प्रियांक खरगे का आरएसएस प्रमुख को पत्र, वित्तीय जानकारी की मांग
बेंगलुरु। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत को एक औपचारिक पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति और वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खरगे ने मांग की है कि संघ अपने वित्तीय स्रोतों, टैक्स अनुपालन (Tax Compliance) और संगठनात्मक ढांचे से जुड़े तमाम दस्तावेजों को सार्वजनिक करे। इस पत्र के सामने आने के बाद कांग्रेस और संघ के बीच पुरानी वैचारिक और राजनीतिक जंग एक बार फिर तेज हो गई है।
प्रियांक खरगे के तीखे सवाल: पंजीकरण और फंडिंग पर घेरा
गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने अपने पत्र में सीधे तौर पर संघ की जवाबदेही को लेकर कई सवाल दागे हैं। उन्होंने पूछा है कि आरएसएस किस कानून या संवैधानिक प्रावधान के तहत बिना किसी औपचारिक पंजीकरण (Registration) के देश में इतने बड़े स्तर पर कार्य कर रहा है। खरगे का कहना है:
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जब देश के अन्य सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को कड़े सरकारी नियमों, ऑडिट और कर व्यवस्था का पालन करना पड़ता है, तो आरएसएस के लिए अलग मानक क्यों हैं?
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संघ को अपनी आय-व्यय का ब्योरा, प्रशासनिक ढांचा और फंडिंग के मुख्य स्रोतों की जानकारी देश के सामने रखनी चाहिए ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
मोहन भागवत का पलटवार: 'हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं'
प्रियांक खरगे के इन आरोपों और सवालों पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। भागवत ने संघ की स्थिति साफ करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी और यह एक पूर्णतः मान्यता प्राप्त संगठन है। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा:
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देश के मौजूदा कानून के तहत किसी भी संगठन के लिए औपचारिक पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।
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जैसे 'हिंदू धर्म' कहीं पंजीकृत नहीं है, वैसे ही संघ भी काम कर रहा है। देश की सरकारें और देश की शीर्ष अदालतें (न्यायालय) दोनों ही आरएसएस के अस्तित्व, समाज सेवा और उसकी कार्यप्रणाली को पूरी तरह कानूनी मान्यता दे चुके हैं।
संघ के शताब्दी वर्ष में गहराया वैचारिक टकराव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद बेहद संवेदनशील समय पर सामने आया है, क्योंकि आरएसएस वर्तमान में अपने स्थापना के 100 वर्ष (शताब्दी वर्ष 2025-2026) मना रहा है। प्रियांक खरगे पिछले कई महीनों से लगातार संघ की कर व्यवस्था और वित्तीय स्रोतों की जांच की मांग कर रहे हैं। इस ताजा पत्र युद्ध ने न केवल कर्नाटक, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी गैर-पंजीकृत संगठनों की कानूनी स्थिति और उनकी फंडिंग को लेकर एक नई और लंबी कानूनी व वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है।

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