11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करते हुए इसे राष्ट्र को समर्पित किया। उन्होंने कहा था कि सोमनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है।  वर्ष 1026 में हुए पहले बड़े आक्रमण से लेकर स्वतंत्र भारत में इसके पुनरुद्धार तक, सोमनाथ ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। बार-बार ध्वस्त किए जाने के बावजूद यह मंदिर हर बार और अधिक दृढ़ होकर खड़ा हुआ। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा के सम्मान में कल सोमवार, 11 मई को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। इसी अवसर पर आप सभी पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है आलेख...........

सोमनाथ : सनातन चेतना, राष्ट्रीय गौरव और पुनर्जागरण का तीर्थ

        अरब सागर के तट पर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित प्रभास पाटन का सोमनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक आस्था और अदम्य जिजीविषा का प्रतीक है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान प्राप्त सोमनाथ सदियों से भारतीय जनमानस की श्रद्धा का केंद्र रहा है। यह मंदिर जितना अपनी पौराणिक महत्ता के कारण प्रसिद्ध है, उतना ही अपने संघर्षपूर्ण इतिहास और पुनर्निर्माण की प्रेरक गाथा के कारण भी विश्वभर में जाना जाता है।

     वर्ष 1026 में हुए पहले बड़े आक्रमण से लेकर स्वतंत्र भारत में इसके पुनरुद्धार तक, सोमनाथ ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। बार-बार ध्वस्त किए जाने के बावजूद यह मंदिर हर बार और अधिक दृढ़ होकर खड़ा हुआ। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा के सम्मान में वर्ष 2026 में “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” मनाया जा रहा है। यह आयोजन 1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष और 11 मई 1951 को मंदिर के पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष पूर्ण होने का प्रतीक है।

पौराणिक और आध्यात्मिक महत्ता

    शिव पुराण तथा द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सोमनाथ को बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम माना गया है। यह स्थान भगवान शिव, चंद्रदेव और भगवान कृष्ण से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना कर यहीं अपने श्राप से मुक्ति प्राप्त की थी। इसलिए यह स्थल सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र माना जाता है।

     सोमनाथ केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की निरंतरता का जीवंत प्रमाण भी है। यह दर्शाता है कि समय और संघर्ष चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, आस्था की ज्योति कभी बुझती नहीं।

आक्रमण और पुनर्निर्माण की अमर गाथा

      सोमनाथ का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी। 11वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए। जनवरी 1026 में महमूद गजनवी द्वारा किए गए हमले को सोमनाथ पर पहला बड़ा विध्वंसकारी आक्रमण माना जाता है। इसके बाद भी मंदिर को बार-बार लूटा और नष्ट किया गया।

        लेकिन हर विनाश के बाद श्रद्धालुओं, राजाओं और समाज ने मिलकर इसका पुनर्निर्माण किया। 12वीं शताब्दी में राजा कुमारपाल ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। 13वीं शताब्दी में जूनागढ़ के शासकों ने इसे पुनः स्थापित किया। बाद में साम्राज्ञी लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने 18वीं शताब्दी में यहां नया मंदिर बनवाया।

      यह इतिहास केवल एक मंदिर के पुनर्निर्माण का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की अमरता का इतिहास है। सोमनाथ बार-बार यह संदेश देता रहा कि सांस्कृतिक चेतना को तलवारों से समाप्त नहीं किया जा सकता।

स्वतंत्र भारत और सोमनाथ का पुनर्जागरण

       स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में सोमनाथ के भग्नावशेषों का दौरा किया। उन्होंने इसे भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के पुनर्निर्माण का प्रतीक मानते हुए मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। जनसहयोग और राष्ट्रीय भावना के आधार पर वर्तमान मंदिर का निर्माण “कैलाश महामेरू प्रसाद” स्थापत्य शैली में किया गया।

11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन करते हुए इसे राष्ट्र को समर्पित किया। उन्होंने कहा था कि सोमनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। आज 75 वर्ष बाद भी यह मंदिर राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बना हुआ है।

वीर हमीरजी गोहिल का बलिदान

     सोमनाथ की रक्षा के लिए अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इनमें वीर हमीरजी गोहिल का नाम विशेष रूप से स्मरणीय है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार उन्होंने 1299 में जफर खान के आक्रमण के समय मंदिर की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उनका जीवन “राजधर्म” की उस भावना को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति अपने समाज, संस्कृति और पवित्र स्थलों की रक्षा को सर्वोच्च कर्तव्य मानता है। यद्यपि उनके बारे में विस्तृत आधिकारिक अभिलेख कम उपलब्ध हैं, लेकिन जनस्मृति में उनका स्थान अमिट है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व

     वर्ष 2026 में आयोजित “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” इतिहास और सांस्कृतिक गौरव का विशेष अवसर है। यह आयोजन दो महत्वपूर्ण घटनाओं का संगम है - 1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष और 1951 में पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं, 11 मई 2026 को इस समारोह में भाग लेने के लिए सोमनाथ जाएंगे। उन्होंने सोमनाथ को “भारत की अजेय भावना” का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह मंदिर विनाश पर विजय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रेरणा देता है। प्रधानमंत्री ने “विकास भी, विरासत भी” की अवधारणा पर बल देते हुए अगले 1000 दिनों तक विशेष पूजा आयोजित करने की घोषणा की है। उन्होंने देशवासियों से इस ऐतिहासिक कालखंड में सोमनाथ आने का आग्रह भी किया।

