जीवन जीने की कला है “विपश्यना”

जीवन जीने की कला है “विपश्यना”
- विलियम हार्ट
सत्य यह है कि हमारा मन एक बिगड़ैल बच्चे के समान है जिसके पास बहुत सारे खिलौने हैं। वह एक खिलौने से खेलता है, उससे ऊब कर फिर दूसरे खिलौने की ओर बढ़ता है और कुछ देर बाद फिर किसी अन्य खिलौने की तरफ। इसी प्रकार हमारा मन भी एक जगह से दूसरी जगह, एक विचार से दूसरे विचार पर कूदता रहता है तथा इस प्रकार हम सच्चाई से दूर भागते रहते हैं।
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1976 में मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी ताकि तीन वर्ष तक भारत के एक छोटे कस्बे में जाकर ध्यान साधना सीख सकूँ। जब लोगों ने इस बारे में जाना तो उनकी सामान्य जिज्ञासा थी कि “ध्यान करते समय आप क्या करते हैं?" सच यह है कि ध्यान करने का अर्थ है- “कुछ नहीं करना”। सामान्य जीवन में जो क्रियाकलाप हम करते हैं उन्हें रोक कर विपरीत दिशा में कार्य आरंभ करना है।
जिस साधना प्रक्रिया को मैंने सीखा उसका नाम है विपश्यना । यह पालि भाषा का शब्द है। भगवान बुद्ध के समय भारत में यह बोलचाल की भाषा थी। (विपस्सना) 'विपश्यना' शब्द का अर्थ है- सच्चाई को अपने भीतर अनुभूति द्वारा समझना तथा परिज्ञान करना।
संपूर्ण जीवन हम बाह्यमुखी होकर रहते हैं। हम केवल दूसरे क्या कर रहे हैं, यह जानने के लिए इच्छुक रहते है। स्वयं के बारे में जानने हेतु हम इच्छुक नहीं होते। ध्यान करते समय हमें यह सब बदलना होता है और स्वयं को जानना आरंभ करना होता है।
हम शारीरिक हलन-चलन को पूर्णतया रोक कर बैठ जाते हैं तथा आंखें बंद कर लेते हैं। कुछ भी सुनने अथवा देखने को नहीं रहता तथा बाहरी वस्तुओं में हम कोई रुचि नहीं लेते। इस प्रकार जब हम 'स्व' काया को अनुभव करना आरंभ करते हैं तब सबसे बड़ी घटना जो हमारे सामने प्रकट होती है. वह है हमारी सांस । आती-जाती श्वास पर हम मन एकाग्र कर साधना आरंभ करते हैं। अन्य किसी विचार की उपेक्षा करते हुए हम मन को यथासंभव निरंतर लंबे समय तक सांस पर एकाग्र करने का प्रयास करते हैं।
तत्काल ही हमें अनुभव होता है कि यह बहत कठिन कार्य है। जैसे ही हम मन को सांस पर एकाग्र करने की कोशिश करते हैं, हमारा ध्यान पैरों की पीड़ा की ओर चला जाता है। जैसे ही हम सब विचारों को रोकने का प्रयास करते हैं, हमारे चित्त के समक्ष हजार चीजें प्रस्तुत हो जाती हैं। जिस क्षण हम बीते हुए समय तथा आने वाले पल की दश्चिता को परे हटा कर मन को वर्तमान पल में नासिका के द्वारों पर आने-जाने वाली श्वास की जानकारी में लगाने का प्रयास करते हैं, उसी क्षण भूतकाल की कोई प्रीतिकर अथवा अप्रीतिकर याद या भविष्य हेतु आशा अथवा आशंका उदय हो जाती है। और हम भूल जाते हैं कि हम क्या अभ्यास कर रहे थे।
सत्य यह है कि हमारा मन एक बिगड़ैल बच्चे के समान है जिसके पास बहुत सारे खिलौने हैं। वह एक खिलौने से खेलता है, उससे ऊब कर फिर दूसरे खिलौने की ओर बढ़ता है और कुछ देर बाद फिर किसी अन्य खिलौने की तरफ। इसी प्रकार हमारा मन भी एक जगह से दूसरी जगह, एक विचार से दूसरे विचार पर कूदता रहता है तथा इस प्रकार हम सच्चाई से दूर भागते रहते हैं।
अब हमें यह रोकना है। सच्चाई से बचते रहने की कोशिश करने के बजाए हमें जैसी भी सच्चाई है, उसका सामना करना है। अतः हम धैर्य से मन को पुनः श्वास की जानकारी हेतु मोड़ते हैं। हम असफल होते हैं परंतु बार-बार प्रयास करते रहते हैं।
कुछ समय बाद हम पाते हैं कि हमारा मन कुछ अधिक देर तक श्वास की जानकारी बनाये रखता है। इस प्रकार मन को एक जगह एकाग्र करने का अभ्यास निरंतर करते हुए हमें कुछ समय तक मन के स्वभाव शिकंजे को तोड़ने में सफलता मिलती है।
