नज़रिया ……… तेल बचाने की कवायद .......................आलेख.............. अरुण कुमार जैन
नज़रिया ………
तेल बचाने की कवायद
- अरुण कुमार जैन
हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी की अपनी एक अलग अर्थव्यवस्था की समझ है जिसे आमतौर पर देश दुनिया में मोदीनोमिक्स के नाम से जाना जाता है। कुछ आम आदमी का नजरिया, कुछ उनके अपने चाय वाले दिन के अनुभव, कुछ उनका देश दुनिया में घूमने का अनुभव, कुछ उनकी बारीक नजर और सबसे अलग समस्या का समाधान निकालने की क्षमता। करेला और नीम चढ़ा, गुजराती दिमाग हर जगह धंधा खोज लेता है और यही बात उन्हें आपदा में अवसर भुनाने की कला में माहिर कर देती है। दिल्ली फतह करने वाले हमारे प्रधानमंत्रियों में हर किसी की अपनी समझ और सूझ बूझ रही है, किसी को अवसर मिला, किसी ने अवसर गंवा दिया, किसी ने व्यावहारिक दृष्टिकोण रखा और कुछ परम्परागत तरीके अपनाते रहे। सही समय पर सही फैसला लेने वाला ही खिलाड़ी होता है और जो आने वाले समय की आहट पहचान लेता है, वही दूरदृष्टि वाला और भी कहें तो विजनरी नेता होता है।
विश्व के अशांति के इस दौर में जब अलग - अलग हिस्सों में युद्ध चल रहे हों और एक नए प्रकार के संकट से विश्व अचानक रुबरु हो रहा है। हमने कोविद का संक्रमण काल भी देखा, तड़पते और असमय मरते हुए लोगों को देखा, अघोषित कर्फ्यू देखा, एक नई दुनिया की नई परेशानी से आमना सामना हुआ। हम तब भी जीत गए और आज जब पेट्रो संकट से अधिकांश देश परेशान हैं, दुनिया के 90 से अधिक देशों की अर्थव्यवस्था, परिवहन और काम काज प्रभावित हो रहा है। दुनिया आर्थिक मंदी की आहट से परेशान है, तब हमारा देश भी अछूता नहीं रह सकता। विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडराते गहराते दिखाई दे रहे हैं। निश्चित रूप से हमारी आर्थिकी इस संकट से पहले साढ़े सात प्रतिशत से अधिक की आस रखे हुए थी, मगर अब इसका अनुमान साढ़े छह प्रतिशत से कम होने का अनुमान है। यद्यपि हमारा देश एक अद्भुत देश है जो पूरी तरह ऑटोमाइज नहीं है। हमारी व्यवस्था आज भी जेट गति के साथ बैलगाड़ी और जुगाड से चलने वाली व्यवस्था है। हमारी जनसंख्या की एक विशेष आदत है कि हम बहुत जल्द अपने आपको परिस्थिति के अनुसार ढाल लेते हैं। हम एयरकंडीशन कार में भी चलना जानते हैं और धूल भरी लू लपट वाली गर्मी में भी चार किलोमीटर पैदल या साइकिल से जा सकते हैं और यही विशेषता हमें, हमारी संस्कृति को, हमारे जज्बे को बचाए हुए है और लगातार थपेड़े खाने के बाद भी हमारी कश्ती लगातार आगे बढ़ रही है।
आज जब सारा विश्व परेशान है तब हमारे देश में प्रधानमंत्री ने इस समस्या से बचने और प्रभावी कदम उठाये जाने के लिए जनसहयोग की आवश्यकता महसूस करते हुए देश को मानसिक रुप से तैयार रहने के लिए, देश से आह्वान किया है कि वह सार्वजनिक परिवहन सुविधा का अधिकाधिक उपयोग करें, घर से काम करने की प्रवृत्ति बढ़ाए, बाजार जाकर हर काम करने की आदत में प्रभावी बदलाव लाए, विदेशी मुद्रा बचाने के लिए बेहद जरुरी है कि हम पेट्रो पदार्थों का कम से कम उपयोग करें, खाद्य तेलों का उपयोग कम करें ताकि हमारे आयात बिल में ही नहीं हमारी सेहत में भी सुधार हो। हमारे परिवार में एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदा जाए क्योंकि देश का विदेशी मुद्रा खर्च का प्रतिवर्ष नौ से दस प्रतिशत केवल स्वर्ण आयात में खर्च होता है। पूरे विश्व में भारतीय सबसे ज्यादा स्वर्ण खरीदते हैं। हमारी मानसिकता स्वर्णमयी है, स्वर्ण हमारे मस्तिष्क में गहरे तक जमा है और हमारा विश्वास इसी की जमाखोरी में है। हमारे हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में स्वर्ण की आभा स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है, हमारी स्त्रियां ही नहीं हमारे यहां का पुरुष भी जब तक दस बीस ग्राम स्वर्ण धारित न करे, उसकी शोभा न बढ़े ऐसा संभव नहीं है। अधिकांश पुरुषों के हाथ में एक दो अंगूठियाँ और गले में सोने की चैन न पड़ी हो ,वह उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है। स्त्रियां भी स्वर्ण रहित पुरुष को हेय दृष्टि से देखती हैं। यह सब हमारे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक ताने बाने में घुसा हुआ है, चाहे बच्चे का जन्म हो, साल गिरह हो, उसके विभिन्न संस्कार हो, हर बार खास रिश्तेदारों की इच्छा होती है कि उसे स्वर्ण आभूषण ही भेंट किया जाए, क्योंकि विपरीत काल में भी स्वर्ण एक गारंटी देता है, समाज में प्रतिष्ठा व्यक्ति के स्वर्ण आभूषण ही देते हैं, सार्वजनिक तौर पर इसका दिखावा रसूख दिखाने के लिए बेहद अहम माना जाता है। शादी ब्याह, स्वर्ण के बिना भारत में अभी भी एक सपना ही है।
पेट्रोल, डीजल, कैरोसिन के बिना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी वैसे ही बुरी तरह प्रभावित होगी जैसे मोबाइल के बिना जिंदगी किस तरह होगी, यह कल्पना से परे है। लेकिन हम यदि थोड़ा संयम रखें और थोड़ा ध्यान रखें तो दस प्रतिशत पेट्रो उत्पाद की कटौती बेहद आसान है। थोड़ा अनुशासन रखें तो हम मोदी जी के आह्वान को अमली जामा पहनाते हुए पच्चीस प्रतिशत तक की कटौती बिना ज्यादा जद्दोजहद के कर सकते हैं। हमें यही मॉडल अपनाना होगा ताकि हम हमारे आर्थिक विकास को भी न रुकने दें और गतिमान रहते हुए प्रगति करते रहें। इसे हम राजनैतिक चश्मे से न देखते हुए, देश हित और सबके हित के रूप में देखें, प्रगति और रोजगार के नजरिए से देखें। यदि हमने यह उपाय नहीं अपनाए तो न केवल विदेशी मुद्रा संकट से हम परेशान होंगे वरन हम पेट्रो प्रोडक्ट के बिना या एकदम कमी की वजह से अपनी ही प्रगति को रोकते हुए देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकेंगे। संकट ज्यादा लंबा नहीं चलेगा मगर डेढ़ से दो वर्ष के पहले समाप्त भी नहीं होगा। दुनिया भर का पेट्रोलियम पदार्थों का उत्पादन लगभग बीस प्रतिशत गिर गया है और हमारा देश जो कि लगभग अस्सी प्रतिशत आयात पर निर्भर है। उसे भी बीस प्रतिशत आपूर्ति कम होने और शेष बीस प्रतिशत तेल की कीमत में इजाफे के कारण कम मात्रा में खरीदी और आपूर्ति प्रभावित होने का सामना करना पड़ेगा। इससे पड़ने वाले व्यापक प्रभावों से बचने के लिए यह जरूरी ही नहीं अनिवार्य है कि हम अपनी पेट्रो जरूरतों को सीमित करें। घर से दो तीन किलोमीटर के कार्य के लिए वाहन का उपयोग नहीं करें, इससे ज्यादा पांच छह किलोमीटर तक के दायरे में साइकिल का उपयोग करें, इससे जहां सेहत सुधार होगा वहीं पर्यावरण सुधरेगा, प्रदूषण पर रोक लगेगी और यातायात में जाम की स्थिति में सुधार होगा। हम ज्यादा से ज्यादा घरों में, कार्यालयों में सोलर सन्यंत्र लगवाएं। अधिक से अधिक कार्यालयों में वर्क फ्रॉम होम की पद्धति अपनाई जाए या काम के घंटे बढ़ाकर अलग अलग समूहों को चार दिन का कार्यालय किया जाए और सबसे बड़ी जीत हमारी तब होगी जब हममें से प्रत्येक व्यक्ति स्व अनुशासन के साथ परिवार का पेट्रो बजट चालीस प्रतिशत घटाने के लिए कमर कस लें। यदि हमने यह कर लिया तब हम फिर से अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर देश को विश्व भर में सिरमौर बनाए रखकर प्रगति पथ पर झंडे गाड़ देंगे। उससे हमारे शेयर बाजारों, हमारे व्यापारिक संस्थानों और रोजगार को ही बल मिलेगा, यही समय की मांग है, जिसे एकजुटता के साथ हम तिरंगे को और ऊंचा उठाएंगे।
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भारतीय राजस्व सेवा (आई.आर.एस.) के सेवानिवृत्त अधिकारी अरुण कुमार जैन समासामयिक विषयों के साथ साहित्य की व्यंग्य, कविता, लेख आदि विधाओं में भी अपनी कलम चला रहे हैं। शासकीय सेवा में अपने मूल कार्य के साथ वे राजभाषा अनुभाग का भी अनेक वर्षों तक दायित्व निभाते रहे। वर्तमान में इंदौर में निवास और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भागीदारी कर रहे हैं।

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