सरोकार..............

पेंशनरों को आखिर कब मिलेगा न्याय ?

  • डॉ. चन्दर सोनाने

                   मध्यप्रदेश के पेंशनरों के साथ पिछले 25 सालों से अन्याय हो रहा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री चाहे सुश्री उमाभारती हो या श्री बाबूलाल गौर हो या श्री शिवराज सिंह चौहान हो या हो श्री कमलनाथ। सबके राज में पेंशनरों को न्याय नहीं मिला। उन्हें सबसे हताशा और निराशा ही मिली।

         सन 2000 में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार राज्यों के आकार में बड़े होने के कारण इन तीनों राज्यों का विभाजन कर तीन अलग-अलग राज्य बनाए गए। राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत जिस तरह 1 नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य बनाया गया था। उसी प्रकार उत्तरप्रदेश से अलग कर 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड और 15 नवंबर 2000 को बिहार का विभाजन कर झारखंड राज्य भी बनाया गया था। मध्यप्रदेश के अतिरिक्त दोनों राज्यों में पेंशनरों के लिए राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 की 6 वीं अनुसूची के प्रावधान मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की तरह ही उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड और बिहार-झारखंड राज्य में भी लागू होते थे। उत्तरप्रदेश और बिहार दोनों राज्य अपने-अपने राज्य के पेंशनरों की पेंशन का भुगतान शुरूआत से ही स्वतंत्र रूप से कर रहे हैं। वहीं मध्यप्रदेश की सरकार इस धारा को अपनी छाती से चिपकाए हुए कुंभकर्णी नींद में सोई हुई है। 

   मध्यप्रदेश के विभिन्न पेंशनरों के संगठनों के द्वारा अनेकों बार महामहिम राष्ट्रपति जी, प्रधानमंत्री जी, केन्द्रीय गृहमंत्री जी को ज्ञापन देने के साथ ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को ज्ञापन देकर ये मांग कर-कर के हार चुकी है कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 (6) को विलोपित कर दिया जाए, ताकि मध्यप्रदेश के पेंशनरों को स्थायी राहत मिल सके। किन्तु अभी तक कुछ नहीं हुआ है। उनके साथ लगातार अन्याय और भेदभाव ही हो रहा है।

       मध्यप्रदेश में 1 जनवरी 2006 से छठवां वेतनमान लागू हुआ। प्रदेश के सभी कर्मचारियों को उसी तारीख से छठवें वेतनमान का लाभ दिया गया। किन्तु पेंशनरों को सितम्बर 2008 से छठे वेतनमान का लाभ मिला। इस प्रकार पेंशनरों को जनवरी 2006 से अगस्त 2008 तक के 32 माह का एरियर आज तक मिला ही नहीं। 

              पेंशनर एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री श्री एचपी उरमलिया की याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने छठवें वेतनमान के 32 माह के एरियर्स के भुगतान के आदेश दे दिए। यही नहीं पेंशनरों को 6 प्रतिशत ब्याज सहित बकाया राशि 6 माह में देने के भी आदेश दिए। किन्तु मध्यप्रदेश सरकार हाईकोर्ट की मुख्य पीठ में अपील पर चली गई। वहां भी राज्य शासन की अपील खारीज करते हुए 32 माह के एरियर्स के आदेश को बरकरार रखा गया। इसके विरूद्ध मध्यप्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई है। यानी राज्य सरकार किसी भी तरह पेंशनरों के एरियर्स को देना नहीं चाहती !

    इस छठे वेतनमान की तरह ही सातवें वेतनमान में भी मध्यप्रदेश के पेंशनरों को निराशा ही हाथ लगी। सातवें वेतनमान मध्यप्रदेश में 1 जनवरी 2016 से लागू हुआ। आदेश भले ही बाद में हुए, किन्तु उन्हें एरियर का लाभ भी दिया गया। किन्तु पेंशनरों को सातवे वेतनमान का लाभ अप्रैल 2018 से दिया गया। इस प्रकार पेंशनरों को जनवरी 2016 से मार्च 2018 तक 27 महीने के एरियर का भुगतान आज तक नहीं हुआ। जिस प्रकार मध्यप्रदेश हाई कोर्ट द्वारा छठवें वेतनमान के एरियर देने के बारे में आदेश जारी किया गया है, उसी आदेश के आधार पर सातवें वेतनमान के लिए भी पेंशनर संगठनों को हाईकोर्ट की शरण में जाना ही चाहिए।

   यह तो हुई छठवे और सातवें वेतनमान में पेंशनरों के साथ हुए भेदभावों की बात। केन्द्र सरकार साल में 2 बार महंगाई सूचकांक के आधार पर कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए महंगाई भत्ता और मंहगाई राहत की घोषणा करती है। उसी आधार पर मध्यप्रदेश सरकार कर्मचारियों को तो उसी तारीख से मंहगाई भत्ता देने की स्वीकृति दे देती है, किन्तु राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 (6) का बहाना कर छत्तीसगढ़ सरकार से सहमति का बहाना लेकर महंगाई राहत का आदेश अटकाए रखती है। छत्तीसगढ़ सरकार देय तिथि से मंहगाई राहत न देते हुए बाद की तिथि से महंगाई राहत देने की घोषणा करती है। उसी आधार पर मध्यप्रदेश सरकार हर बार बाद की तिथि से ही मंहगाई राहत देती है। इस प्रकार एक दो बार नहीं बल्कि दर्जनों बार पेंशनरों को एरियर की राशि नहीं मिलती है और वे लगातार छले और ठगे जा रहे हैं।  

           अब पिछले दो साल से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव है। उनका एक विशेष विजन है। उनके द्वारा किए जा रहे नवाचार पूर्व मुख्यमंत्रियों से अलग हैं। उनसे पेंशनर आस लगाकर बैठे हैं कि अब उनके साथ न्याय होगा ! अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री कब पेंशनरों को न्याय दिला पाते है ?

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.श्री चंदर सोनाने मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से संयुक्त संचालक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उज्जैन में निवास कर रहे हैं। उनकी सामयिक और सामाजिक विषयों पर विशेष रूचि है और वे सरोकारस्तम्भ मे जरिये जनहित से सरोकार रखने वाले मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय व्यक्त करते हैं।  

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