इस प्रकार बलवती बन रही एकाग्रचित्तता का उपयोग करते हुए हम ध्यान के स्थान को बदलते हैं तथा संपूर्ण काया का योजनाबद्ध तरीके से अनुभव करते हैं। काया तथा मन का गहरा संबंध होने के कारण हमारे लिए काया के साथ मन का भी निरीक्षण करना संभव हो जाता है।
सामान्यत: आत्म निरीक्षण के दौरान साधक को विभिन्न प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। सुषुप्त मन की गहराइयों से कई जटिलतायें: भूले-बिसरे हुए विचार, भावना तथा कई प्रकार की अन्य यादें उभरती हैं। बहुधा, प्रारंभ में ये भूली-बिसरी यादें अपने साथ कायिक या मानसिक बेचैनी अथवा पीड़ा को लेकर आती हैं।
तथापि हम इन बेचैनियों से विचलित नहीं होते। हमारा प्रयत्न है स्वयं की सच्चाई को यथाभूत जानते रहना- प्रयोगशाला में कार्यरत एक निर्लिप्त वैज्ञानिक की तरह।
साधारणतः हम मन में जागृत कोई विचार, कोई भावना या अनुभव के अनुरूप प्रतिक्रिया करते रहते हैं। यदि वह अनुभूति सुखद हो तो इनके प्रति हमारी चाहत बढ़ने लगती है। दुःखद होने पर हम इनके प्रति द्वेष जागृत करते हैं तथा किसी तरह इनको हटाना चाहते हैं। परंतु साधना करते समय हमारे भीतर जो कुछ घटित हो रहा है। हमें मात्र उसे जानते रहना है तथा इस अनुभवजन्य सच्चाई को स्वीकार करते रहना है। हम इस अनुभव को बदलने की या इससे बचने की कोशिश नहीं करते, बल्कि बिना किसी प्रतिक्रिया के केवल जानते रहते हैं।
इस प्रकार अभ्यास करते हुए हमें ज्ञात होता है कि हमारे अनुभव निरंतर बदलते रहते हैं। हर क्षण काया में जो भी हम अनुभव करते हैं, वह बदल जाता है। प्रतिपल मानस में विचार बदलते रहते हैं। मेरे भीतर क्षण प्रतिक्षण अनुभूत सच्चाई निरंतर बदलती रहती है। कुछ भी नित्य नहीं रहता, यहां तक कि सबसे सुखद अथवा सबसे दुःखद अनुभूति भी बदल जाती है।
इस प्रकार स्वयं का निरीक्षण करते हुए, स्वयं के अनुभव द्वारा हमें एक महत्त्वपूर्ण सच्चाई का ज्ञान हाता है- 'अनिच्च' (अनित्य) यानी परिवर्तन की सच्चाई। मेरे भीतर तथा इसी प्रकार बाहरी जगत में हर वस्तु प्रतिक्षण बदल रही है।
हालांकि इस तथ्य की हमें सूचना थी तथा आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य को सिद्ध है कि संपूर्ण पदार्थमय भौतिक संसार नन्हें-नन्हें अणुओं से निर्मित है जो एक क्षण में लाखों बार उत्पन्न होते हैं, नष्ट होते हैं। परंतु इस सत्य को मात्र सुनकर अथवा बौद्धिक स्तर पर मानने की बजाय अब हम साधना के माध्यम से स्वयं के स्तर पर सीधे ही अनुभव करते हैं। इसी को स्वानुभूति से जानना कहते हैं।
निरंतर साधना अभ्यास करते हुए हमें शीघ्र ही अनुभव होता है कि जब एक पल से अधिक कुछ ठहरता नहीं है तब मेरे भीतर किसी स्थायी सत्ता का निवास नहीं है, कहीं 'मैं' नहीं, कुछ भी ‘मेरा' नहीं। यह 'मैं' वास्तव में एक प्रवाहमान प्रक्रिया है जो सतत परिवर्तनशील है तथा जब भी 'मैं'. 'मेरा' मानकर किसी वस्तु को पकड़ कर रखने की चेष्टा करता हूं तब मैं स्वयं को दु:खी बना लेता हूं एवं स्वयं हेत दुःख-सागर निर्माण कर लेता हूं क्योंकि अल्प या अधिक समय में यह वस्तु बदल ही जाने वाली है अथवा संभव है, 'मैं' ही नहीं रहूं।
तब प्रश्न यह उठता है कि कैसे स्वयं को दुःखी नहीं बनाया जाय? आसान है; किसी एक अनुभव को बनाये रखने तथा अन्य से बचने अथवा किसी एक को स्वयं के पास खींचने तथा अन्य को धकेलने की बजाय; मैं कोई प्रतिक्रिया किये बिना मात्र देखता रहूं। मैं समतापूर्वक संतुलित मन से निरीक्षण करता रहूँ।