     जनवरी 2026 में आयोजित कार्यक्रमों में 72 घंटे तक निरंतर ओंकार मंत्रका जाप हुआ। इसके साथ ही 108 घोड़ों की प्रतीकात्मक शौर्य यात्रानिकाली गई, जिसमें सोमनाथ की रक्षा करने वाले वीरों को श्रद्धांजलि दी गई।

भव्य स्थापत्य और आध्यात्मिक आभा

    सोमनाथ मंदिर अपनी वास्तुकला के कारण भी अद्वितीय है। मंदिर का शिखर 150 फुट ऊँचा है, जिसके शीर्ष पर 10 टन का विशाल कलश स्थापित है। 27 फुट ऊँचा ध्वजदंड इसकी आध्यात्मिक महिमा को दर्शाता है।

     मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभा मंडप और नृत्य मंडप स्थित हैं। यहां 1,666 स्वर्ण-मंडित कलश और 14,200 ध्वज मंदिर की समृद्ध परंपरा और भक्ति को दर्शाते हैं।

      हर वर्ष यहां करीब एक करोड़ श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। केवल बिल्व पूजा में ही 14  लाख से अधिक श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस प्रकार सोमनाथ आज भी भारत के सबसे सक्रिय और जीवंत तीर्थस्थलों में शामिल है।

संस्कृति और आधुनिक तकनीक का संगम

       सोमनाथ में संस्कृति और आधुनिकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वर्ष 2003 में आरंभ किया गया “लाइट एंड साउंड शो” 2017 में आधुनिक 3डी लेजर तकनीक से सुसज्जित किया गया। यह शो मंदिर के गौरवशाली इतिहास को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।

       “वंदे सोमनाथ कला महोत्सव” जैसे आयोजनों के माध्यम से 1,500 वर्ष पुरानी नृत्य परंपराओं को पुनर्जीवित किया गया है। इससे सोमनाथ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी केंद्र बन गया है।

सामाजिक सेवा और जनकल्याण

       श्री सोमनाथ ट्रस्ट केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी व्यापक कार्य कर रहा है। ट्रस्ट द्वारा युवाओं और महिलाओं के लिए कंप्यूटर शिक्षा, सिलाई, डिजिटल साक्षरता और सौंदर्य प्रशिक्षण जैसे कौशल विकास कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। “स्कूल ऑन व्हील्स” योजना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा पहुंचाई जा रही है।

       स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत गरीब परिवारों के लिए निःशुल्क दंत एवं नेत्र शिविर आयोजित किए जाते हैं। दिव्यांगों को व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र और बैसाखियां वितरित की जाती हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान ट्रस्ट ने उल्लेखनीय योगदान दिया। पहली लहर में 8.73 करोड़ रुपये और दूसरी लहर में 2.21 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई। मुख्यमंत्री राहत कोष में 1 करोड़ रुपये का दान दिया गया तथा ऑक्सीजन प्लांट और कंसंट्रेटर की व्यवस्था भी कराई गई।

पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण

       सोमनाथ आज संवहनीय विकास का भी उदाहरण बन चुका है। 2018 में इसे “स्वच्छ आइकॉनिक प्लेस” घोषित किया गया। मंदिर के फूलों से वर्मीकंपोस्ट तैयार किया जाता है, जिससे 1,700 बिल्व वृक्षों का पोषण होता है।

       “मिशन लाइफ” के अंतर्गत प्लास्टिक कचरे से हर महीने लगभग 4,700 पेवर ब्लॉक बनाए जा रहे हैं। वर्षा जल संचयन और सीवेज उपचार संयंत्रों के माध्यम से प्रति माह लगभग 30 लाख लीटर पानी का पुनर्चक्रण किया जाता है।

          यहां 72,000 वर्ग फुट क्षेत्र में फैला मियावाकी वन प्रतिवर्ष लगभग 93,000 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है। वहीं “सोमगंगा जल” योजना के अंतर्गत अभिषेक जल को शुद्ध कर बोतलों में उपलब्ध कराया जाता है, जिससे दिसंबर 2024 तक 1.13 लाख परिवार लाभान्वित हुए हैं।

       महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी सोमनाथ एक आदर्श मॉडल बनकर उभरा है। ट्रस्ट के 906 कर्मचारियों में 262 महिलाएं कार्यरत हैं। “बिल्व वन” का संचालन पूरी तरह महिलाओं द्वारा किया जाता है। कुल 363 महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त है और वे प्रतिवर्ष लगभग 9 करोड़ रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।

      सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक है। यह आस्था, संघर्ष, पुनर्जागरण और सांस्कृतिक निरंतरता की ऐसी अमर गाथा है, जिसने हजार वर्षों के इतिहास को अपने भीतर समेट रखा है।

      विनाश और पुनर्निर्माण की यह यात्रा बताती है कि भारतीय सभ्यता केवल स्मारकों में नहीं, बल्कि लोगों की सामूहिक चेतना, श्रद्धा और संकल्प में जीवित रहती है। आज जब सोमनाथ अपने पुनरुद्धार के 75 वर्ष और संघर्ष के 1000 वर्ष पूरे कर रहा है, तब यह केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए आत्मविश्वास और प्रेरणा का संदेश भी है।

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