लकड़ी, कोयला और केरोसीन से

भोजन बनाने के युग की शुरूआत !

     नई दिल्ली। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी दिखाई देने लगा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ गई है और भारत में भी एलपीजी को लेकर आशंकाओं का माहौल बन गया है। हालात को देखते हुए सरकार ने जहां नागरिकों से घबराकर गैस सिलेंडर जमा न करने की अपील की है, वहीं एलपीजी पर दबाव कम करने के लिए मिट्टी का तेल, कोयला, बायोमास और अन्य वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग जैसे विकल्पों पर भी विचार शुरू कर दिया है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यदि संकट गहराया तो रसोई में फिर से लकड़ी, कोयला और केरोसिन जैसे पारंपरिक ईंधनों का दौर लौट सकता है।

     पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का आज 14 वां दिन है और इस दौरान एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इतिहास में पहली बार हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजों के लिए प्रभावी रूप से बंद कर दिया गया है। यह वही समुद्री मार्ग है जहाँ से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति होती है। इस रास्ते के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल मच गई है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो गया है और कई देशों ने अपने ऊर्जा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए आपात कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर परीक्षा

     हालाँकि भारत सरकार का दावा है कि देश की ऊर्जा व्यवस्था अभी मजबूत स्थिति में है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए केवल एक ही क्षेत्र पर निर्भर नहीं है। सरकार के अनुसार अब भारत को 40 से अधिक देशों से कच्चे तेल की आपूर्ति मिल रही है और कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज़ के अलावा अन्य समुद्री मार्गों से आ रहा है।

      भारत की दैनिक तेल खपत लगभग 55 लाख बैरल है और देश दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल रिफाइनिंग केंद्र बन चुका है। देश में कुल 22 रिफाइनरियां काम कर रही हैं और कई रिफाइनरियां अपनी पूरी क्षमता से भी अधिक स्तर पर उत्पादन कर रही हैं। यही वजह है कि पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता को लेकर फिलहाल सरकार आश्वस्त दिखाई देती है।

एलपीजी पर सबसे ज्यादा दबाव

     हालाँकि घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी के मामले में स्थिति थोड़ी संवेदनशील मानी जा रही है। भारत अपनी एलपीजी आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है और इस आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। ऐसे में इस मार्ग के बंद होने से स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ना लाज़िमी है।

       सरकार ने बताया है कि इस स्थिति से निपटने के लिए रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। इसका असर भी दिखाई देने लगा है और पिछले कुछ दिनों में एलपीजी उत्पादन में करीब 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार से वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से गैस खरीदने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है।

       उल्लेखनीय है कि देश में एलपीजी वितरण का एक विशाल नेटवर्क मौजूद है। लगभग 25 हजार वितरक और करीब एक लाख रिटेल आउटलेट देश भर में सक्रिय हैं। हर दिन लगभग 50 लाख सिलेंडरों का वितरण किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि अभी तक कहीं भी एलपीजी स्टॉक पूरी तरह खत्म होने की कोई सूचना नहीं मिली है।

अफवाहों से बढ़ी घबराहट

      हालाँकि वास्तविक संकट से पहले ही अफवाहों ने लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर कई तरह की भ्रामक खबरें वायरल हो रही हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि जल्द ही गैस सिलेंडरों की भारी कमी होने वाली है। इन अफवाहों का असर यह हुआ कि कई जगहों पर लोगों ने एक साथ कई-कई सिलेंडर बुक करने शुरू कर दिए। इससे वितरण व्यवस्था पर अचानक दबाव बढ़ गया। इसी स्थिति को देखते हुए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने नागरिकों से विशेष अपील की है कि वे घबराहट में बुकिंग न करें। सरकार ने कहा है कि यदि लोग अनावश्यक रूप से सिलेंडर जमा करने लगेंगे तो इससे वास्तव में आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए संयम और जिम्मेदारी बेहद जरूरी है।

जरूरी सेवाओं को प्राथमिकता

      संकट की आशंका को देखते हुए सरकार ने जरूरी सेवाओं के लिए विशेष व्यवस्था की है। अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और अन्य आवश्यक संस्थानों को एलपीजी की आपूर्ति प्राथमिकता के आधार पर की जा रही है। इसके अलावा होटल, रेस्टोरेंट और अन्य व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए गैस वितरण की नई व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए प्रमुख तेल विपणन कंपनियों के अधिकारियों की एक समिति बनाई गई है जो राज्यों और उद्योग संगठनों से बातचीत कर रही है।

      सरकार ने वाणिज्यिक एलपीजी के वितरण पर भी नियंत्रण के कदम उठाए हैं। औसत मासिक जरूरत का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा फिलहाल आवंटित किया जा रहा है ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी को रोका जा सके।

वैकल्पिक ईंधन की तैयारी

      एलपीजी पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने वैकल्पिक ईंधन विकल्पों को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से मिट्टी का तेल उपलब्ध कराया जा रहा है। औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के लिए फ्यूल ऑयल की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा होटल और रेस्टोरेंट क्षेत्र को अस्थायी रूप से बायोमास, आरडीएफ पेलेट्स, कोयले और केरोसिन जैसे विकल्पों के इस्तेमाल की अनुमति देने पर भी विचार किया गया है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

समुद्री व्यापार और भारतीय नाविक

      इस संघर्ष का असर समुद्री व्यापार पर भी दिखाई दे रहा है। फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में भारतीय ध्वज वाले कई जहाज संचालित हो रहे हैं और उन पर सैकड़ों भारतीय नाविक तैनात हैं। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार लगातार निगरानी कर रही है। हालाँकि कुछ जहाजों से जुड़ी घटनाओं में भारतीय नाविकों के घायल होने और कुछ की मृत्यु की खबरें भी सामने आई हैं। इन घटनाओं ने स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।

सरकार की अपील

     सरकार ने मीडिया और नागरिकों दोनों से जिम्मेदारी निभाने की अपील की है। टीवी चैनलों से कहा गया है कि वे पुराने या भ्रामक दृश्य बार-बार न दिखाएँ और प्रत्येक दृश्य के साथ तारीख और समय स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।

     सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं से भी आग्रह किया गया है कि वे अपुष्ट जानकारी साझा न करें। गलत खबरें न केवल लोगों में डर फैलाती हैं बल्कि संकट की स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं।

संयम ही सबसे बड़ा समाधान

     वैश्विक संकट की इस घड़ी में भारत के सामने चुनौती जरूर है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। सरकार का कहना है कि ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

      ऐसे समय में सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों की है। यदि लोग संयम रखें, अफवाहों से बचें और केवल जरूरत के अनुसार ईंधन का उपयोग करें तो किसी भी संभावित संकट को आसानी से टाला जा सकता है।

     पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने दुनिया को यह याद दिला दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक मुद्दा भी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वैश्विक हालात किस दिशा में जाते हैं और भारत इस चुनौती से कैसे निपटता है। फिलहाल सरकार का संदेश साफ हैघबराएँ नहीं, देश में ईंधन की आपूर्ति जारी है।