वैसे यह जितना सरल प्रतीत होता है उतना होता नहीं। जब एक घंटे की साधना के दौरान दस मिनट व्यतीत होते ही घुटने में पीड़ा आरंभ होती है तब उसी क्षण पीड़ा के प्रति द्वेष जाग उठता है और मैं इस पीड़ा से मुक्ति चाहने लगता हूं। परंतु पीड़ा तो यथावत रहती है। बल्कि जितना अधिक मैं इससे मुक्त होना चाहता हूं उतनी ही यह बढ़ती जाती है।
मैं यदि केवल एक क्षण के लिए भी इस पीड़ा को देख पाऊं; कुछ देर के लिए भूल जाऊं कि यह मेरी पीड़ा है, भूल जाऊं कि यह मैं हूं जो पीड़ा को महसूस कर रहा हूं। और उस पीड़ा को एक वैज्ञानिक की भांति देख पाऊं तो पाऊंगा कि पीड़ा स्वयं ही बदल रही है। यह नित्य नहीं है। हर क्षण यह बदलती है, नष्ट होती है, पुनः आरंभ होती है, पुनः बदलती है।
जब मैं इसे अपने अनुभव द्वारा जान लेता हूं तब मैं पीड़ा के बंधन से मुक्त हो जाता हूं। मुझ पर इसका आधिपत्य समाप्त हो जाता है। यह यथावत रहे या समाप्त हो जाय, इसका मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं पीड़ा के कारण कष्ट नहीं भोगता क्योंकि अब मैं इसका निरीक्षण कर सकता हूं। मैंने स्वयं को दुःख से विमुक्त करना शुरू कर दिया है। तथा यह सब मैं आंखें बंद कर, स्थिर बैठ कर, जो कुछ भी मेरे भीतर घटित हो रहा है उसके प्रति जागरूक रहने का अभ्यास करते हुए करता हूं।
अतः विपश्यना साधना का उद्देश्य मन को दुःख तथा इसके कारण से मुक्त करते हुए निर्मल करना है। साधारणत: हम नहीं जान पाते कि वास्तव में यह क्या हो रहा है। आशाओं तथा आशंकाओं से घिरे, बीते हुए अथवा आने वाले समय के बारे में सोचते-विचारते हुए हम सदैव बेचैन और तनावग्रस्त रहते हैं।
वस्तुतः साधना करते हुए हम इस पल की सच्चाई को बिना राग-द्वेष किये सामना करना सीखते हैं। हम इसे मुस्करा कर देखते हैं- संतुलित होकर, समता भरे चित्त से।
दैनिक जीवन में यह सजगता तथा समता हमारे लिए बहुत कल्याणकारिणी होती है। सचमुच में जो घटित हो रहा है उसके प्रति अनजान नहीं रहकर अचेतन मन की कामनाओ, आशंकाओं के अनरूप अज्ञानवश अंधी दौड़ लगाने की बजाय, अब हम हर परिस्थिति में सच्चाई देख सकते हैं। तब बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया करने के कारण तनाव और बढ़ाने की अपेक्षा अब हमारे लिए स्वतंत्र एवं सार्थक कदम उठाना संभव होता है जो हमारे लिए तथा अन्य लोगों के लिए भी कल्याणकारी होता है।
जीवन में सभी को एक ही समस्या का सामना करना पड़ता है- अनचाही होती रहती है, मनचाही होती नहीं। मैं यदि इन सब स्थितियों में अंधी प्रतिक्रिया करता हूं तो स्वयं को तथा अन्यों को भी दु:खी बना देता हूं। जब मैं चित्त को समता में स्थापित करता हूं तब स्वयं भी प्रसन्न रहता हूं तथा अन्य लोगों को प्रसन्न बनाने में सहायक बनता हूं। एक रुग्ण व्यक्ति निरोगी होने पर स्वभावतः प्रसन्न हो जाता है। अंधे को दृष्टि-लाभ होने पर वह प्रसन्नता से भर उठता है। इसी प्रकार लोग दुःखों से छुटकारा दिलाने वाली साधना विधि सीख कर धन्य हो उठते हैं। पहले हम दूसरों को हमारे दुःखों में भागीदार बनाकर व्याकुल बना देते थे, और अब हम दूसरों के साथ हमारी शांति तथा प्रसन्नता बांटना चाहते हैं।
निश्चय ही संसार को बेहतर बनाने हेतु इसे बदलना हमारा नैतिक कर्तव्य है तथा इस कार्य का प्रारंभ हमें सबसे समीप वाली वस्तु से करना होगा जो हम स्वयं हैं। यह करने के उपरांत हम कुछ भी करने के योग्य बन जायँगे।
अतः यह है वह साधना, जिसे मैंने जाना और समझा- अर्थात जीवन जीने की कला।
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- विलियम हार्ट
साभार: सयाजी ऊ बा खिन जर्नल
उपर्युक्त आलेख रायपुर से श्री जी.आर. प्रजापति ने प्रेषित किया है। श्री प्रजापति अंतर्राष्ट्रीय विपश्यना केन्द्र के सहायक आचार्य हैं।