बिहार चुनाव परिणाम...  *त्वरित टिप्पणी*

*बिहार ने फिर किया भरोसे का चुनाव*

— श्याम यादव

बिहार ने एक बार फिर भरोसे और स्थिरता का रास्ता चुना है। मतगणना के नतीजे सामने हैं, और यह साफ़ हो गया है कि एग्जिट पोलों के अनुमान सही साबित हुए — जनता ने एनडीए को बहुमत देकर विकास और निरंतरता के पक्ष में फैसला सुनाया है। यह परिणाम किसी राजनीतिक दल की जीत भर नहीं, बल्कि जनता के उस विश्वास की पुष्टि है जो पिछले वर्षों में धरातल पर दिखे कामों से उपजा है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार के प्रति यह समर्थन बताता है कि जनता ने अनुभव और स्थिरता को प्राथमिकता दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों से लेकर केंद्र और राज्य की संयुक्त योजनाओं तक, एनडीए ने इस चुनाव में विकास की कहानी को मुख्य विषय बनाया। जनता ने भी उसी भाषा में जवाब दिया — नारे नहीं, नतीजे चुने।

तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई। उनके भाषणों में जोश था, मुद्दे थे, और एक नई ऊर्जा भी। युवाओं के रोजगार और शिक्षा सुधार पर उनका फोकस लोगों को पसंद आया। लेकिन जनता ने इस बार भावनाओं से अधिक भरोसे को तरजीह दी। शायद यही कारण है कि उनके प्रयासों के बावजूद बहुमत एनडीए के पास चला गया।

राहुल गांधी की बिहार यात्रा भी चर्चा में रही। उन्होंने कई सभाएँ कीं, “गरीब की आवाज़ उठाने” और “न्याय के लिए लड़ने” का संदेश दिया। मगर मतदाता अब विचारों से आगे बढ़कर परिणाम देखना चाहता है। राहुल की यह यात्रा कांग्रेस के लिए उपस्थिति का संकेत ज़रूर बनी, लेकिन जनादेश के रुझान उस दिशा में नहीं मुड़े।

बिहार का यह निर्णय लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक है। यहाँ मतदाता हर बार सोच-समझकर मतदान करता है। इस बार उसने कहा — “हमें स्थिर सरकार चाहिए।” जनता ने किसी को हराया नहीं, बल्कि एक दिशा को चुना है — विकास की दिशा।

महागठबंधन को यह परिणाम निराश करने वाला हो सकता है, लेकिन राजनीति में यह भी एक सीख है कि जनता केवल नारों या चेहरों से नहीं, बल्कि भरोसे के इतिहास से प्रभावित होती है।

अब चुनौती एनडीए के सामने है — इस भरोसे को कायम रखना और विकास की गति को और तेज़ करना। क्योंकि बिहार ने जो विश्वास दिया है, वह सिर्फ़ जनादेश नहीं, ज़िम्मेदारी भी है।

— श्याम यादव

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न्यूज़ सोर्स : श्याम यादव