आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की अग्नि परीक्षा ( आलेख - मधुकर पवार ) ...........  

इन दिनो आयुर्वेद की दवा बनाने वाली भारत की अग्रणी निर्माता कंपनी पतंजलि के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण और प्रख्यात योगाचार्य स्वामी रामदेव को सर्वोच्च न्यायालय के अवमानना के प्रकरण में लताड़ लगाने का मामला सुर्खियों में छाया हुआ है स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण पर आरोप है कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नहीं मानते हुए भ्रामक विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाये हैं हालांकि न्यायालय में स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने बिना शर्त माफी मांग ली है लेकिन न्यायालय इससे संतुष्ट नहीं है न्यायालय में सुनवाई जारी रहेगी और आगे क्या होगा यह तो भविष्य के गर्त में हैं लेकिन इस पूरे मामले में बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा हो गया है कि दावे की बिना जांच पड़ताल किये ही विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों को बंद कर देना चाहिए या सरकार इसमें हस्तक्षेप कर आयुर्वेद के प्रचार प्रसार में स्वयं आगे आकर संज्ञान लेकर इसे संरक्षण प्रदान कर इस विधा को फिर से गौरव दिलाने में अपना योगदान देगी

 

दरअसल आयुर्वेद की दवाओं के उपयोग और योग – प्राणायाम के सतत अभ्यास से कुछ रोगों जैसे मधुमेह, थायराईड, उच्च व निम्न रक्तचाप आदि रोगों को जड़ मूल से समाप्त करने का दावा करने वाले स्वामी रामदेव पर भारतीय चिकित्सा संगठन (आईएमए) ने प्रकरण दर्ज करवाया है आईएमए ने आरोप लगाया है कि स्वामी रामदेव भारत की संसद में सन 1954 में पारित औषधीय और जादुई उपचार अधिनियम (ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट) का उल्लंघन कर रहे हैं इस अधिनियम के तहत जादुई गुणों का दावा करने वाले दावों और उपचारों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है अधिनियम में उल्लिखित बीमारियों को पूरी तरह ठीक करने सम्बंधि विज्ञापन प्रकाशित करवाना संघीय अपराध माना जाएगा इस अधिनियम में अपेंडिसाइटिस, धमनी काठिन्य, अंधापन, रक्त विषाक्तता, बाईट रोग, कैंसर, मोतियाबिंद, बहरापन, मधुमेह, मस्तिष्क के रोग, ऑप्टिकल प्रणाली के रोग, मासिक धर्म प्रवाह के विकार, तंत्रिका तंत्र के विकार, प्रॉस्टेटिक ग्रंथि के विकार, जलोदर, मिर्गी, स्त्री रोग, बुखार (सामान्य), फिट, महिला वक्ष का रूप और संरचना, पित्तशय, गुर्दे और मूत्राशय की पथरी, गैंगरीन, ग्लूकोमा, घेंघा रोग, हृदय रोग, उच्च या निम्न रक्तचाप, हाइड्रोसील, हिस्टीरिया, शिशु पक्षाघात, पागलपन, कुष्ठ रोग, ग्लूकोडरमा, लाकजा, लोकोमोटर गतिभंग, ल्यूपस, तंत्रिका संबंधी दुर्बलता, मोटापा, पक्षाघात, प्लेग, प्लुरिसी, निमोनिया, गठिया, यौन नपुंसकता, चेचक, व्यक्ति का कद, महिलाओं में बांझपन, ट्रेकोमा, क्षय रोग, ट्यूमर, टाइफाइड बुखार, जठराग पथ के अल्सर और यौन रोग के तहत सिफलिस, गोनोरिया, सॉफ्ट चंक्र, वेनेरियल, ग्रेनुलोमा और लिम्का ग्रेनुलोमा आदि बीमारियां शामिल हैं

 स्वामी रामदेव हरिद्वार में चलने वाले नियमित शिविरों और अन्य कार्यक्रमों में इस बात की सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि मधुमेह, उच्च व निम्न रक्तचाप, कैंसर, थायराइड, मिर्गी, अर्थराइटिस आदि बीमारियों का योग - प्राणायाम और विभिन्न थेरेपी तथा आयुर्वेद की दवाईयो के सेवन से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है शिविर में मौजूद काफी संख्या में स्वास्थ्य साधक भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हैं कि उन्हें आयुर्वेद की दवाइयां और योग प्राणायाम से लाभ हुआ है पतंजलि द्वारा किए जाने वाले दावों और स्वास्थ्य लाभार्थियों को एक सिरे से इसलिए नहीं नकारा जा सकता क्योंकि जब वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं तो इसके पीछे कुछ ना कुछ सत्यता तो होगी ही यहां यह मान लें कि सब प्रायोजित है तो इसकी गहन जांच होनी चाहिए सर्वोच्च न्यायालय में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा दायर की गई याचिका में पतंजलि द्वारा किए जाने वाले तथा तथाकथित भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है इस संबंध में न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है

सन 1954 में जब ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज अधिनियम पारित हुआ था, उस समय आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, योग - प्राणायाम आदि भारतीय चिकित्सा पद्धति का बहुत सीमित प्रचार प्रसार हुआ था हालांकि उन दिनों वेद्य, नीम हकीम द्वारा उपचार किया जाता था अनेक बीमारियों को भूत, प्रेत पिशाचिनी के प्रकोप से जोड़कर झाड़ फूंक कर ईलाज किया जाता रहा है इससे काफी संख्या में रोगियों की मृत्यु भी हो जाती थी इस दृष्टि से इस कानून की उस समय की आवश्यकता के अनुसार उपयोगिता थी लेकिन वर्तमान समय में भारत सरकार ने स्वयं पहल करते हुए आयुष मंत्रालय का गठन कर आयुर्वेद, योग, होम्योपैथी, सिद्ध, और यूनानी चिकित्सा पद्धति को मान्यता दी है और आयुर्वेद संस्थानों, महाविद्यालयों आदि में अनुसंधान कार्य भी जारी हैं  

पिछले कुछ वर्षों में आयुर्वेद के क्षेत्र में जबरदस्त विस्तार हुआ है योग को तो अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल चुकी है आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में भी अनुसंधान और विकास कार्य हो रहे हैं अब काफी बड़ी आबादी द्वारा आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाया जा रहा है जब मधुमेह, उच्च व निम्न रक्तचाप, थायराइड जैसी बीमारियों के मरीज का आयुर्वेद की दवाइयों, योग प्राणायाम और प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज करवाया जाता है तो इन बीमारियों के रोगी न सिर्फ स्वस्थ हो रहे हैं बल्कि वर्षों से सेवन कर रहे एलोपैथी की दवाई का सेवन करना भी बंद कर देते हैं तब इन दावों की प्रामाणिकता को जांच – पड़ताल किये बिना ही कार्रवाई करना तर्कसंगत नहीं लगता  

औषधीय एवं जादुई उपचार अधिनियम को अस्तित्व में आए 70 साल से अधिक समय हो गया है इस अवधि में अनुसंधान और शोध भी बड़ी मात्रा में हुए हैं यदि कोई संस्थान इस अधिनियम में दर्ज की गई कुछ बीमारियों को जड़ मूल से समाप्त करने का दावा करता है तो इसकी गम्भीरतापूर्वक जांच की जानी चाहिए ना कि उसको दंडित करने के लिए अधिनियम का सहारा लेना चाहिए केंद्र सरकार ने काफी संख्या में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे और अनुपयोगी कानूनों को समाप्त कर दिया है औषधीय एवं जादुई उपचार अधिनियम को स्वास्थ्य की दृष्टि से भले ही समाप्त नहीं किया जा सकता लेकिन इसकी समीक्षा कर संशोधन तो किये जाने की आवश्यकता है जब अखबारों में इसी अधिनियम के तहत उल्लिखित अनेक बीमारियों का शर्तिया इलाज करने का दावा करने वाले विज्ञापन प्रकाशित होते हैं तब आईएमए क्यों आंख बंद कर लेता है? जबकि इस तरह के विज्ञापनों से अखबार पटे पड़े रहते हैं. इन दिनों सोशल मीडिया पर भी अनेक बीमारियों को ठीक करने के दावे किए जा रहे हैं  

ऐसा लगता है आईएमए औषधीय एवं जादुई उपचार अधिनियम की आड़ लेकर आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे अनुसंधान कार्यों को हतोत्साहित करना चाहता है जबकि आईएमए को इन दावों की निश्पक्षता से जांच करने की मांग करनी चाहिए थी इस संदर्भ में केंद्र सरकार स्वयं संज्ञान लेकर एक आयोग अथवा समिति का गठन करें जिसमें आयुर्वेद और एलोपैथी के विशेषज्ञ हो गहन जांच पडताल में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा जिन मरीजों को लाभ हुआ है उनकी चिकित्सा की व्यापक जांच की जाए सभी मेडिकल जांच रिपोर्ट का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला जाए कि, किया जाने वाला दावा सही है या गलत बिना जांच के ही दोषी मान लेना भारतीय चिकित्सा पद्धति का अपमान है हजारों वर्षों से भारतीय जनमानस में प्रचलित आयुर्वेद के दावों को एक सिरे से नकारने के बजाय इसकी सत्यता की जांच की जाए तो यह मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार होगा उपकार कहना इसलिए उपयुक्त है क्योंकि विश्व में जितने भी पेड़ पौधे हैं, अधिकांश औषधीय गुणों से परिपूर्ण हैं यदि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, योग प्राणायाम आदि पर आधारित समन्वित चिकित्सा की जाए तो यह प्रयास निश्चित ही मानव के लिए वरदान सिद्ध होगा 

मान्यता है कि खान-पान, दिनचर्या, आचार विचार के साथ नियमित रूप से योग प्राणायाम का स्वस्थ रहने में महत्वपूर्ण योगदान होता है उद्देश्य भी यही होता है कि बीमार ही ना पड़े और यह केवल योग प्राणायाम, ध्यान, संतुलित भोजन, व्यवस्थित दिनचर्या आदि से ही संभव है इसलिए आशा की जानी चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय अपने रूख को लचीला करते हुए आदेश पर पुनर्विचार करें और योग ऋषि स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के दावों की पूरी पारदर्शिता और निश्पक्षता से जांच करवायें यदि आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और योग प्राणायाम से कुछ बीमारियों के रोगी स्वस्थ हो रहे हैं तो इस अधिनियम को समाप्त या संशोधन करने के लिए सरकार को निर्देशित करें और यदि ये दावे झूठे पाए जाते हैं तो सम्बंधितों पर कानून सम्मत कार्रवाई की जानी चाहिए

यदि आयुर्वेद की दवाओं का कारगर प्रभाव सिद्ध हो जाता है तो निश्चित ही यह किसानों और वनवासियों के लिये भी फायदेमंद है आयुर्वेद की दवाओं के लिये कच्चा माल की उपलब्धता खेतों और जंगलों से ही हो सकती है आयुर्वेद का वैश्विक स्तर पर भी विस्तार होगा जिसके कारण दवाओं के निर्यात की सम्भावना भी बढ़ेगी इससे रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे किसानों और वनवासियों की आय में भी इजाफा होगा अंतत: एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना को साकार करने में योग, प्राणायाम और आयुर्वेद की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है इससे जुड़े सभी पक्षों को सभी पहलुओं को दृष्टिगत रखते हुये सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है

वास्तव में वर्तमान में मधुमेह, थायराईड, उच्च व निम्न रक्तचाप आदि के रोगियों की संख्या में साल – दर – साल वृद्धि हो रही है इसके अलावा अस्पतालों में ईलाज का खर्च भी बहुत बढ़ गया है एक सामान्य आय वाले व्यक्ति के लिये अस्पताल का खर्च उठाना बेहद मुश्किल होता है ऐसी स्थिति में हर कोई चाहता है कि बीमार ही न पड़े और बीमार हो भी जाये तो बीमारी समूल नष्ट हो जाये ना कि जीवन पर्यंत दवाईयों का सेवन करता रहे इस दृष्टि से आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, योग, प्राणायाम आदि से यदि पतंजली अनेक रोगों को ठीक करने का दावा करता है तो उन्हेँ अपनी बात सिद्ध करने का एक मौका देना चाहिये अन्यथा कानून की आड़ में सदियों पुरानी चिकित्सा पद्धति को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरने का मौका ही नहीं मिलेगा.

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