मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ और प्रबंधन सबके विद्यार्थियों को अपना इतिहास ठीक से पता होना चाहिए लेकिन मीडिया वालों  के लिए यह अनिवार्य रूप से ज्ञात होना चाहिए। भारत की अकथनीय पीड़ाओं का संज्ञान। क्योंकि तभी आप यह समझ पाएंगे कि यह देश आपसे-हमसे क्या अपेक्षा करता है?

     विश्वविद्यालयों में हम हमेशा के लिए रहने नहीं आते। धरती पर हम केवल भोजन करने भी नहीं आते। इसलिए पढ़ाई के दौरान हॉस्टल में कभी खानपान में कोई कमी या खामी दिखे भी तो उसे बड़ा मुद्दा न बनाओ। सहयोग करो। यह हमेशा ध्यान रखो कि हम यहाँ किसलिए आए हैं? हमारे मूल उद्देश्य क्या हैं? यह भी ध्यान रहे कि आपके  पूजनीय माता-पिता की आपसे आशाएँ बंधी हैं। 

    आप उस अर्थ में परम स्वतंत्र नहीं हैं कि कुछ भी करें। उस महापुरुष का भी स्मरण रखें जिनके नाम से यह विश्वविद्यालय है। दादा माखनलाल चतुर्वेदी के बारे में पढ़ें। उनका परिचय प्राप्त करें। उनके संचित पुण्य हैं कि आज देश में मीडिया का यह सबसे बड़ा विश्वविद्यालय अपनी गौरवशाली यात्रा के 35 साल पूरे कर रहा है।

      बीस राज्यों के दो हजार विद्यार्थियों और चार परिसरों तक ही यह सीमित नहीं है। इसका विस्तार उन डेढ़ हजार अध्ययन संस्थानों तक है, जिन्होंने इस प्रदेश को कम्प्यूटर साक्षर बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। इसका अभी मूल्यांकन होना बाकी है। एक लाख विद्यार्थी हर साल परीक्षा देते हैं। विश्वविद्यालय का यह नेटवर्क इस वटवृक्ष की बहुत गहरी जड़ों जैसा है। मीडिया को 35 वर्षों के योगदान के बारे में सब जानते हैं लेकिन इन अध्ययन केंद्रों के योगदान को भी रेखांकित किया जाना जरूरी है। वे विश्वविद्यालय के बड़े परिवार का ही हिस्सा हैं।

 

     अंत में एक जरूरी किस्सा। दूर गाँव से एक दिन एक विद्यार्थी एक विश्वविद्यालय में पढ़ने आया। इस आशा में कि होस्टल में रूम मिल जाएगा और दो-चार सौ रुपए की स्कॉलरशिप। कमरे की उम्मीद में वह टिका। एक दिन उसका सामान उठाकर बाहर रख दिया गया। उसे होस्टल नहीं मिला था। 

 

     एक अनजान शहर में वह मायूस और उदास बाहर खड़ा था। विश्वविद्यालय शहर के बाहर था। दो किलोमीटर दूर मिनी बसों का स्टॉप था। सड़क तक नहीं थी। वह अपना सामान उठाकर चुपचाप कहीं चला गया। साल भर बाद जब परीक्षा का परिणाम आया तो उसने अपना बैच टॉप किया। कई वर्ष बीत गए। एक दिन वह अपना झोला उठाए विश्वविद्यालय की ओर आता हुआ दिखाई दिया। अब की बार उसे विश्वविद्यालय में कुलगुरू बना दिया गया था। 

मेरे प्रिय विद्यार्थी मित्रो, वह विद्यार्थी मैं ही हूँ

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विजय मनोहर तिवारी, कुलगुरू, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल